विवेक रंजन श्रीवास्तव
मनुस्मृति को कोई प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानता है, कोई जातिगत असमानता का शास्त्रीय आधार और कोई इसे आधुनिक भारत के लिए अप्रासंगिक मानता है किंतु मनुस्मृति को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यह आधुनिक अर्थ में कोई संविधान या कानून की संहिता नहीं थी। इसे मानव धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। यह धर्म, आचार, विवाह, परिवार, उत्तराधिकार, राजा और न्याय व्यवस्था, दंड, प्रायश्चित तथा सामाजिक कर्तव्यों जैसे अनेक विषयों पर विचार प्रस्तुत करने वाला संस्कृत का धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है।
परंपरा में मनु को मानव जाति का आदि पुरुष और धर्म का प्रणेता माना गया है। मनुस्मृति स्वयं अपनी ज्ञान परंपरा का आरंभ स्वायंभुव मनु से करती है और बताती है कि मनु की शिक्षाएँ भृगु के माध्यम से आगे कही गईं।
इतिहास की दृष्टि से स्थिति किंचित अलग है। उपलब्ध मनुस्मृति के रचयिता के रूप में किसी एक निश्चित ऐतिहासिक व्यक्ति की पहचान नहीं हुई है। आधुनिक विद्वान इसके वर्तमान स्वरूप को सामान्यतः लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित मानते हैं। पैट्रिक ओलिवेल जैसे विद्वानों के अध्ययन से यह भी संकेत मिलता है कि इसका वर्तमान पाठ काफी सुव्यवस्थित है और इसके पीछे किसी प्रमुख रचनाकार या संपादक की भूमिका रही होगी।
इसलिए मनुस्मृति को सीधे किसी एक ऐतिहासिक “मनु” की लिखी पुस्तक कहना उचित नहीं है। यह प्राचीन धर्मशास्त्रीय परंपरा में निर्मित और कालांतर में व्यवस्थित किया गया ग्रंथ है।
इस अंतर को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि परंपरा किसी जीग्रंथ की धार्मिक प्रतिष्ठा बता सकती है, लेकिन इतिहास उसके रचनाकाल और रचनाकार के प्रश्न का उत्तर प्रमाणों के आधार पर खोजता है।
मनुस्मृति में बहुत कुछ ऐसा है जो प्राचीन भारतीय चिंतन, राजधर्म, न्याय, आचार और सामाजिक जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
विवाद मुख्यतः वहाँ पैदा होता है जहाँ ग्रंथ जन्म के आधार पर सामाजिक स्थिति, अधिकार और दंड निर्धारित करता है तथा स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करता है।
मसलन, मनुस्मृति के आठवें अध्याय में शूद्र द्वारा द्विज के अपमान के लिए अत्यंत कठोर दंड का उल्लेख मिलता है।
दूसरी ओर, ब्राह्मण के अपराध के लिए भी अलग और अपेक्षाकृत विशेष कम कड़े दंड की व्यवस्था दिखाई देती है। कुछ अपराधों में ब्राह्मण को मृत्युदंड न देने का स्पष्ट निर्देश मिलता है।
आज की संवैधानिक दृष्टि से प्रश्न सीधा है, कानून सबके लिए समान होगा ।
अपराधी की सामाजिक स्थिति देखकर अलग-अलग दंड विधान अब संभव नहीं है।
मनुस्मृति की दंड व्यवस्था में जन्म आधारित सामाजिक पदानुक्रम दिखाई देता है। यही उसका सबसे महत्वपूर्ण विवादास्पद पक्ष है।
मनुस्मृति सामाजिक वर्ण व्यवस्था को चार वर्गों में व्यवस्थित करती है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। दसवें अध्याय में शूद्र को चौथा वर्ण बताया गया है।
लेकिन विवाद केवल चार वर्णों की अवधारणा को लेकर नहीं है। ग्रंथ में शूद्र की सामाजिक भूमिका और उसके अधिकारों को लेकर ऐसे प्रावधान भी हैं जिन्हें आज लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत से स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मनुस्मृति 8.413 में शूद्र से सेवा कराने की व्यवस्था मिलती है और उसे ब्राह्मण की सेवा के लिए बनाया गया बताया गया है। इसी तरह कुछ श्लोकों में शूद्र द्वारा द्विज के प्रति अपमान के लिए असाधारण रूप से कठोर शारीरिक दंड का विधान मिलता है।
दसवें अध्याय में चांडाल और कुछ अन्य समूहों को सामाजिक रूप से अलग रखने तथा गाँव से बाहर रहने जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख है।
यहाँ एक ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। मनुस्मृति में वर्णित सामाजिक श्रेणियों को आज की हजारों जातियों की सीधी सूची मान लेना सही नहीं होगा। प्राचीन भारत का सामाजिक जीवन केवल इस एक ग्रंथ से निर्धारित नहीं हुआ था।
फिर भी यह तथ्य अपनी जगह है कि मनुस्मृति में जन्म आधारित सामाजिक पदानुक्रम और कुछ समूहों के पृथक्करण का स्पष्ट विचार मौजूद है।
मनुस्मृति का स्त्री संबंधी दृष्टिकोण भी एकरंगी नहीं है।
इसी ग्रन्थ में कहा गया है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास माना गया है।
लेकिन इसी ग्रंथ में स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले स्पष्ट विधान भी हैं। मनुस्मृति 9.3 में कहा गया है कि बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करते हैं तथा स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है।
यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य है कि सम्मान और स्वच्छंदता तथा स्वतंत्रता एक ही बात नहीं हैं।
किसी स्त्री को परिवार के लिए सम्मानित मानना और उसे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का अधिकार देना दो अलग सामाजिक अवधारणाएँ हैं।
आधुनिक स्त्री समानता तथा अधिकारों की दृष्टि से मनुस्मृति के ये प्रावधान इसीलिए विवादास्पद हैं।
क्या मनुस्मृति ही हिंदू धर्म है? नहीं। यह शायद इस विषय की सबसे जरूरी स्पष्टता है।
मनुस्मृति हिंदू परंपरा का एक महत्वपूर्ण धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है, लेकिन वह हिंदू धर्म का अकेला या सर्वोच्च ग्रंथ नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दू धर्म कभी भी कट्टर वादी नहीं रहा. सदैव वैदिक साहित्य, उपनिषद, महाभारत, रामायण, गीता, पुराण, दर्शन और भक्ति साहित्य की विशाल परंपरा , समाहित करने का उदार भाव इसमें कहीं व्यापक है।
धर्मशास्त्र भी एक ही नहीं थे। याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति और अनेक अन्य ग्रंथ भारतीय विधि और सामाजिक चिंतन की अलग-अलग परंपराओं को व्यक्त करते हैं।
इसलिए मनुस्मृति को पूरे हिंदू धर्म का पर्याय बना देना ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल उचित नहीं है लेकिन दूसरी ओर, उसके सामाजिक विचारों को महत्वहीन बताना भी सही नहीं होगा। भारतीय सामाजिक और धर्मशास्त्रीय चिंतन में उसका प्रभाव रहा है।
मनुस्मृति का आधुनिक इतिहास, औपनिवेशिक काल में एक नया मोड़ लेता है। सन 1794 में सर विलियम जोन्स ने इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया। ब्रिटिश प्रशासन भारतीय समाज और कानून को समझने के लिए संस्कृत धर्मशास्त्रीय ग्रंथों का उपयोग करने लगा। इस प्रक्रिया ने मनुस्मृति को पश्चिमी विद्वानों और औपनिवेशिक प्रशासन के सामने विशेष रूप से प्रमुख बना दिया।
लेकिन दो बातें अलग-अलग रखना जरूरी है।
मनुस्मृति अंग्रेजों की बनाई हुई पुस्तक नहीं थी और भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति भी अंग्रेजों द्वारा आविष्कृत नहीं थी।
हाँ, औपनिवेशिक शासन ने भारतीय सामाजिक श्रेणियों को अपने प्रशासनिक और कानूनी ढाँचे में वर्गीकृत किया तथा धर्मशास्त्रीय ग्रंथों को एक नए संदर्भ में पढ़ा। इसने जाति और मनुस्मृति की आधुनिक समझ को प्रभावित किया।
इसलिए “सब कुछ अंग्रेजों की देन था”, कहना भी उतना ही सरलीकरण है जितना यह मान लेना कि औपनिवेशिक शासन का इस पूरी प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं ।
मनुस्मृति का आधुनिक भारतीय इतिहास डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना के बिना अधूरा है।
25 दिसंबर 1927 को महाड़ में मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया गया। यह घटना उस समय चल रहे दलित अधिकार आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुई थी।
आंबेडकर के लिए प्रश्न केवल एक ग्रंथ का नहीं था। प्रश्न उस सामाजिक व्यवस्था का था जिसमें जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा और अधिकार तय होते थे।
मनुस्मृति दहन इसलिए एक प्रतीकात्मक राजनीतिक और सामाजिक घोषणा बन गया, समानता जन्म से ऊपर है और मनुष्य की गरिमा किसी सामाजिक श्रेणी से छोटी नहीं हो सकती।
यही कारण है कि आज भी 25 दिसंबर को कुछ सामाजिक समूह मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में याद करते हैं।
लगभग दो हजार वर्ष पुराने इस धर्मशास्त्र और आधुनिक भारतीय गणराज्य के बीच सबसे स्पष्ट अंतर संविधान में दिखाई देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की बात करता है। और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है।
अर्थात आधुनिक भारत ने व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का आधार जन्म नहीं बल्कि समान नागरिकता और संवैधानिक अधिकारों को बनाया है।
यहीं मनुस्मृति और संविधान के बीच स्पष्ट मूल अंतर दिखाई देता है।
मनुस्मृति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ा जा सकता है, उससे प्राचीन भारतीय समाज को समझा जा सकता है, उसके भीतर के विचारों पर विमर्श किया जा सकता है, लेकिन आधुनिक भारत का विधिक आधार केवल संविधान है।
मनुस्मृति में प्राचीन भारतीय समाज, राजधर्म, न्याय, आचार और तत्कालीन सामाजिक चिंतन को समझने वाली ऐतिहासिक सामग्री है। उसमें ऐसे प्रावधान भी हैं जो जन्म आधारित असमानता और स्त्री की सीमित स्वतंत्रता को स्वीकार करते हैं।
आधुनिक समानता, मानवाधिकार और संवैधानिक लोकतंत्र की कसौटी पर इन प्रावधानों को स्वीकार नहीं किया गया।
मनुस्मृति हमें शायद यही सबसे बड़ा सबक देती है कि परंपरा और वर्तमान के बीच संवाद जरूरी है लेकिन वर्तमान के नैतिक और संवैधानिक मूल्यों को अतीत की व्यवस्था के आगे समर्पित नहीं किया जा सकता।
इतिहास का काम पुराने ग्रंथों को पवित्र या अपवित्र घोषित करना नहीं है। उसका काम यह समझना है कि वे कब, क्यों और किस सामाजिक दृष्टि से बने थे।
और आधुनिक समाज का काम यह तय करना है कि उन विचारों में से क्या आगे ले जाना है और क्या पीछे छोड़ देना है।
भारत ने इस प्रश्न का अपना उत्तर संविधान में दे दिया है।
समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता, आज के भारत के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
मनुस्मृति इतिहास का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
भारत का वर्तमान और भविष्य संविधान आधारित है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव