Home साहित्‍य कविता मानव की मौलिक प्रवृत्ति है

मानव की मौलिक प्रवृत्ति है

—विनय कुमार विनायक
मानवकी मौलिक प्रवृत्ति है
अपनीगुनाहव सजा के लिए
दूसरे को कसूरवारठहराना!

जबकि हरेकशख्सपाता है,
अपनी कृतगुनाह की सजा!

मानव की मौलिकप्रवृत्ति है,
गलत तरीके से प्राप्त लाभ
कोनिरंतर बरकरार रखना!

औरगलत लाभपरअंकुश
जोलगाएउसेगलत कहना!

मानव कीमौलिक प्रवृत्ति है
प्रशंसा के नाकाबिल होनेपर भी
अपनी प्रशंसा से खुश होना!

यथा स्थिति जो बयान करे,
उससेतुरंतही नाराज़ होना!

मानव की मौलिक प्रवृत्ति है
जो धनदेबिना प्रयत्नके
उनकोधन्यवादना कहना!

अहसान जो शक्शकरते हैं,
उनके अहसान मंद ना होना!

मानव की मौलिक प्रवृत्ति है,
सज्जन की अवहेलना करना
वदुर्जन की उपासना करना!

मानवविवेकशील प्राणी है,
वसर्वाधिक स्वार्थी जीवभी!

मानव की मौलिक प्रवृत्ति है
सदगुण नहींअसद्गुण से
पहले-पहलआकर्षित होना!

सच के रास्तेमें कांटेहोते
असद् की राह आसान होती!

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