लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर दुनिया के देशों के सामने अपने इंडिया की नाक ऊंची कर दी। जब भी कभी सरकार को लगता है कि देश की नाक नीची हो रही है वह पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर उसे ऊंचा कर देती है। अपने देश की जनता भी सरकार के इस देशभक्तिपूर्ण कृत्य से भली-भांति परिचित है। देश की नाक ऊंची करने के इस धर्मनिरपेक्ष ढंग को वह खूब पसंद करती है। उसके लिए ये सरकारी हेप्पी मोमेंट्स होते हैं। इसलिए पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर कहीं कोई हल्ला-गुल्ला नहीं होता। जनता जानती है कि ले-देकर सरकार देशहित में एक अदद यही तो काम करती है। जो विपक्ष में बैठे हैं उनका मन भी ललचाता रहता है ये सोचकर कि कब कुर्सी मिले और कब वे पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर देशहित का पुण्य कमाएं। हर सरकार की एक ही तमन्ना होती है। देश सेवा करने की। सो भी पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर। जो सरकार जितनी धार्मिक होती है,वह उसी अनुपात में पेट्रोल की कीमत बढ़ाती है। कभी सरकार का जो वार्षिक धर्म हुआ करता था अब वह धर्म मासिक हो गया है। इसीलिए अब सरकार अपने धर्म का प्रचार भी नहीं करती है। चुपके से औसतन हर महीने ही वह पेट्रोल की कीमत बढ़ा देती है। अब देखिए ना कि सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए कितने-कितने करोड़ों रुपये खर्च करती है। सिर्फ यह बताने और जताने के लिए कि उसने जनता की भलाई के लिए क्या-क्या काम किया। केवल पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का उसका धार्मिक काम ऐसा है कि इसके प्रचार में उसे फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं करनी पड़ती और जनता तक उसका सुकृत्य फूल की खुशबू की तरह अपने आप पहुंच जाता है। पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के कारनामे की खुशबू इतनी मुकद्दस और पाकीजा है कि श्रद्धा से पूरे मुल्क की जनता का सर सरकार के आगे सरकारी हैंडपंप के हैंडिल की तरह अपने आप झुक जाता है। पहले जब हमारे देश के लोग शिक्षित कम थे तो वे पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का विरोध करते थे। और धरने-प्रदर्शन पर आमादा हो जाते थे। अब हमारा लोकतंत्र मेच्योर हो गया है। जनता वैश्विक संस्कृति में सराबोर हो चुकी है। वह जान गई है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का मतलब है देश का स्टेंडर्ड बढाना। अब हालात ये हैं कि अगर कभी खुदा-ना-खास्ता सरकार पेट्रोल की कीमत बढ़ाने में कहीं चूक गई तो जनता ही बेकाबू हो जाएगी। वह सरकार को कोसेगी कि कितनी निकम्मी सरकार है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ाने जैसा महत्वपूर्ण काम तक नहीं कर सकती। लोग पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह करने लगेंगे। पेट्रोल के भावुक सहयोग से वे खुशी-खुशी बस्तियां जलाने लगेंगे। चूंकि गुस्सा सरकार से है इसलिए प्राइवेट वाहनों को छूए बिना वे सरकारी वाहनों की होली ही जलाएंगे। सरकार जानती है कि पेट्रोल के दाम न बढ़ाने पर देश में बगावत हो जाती है। या करवा दी जाती है। सरकार को शक है कि इराक में और इजिप्त मे शायद बगावत की जड़ पेट्रोल ही हो। वह अपने शाइनिंग इंडिया को तबाह नहीं करना चाहती। इसलिए देशहित में पेट्रोल के दाम मौका देखते ही बढ़ा देती है। और इतने बढ़ा देती है कि चार लीटर पेट्रोल कैसे खरीदा जाए इसी सोच में आदमी दार्शनिक बन जाता है। और कार या स्कूटर चलाते समय भी वह बस यही सोचता रहता कि पेट्रोल का जुगाड़ कैसे हो। इस गंभीर चिंतन में वह उस चौराहे को ही भूल जाता है जहां उसे मुड़ना होता है। सड़क पर लगे मीलों लंबे डिवाइडर को भुनभुनाते हुए पार करके जब वो किसी तरह यू टर्न के मोड़ पर पहुंचता है तो वहां डाइवर्जन के बोर्ड के साए में तांडव करता ट्रेफिकिया यातायात नियम की अनुशासनी तलवार से ड्राइवर का सर कलम कर बकरा ईद का लुत्फ उठाता है। समय और पेट्रोल की बरबादी से उसका जिया धकधक करने लगता है। और वह अपना आपा खोकर बकबक करने लगता है। ट्रेफिक सिपाही को उस समय ऐसा ही कुत्सित आनंद मिलता है जैसा कि जानलेवा बजट पेश करते समय वित्तमंत्री को मिलता है। नागरिक बिलबिलाता है। वित्त का चित्त उसका पित्त बढ़ाता है। गुस्से मे उसका पेट रोल करने लगता है। पेटरोल करने की इसी दुर्घटना को बाजार में पेट्रोल कहा जाता है। जहां उपभोक्ता अपना पेट काटकर टंकी में पेट्रोल भरवाता है। जी हां, पेट्रोल की कीमत बढ़ाते ही सरकार का सम्मान दुनिया की नजर में पचास ग्राम और बढ़ जाता है। हम इस अखंड और प्रचंड इंतजार में है कि संवेदनशील सरकार पेट्रोल की कीमत अब फिर कब बढ़ाती है।

One Response to “हास्य-व्यंग्य / पेट्रोल की कीमत और राष्ट्रीय स्वाभिमान”

  1. AJAY

    NIRAV जी, इस कई PICHE बड़ी गहरी CHAL HAI ? YAI GOVT RATE EAISE HI BADATI रहेगी JAB TAK EK बड़ी COMPANY कई पेट्रोल पुमप SHURU नहीं हो JATE …………..?

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