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    Homeसाहित्‍यकवितामैं 'लड़की' हूं

    मैं ‘लड़की’ हूं

    जकड़ी हूं बंधन में
    सदियों से
    अब मुझे मुक्ति चाहिए।
    बंधन खोल सके जो
    आज़ादी दे मुझे
    वो शक्ति अब चाहिए।
    उड़ना चाहती हूं
    स्वच्छंद गगन में
    ‘पर’ मुझे मेरे चाहिए।
    मैं लड़की हूं
    हां मैं लड़की हूं
    तो क्या हुआ
    जीना का हक़ मुझे भी चाहिए।
    अब न सहूंगी बंधन
    अब न उठाऊंगी रिवाजों की
    बेड़ियों का भार
    हां मुझे भी अब
    जीवन में बहार चाहिए।
    लक्ष्मी जायसवाल
    लक्ष्मी जायसवालhttps://www.pravakta.com/author/lakshmijaiswal
    दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा तथा आज समाज जैसे समाचार पत्रों में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका साधना पथ में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत। सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री लेखन में विशेष रुचि।

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