लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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नीतीश जी ….ये तो हम सब जानते हैं कि गरीबी अभिशाप है ….बेहतर होता आप ये बताते कि आपकी सरपरस्ती के नौ सालों के शासन में इसके उन्मूलन के लिए आपने और आपकी सुशासनी सरकार ने कौन – कौन से सार्थक पहल किए और उनका प्रतिफल बिहार की गरीब जनता को क्या मिला ? आपके विकास के दावों की पोल खुल चुकी है , सेमिनारों और सभाओं की खोखली बातों से जनता ऊब चुकी है और इससे किसी का पेट भी नहीं भरने वाला . गरीब,गरीबी और गरीबी रेखा , आय-व्यय, कैलौरी , कुपोषण, अर्द्ध-भुखमरी व भूख से मौतों जैसे मुद्दों पर आपके शासन काल में अनेकों सेमिनार व समीक्षा बैठकों का दौर चला लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है . एक करबद्ध अनुरोध भी है आपसे कृप्या कर सरकारी अनुदान पर परजीवी की तरह पल रहे एवं आपकी ‘ठकुर-सुहाती में लिप्त एनजीओज NGO’s और पैसे के दम पर वातानुकूलित कक्षों में बैठ कर आपका स्तुति गान करने वाले तथाकथित विदेशी अर्थशास्त्रियों के टाईम-पास का शगल बनाकर गरीब और गरीबी का माखौल मत उड़ाइए.

सच तो ये है कि गरीबी के लिहाज से आज भी बिहार का देश में दूसरा नंबर है. यहाँ आज भी चार करोड़ 38 लाख 10 हजार लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. राज्य में तीन करोड़ 76 लाख 80 हजार गरीब ग्रामीण क्षेत्रों में हैं तो शहरी क्षेत्र में यह संख्या 61 लाख 40 हजार है.समीक्षा के मुताबिक , आपके सुशासन और समग्र विकास के दावों के बावजूद , बिहार में करीब एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही है. इसमें 2011 के तुलना में महज 1 फीसदी की गिरावट आई है.बिहार की आबादी लगभग 11 करोड़ हो गई है . भारत में रहने वाले छह गरीबों में से एक बिहारी है , यदि ग्रामीण निर्धनता की बात करें तो यह अनुपात पांच में से एक होता है . कुल ग्रामीण आबादी की एक बटा पांच से ज्यादा आबादी बेहद निर्धन हैं , इनका औसत मासिक प्रति व्यक्ति खर्च मात्र 390 रुपए है .

यूएनडीपी की ह्यूमन डेवलेपमेंट रिपोर्ट के मुताबिक बिहार भारत के आठ उन गरीब राज्यों में शामिल है , जहाँ सब से ज्यादा भूखे लोग रहते हैं और जहाँ गरीबी निरंतर बढ़ रही है। गौरतलब है कि यूएनडीपी की नजर में गरीब का मतलब उन परिवार से है जो हर रोज एक डॉलर से कम आमदनी पर गुजारा करता है . यूएनडीपी की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि यहाँ के लोंगों की वही स्थिति है जो अफ्रीकी देश इथोपिया और तंजानिया में रहने वाले गरीब लोगों की है।यहाँ के लोगों को ना तो स्वास्थ्य की सुविधा है और ना ही शिक्षा की, यहाँ तक की इन लोगों को पीने का शुद्ध पानी भी नहीं मिल पा रहा है.

ब्रिटेन की ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 49 सबसे गरीब देशों से भी गरीब है बिहार . सर्वेक्षणकर्ताओं ने पाया कि यहाँ गरीब से भी गरीब श्रेणी के लोग हैं , ऐसे लोग हैं, जो गरीबी के कारण अपने दो से ज्‍यादा बच्‍चों को खो चुके हैं, जिनके पास संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं है.

मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद है और शायद आपको भी होगा कि पटना में आयोजित ग्लोबल मीट में बतौर मुख्यमंत्री आपने ही कहा था कि “हमारे विकास का असली मकसद अंतिम आदमी का विकास है” क्या हुआ उस मकसद का ? क्या ये आंकड़े और दुखद तथ्य आपकी सरपरस्ती में बिहार में हुए विरोधाभासी विकास को नहीं दर्शाते और आपके विकास के दावों की कलई नहीं खोलते ?

 
आलोक कुमार ,

One Response to “बिहार के गरीबों की चिंता में दुबले हुए जा रहे नीतीश जी के नाम एक खुला – पत्र”

  1. mahendra gupta

    पिछला सब भूलिए, अब लालू व राहुल के कन्धों पर बैठ विकास की ऐसी नयी गंगा लाएंगे जिसे आप सहित सब लोग चकित हो जायेंगे अभी शुरू होने वाली इनकी जुगलबंदी क्या क्या रंग लाएगी देखते रहिये , उनका यह सोच है कि भा ज पा के कारण यह कार्य नहीं कर सके थे, वह अलगबाट है कि लालू कब उन्हें कन्धों से पटक डालें

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