लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों ने तय कर दिया है कि देश के राजनीतिक दलों का अब वैचारिक धरातल से कोई वास्ता नहीं रह गया है। दलों में विचारधारा की जो विशिष्ट पहचान थी, जिसे अपने-अपने दृष्टि-पत्रों में लाकर वे राष्ट्र के समग्र विकास का जनता से वादा करके मत-समर्थन मांगते थे। देश का समावेशी विकास उनका प्रमुख लक्ष्य होता था। लेकिन उत्तर-प्रदेश में जिस तरह से मुस्लिम मतदाताओं को राजनीतिक दल एक मजबूत व प्रभावी वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और अन्य मतदाताओं को लैपटॉप का लॉलीपॉप थमाने का भरोसा जता रहे हैं, उससे तय हो गया है कि दलों का न तो विभिन्न समाजों व जातियों के सर्वांगीण विकास से वास्ता रह गया है और न ही सामाजिक सरोकारों से ? देश की अधो-सरंचना कैसे पुख्ता हो और बुनियादी जरूरतें कैसे जन-जन तक पहुंचे, इन्हें भी दल नकार रहे हैं। सही मायनों में तो राजनीतिक दल ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए दोहरे व दोगले चरित्रों के रूप में पेश आ रहे हैं।

उत्तर-प्रदेश चुनाव में कांग्रेस की नहीं बल्कि गांधी परिवार की साख दांव पर है। दिग्विजय सिंह की रणनीति को अमलीजामा पहनाने में लगे राहुल गांधी ने इस प्रदेश में दिन-रात एक कर दिए हैं। लिहाजा वे चुनाव के केंद्र में हैं और काफी कुछ उनका राजनीतिक भविष्य इस प्रदेश के चुनाव के परिणाम पर निर्भर हो गया है। नतीजतन कांग्रेस हरेक उस जंग लगे हथियार को अपना लेना चाहती है, जिससे उसे जरा भी फायदे की उम्मीद है। इसीलिए वह बार-बार गढ़े मुर्दे उखाड़ने से भी बाज नहीं आ रही। इस बावत हम बटला हाउस मुठभेड़ को ले सकते हैं। देश के गृह मंत्री पी. चिदंबरम् बटला हाउस मुठभेड़ को जायज ठहरा चुके हैं। मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए पुलिस अधिकारी के साहस को राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। बावजूद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह इस मुठभेड़ को दिल्ली से लेकर आजमगढ़ तक फर्जी बता रहे हैं। और इसकी जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रहे हैं। पुलिस के अभूतपूर्व दुस्साहस और बलिदान से जुड़े इस मामले पर आ रहे विरोधाभासी बयानों पर कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और राहुल की चुप्पी अफसोसजनक है। गोया, लगता है कि यह सब बयानबाजी उस प्रायोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत कांग्रेस एक साथ हिन्दू और मुस्लिम वोट हथियाना चाहती है। दरअसल कांग्रेस उत्तर-प्रदेश सहित अन्य चारों राज्यों में मुस्लिम वोटों को रिझाने के लिए दिग्विजय सिंह के बयान का सहारा ले रही है और हिन्दू मतदाताओं को ललचाने के लिए चिदंबरम् के बयान का इस्तेमाल कर रही है। यदि यह मुठभेड़ संदिग्ध होती तो केंद्र और दिल्ली में कांग्रेस की ही सरकारें हैं। वह इसकी सच्चाई सामने लाने के लिए सीबीआई अथवा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच बिठा सकती थी ? लेकिन अब तक न तो उसने ऐसा किया और न ही ऐसा भविष्य में भी करने वाली है। क्योंकि जांच के जो नतीजे सामने आएंगे, उससे आखिरकार कांग्रेस की ही फजीहत होगी।

यही हाल समाजवादी पार्टी और उसके सुप्रीमों मुलायम सिंह की है। दरअसल कांग्रेस के बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि सांप्रदायिक कार्ड पहले वह खेलती है, किंतु उसका लाभ दूसरे दल झटक लेते हैं। अयोध्या के राम मंदिर का ताला खुलवाने से लेकर शिलान्यास का मामला हो अथवा शाहबानो प्रकरण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में पलटने का मामला हो, पहल तो कांग्रेस ने की, लेकिन लाभ भाजपा, सपा और बसपा बटोर ले गईं। कांग्रेस का यही हश्र मुस्लिम आरक्षण को लेकर होने जा रहा है। मुलायम सिंह जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी और देवबंद के उलेमा व मौलनाओं को लेकर राजनीति की बिसात पर एकाएक प्रगट हो गए। बुखारी ने मुस्लिमों को केंद्र द्वारा दिए 4.5 फीसदी आरक्षण की न केवल खिल्ली उड़ाई बल्कि बटला हाउस मुठभेड़ को लेकर मुस्लिम जज्बातों से भी खेलने का गंभीर आरोप कांग्रेस पर लगाया। बुखारी यहीं नहीं रूके, उन्होंने एक कदम और आगे बढ़कर मुठभेड़ में मारे गए शाजिद व आतिफ मुस्लिम युवकों की हत्या का आरोप भी कांग्रेस पर मड़ दिया। बुखारी ने मुस्लिमों को दिए आरक्षण को लेकर यह भी साफ किया कि यह आरक्षण पिछड़े वर्ग के कोटे से दिया गया है। नतीजतन कालांतर में इसके गंभीर परिणाम निकलेंगे। हर जिले व कस्बे में एक कौम के लोग, दूसरे कौम के खून के दुश्मन हो जाएंगे। जो राष्ट्र के लिए घातक साबित होंगे।

कांग्रेस के लिए अब मुस्लिम आरक्षण और बटला हाउस मुठभेड़ जैसे कांड गले की हड्डी बन रहे हैं। लिहाजा अब दिग्विजय सिंह बुखारी को आतंकवादियों का हिमायती बताने को मजबूर हुए हैं। अब कांग्रेस मुस्लिमों को नसीहत दे रही है कि वे उलेमा और मौलानाओं के सियासी फतवों से दूर रहें। हालांकि मुलायम सिंह अपने वजूद कायमी के लिए हमेशा ही दोहरी रणनीति अपनाते रहे हैं। उन्होंने अयोध्या के नायक कल्याण सिंह को लोध जाति के वोटों के लिए सपा में शामिल किया। लेकिन अपेक्षित परिणाम न मिलने के कारण निकाल भी दिया। संत साक्षी महराज और डालमिया को राज्यसभा में भेजने का काम भी मुलायम सिंह ने किया। वे मुलायम सिंह ही थे जिन्होंने 2005 में जब उर्दू न्यायिक परीक्षा में अनिवार्य विषय हुआ करता था, उसे परीक्षाओं से हटा दिया था। अब यही मुलायम मुस्लिमों को 18 फीसदी आरक्षण देने की बात कर रहे हैं। तय है मुस्लिमों को भारतीय नागरिक मानने की बजाय, वे एक वोट बैंक मानकर चल रहे हैं।

भाजपा का भ्रष्टाचार को लेकर दोहरा चरित्र पेश आया है। एक तरफ वह देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए रथयात्रा निकालती है, वहीं भ्रष्टाचार के आरोप में बसपा से निष्कासित बाबूसिंह कुशवाहा को गले लगाती है। कांग्रेस और सपा द्वारा मुस्लिम कार्ड खेले जाने के जवाब में वह एक ओर पिछड़े हिंदू मतदाताओं को गोलबंद करने की कवायद में लगी है, वहीं मुस्लिमों को दिए गए आरक्षण को गैर संवैधानिक व तुष्टिकरण की राजनीति का हवाला देकर रद्द करने की बात कर रही है। मंदिर मुद्दे को दोहराकर उसने साफ कर दिया है कि वह दिशाहीन भटकाव की ओर बढ़ रही है।

उत्तर-प्रदेश में सबसे हैरत में डालने वाली बात यह है कि 84 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने के बावजूद बसपा सुप्रीमों मायावती कमोबेश शांत हैं। वे किसी प्रकार न तो मुस्लिम कार्ड खेल रही हैं और न ही उलेमा व मौलानाओं की शरण में जा रही हैं। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि मायावती ने मुस्लिमों को केवल सब्जबाग नहीं दिखाए, बल्कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा टिकट देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने की सकारात्मक पहल की। जबकि कांग्रेस और सपा इस मामले में अभी भी उनसे पीछे हैं। इससे जाहिर होता है मुस्लिम मतदाताओं को ललचाने के कई हथकंड़े अपनाने के बावजूद उन्हें बरगलाना मुश्किल है। समय के थपेड़ों ने उन्हें चालाकी का सबक सिखा दिया है। शायद इसीलिए 1995, 1996 और 2002 में मायावती ने भाजपा के सहयोग से सरकारें बनाईं, बावजूद 2007 में मुस्लिमों ने मायावती को तरजीह दी। इसी स्थिति को बिहार में मुसलमानों ने नीतीश कुमार को समर्थन देकर दोहराया। जबकि भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का नीतीश हिस्सा हैं। नतीजतन अपने वैचारिक धरातलों को नकारते हुए जो दल मुसलमानों को केवल वोट बैंक मानकर चल रहे हैं, उन मुसलमानों ने शायद अब भारतीय नागरिकता का पाठ पढ़ व सीख लिया है। लिहाजा न तो अब वे हवाई वायदों से आकर्षित होने वाले है और न ही इमामों-मौलानाओं के फतवों से प्रभावित होने वाले हैं। सच्चाई तो यह है कि उनके लिए अब कोई दल अछूत नहीं रह गया है। वे उसी दल का समर्थन करेंगे जिन्हें वे अपना पिछड़ापन दूर करने की दृष्टि से आजमा चुके हैं।

2 Responses to “विचारधारा से बड़ा मुस्लिम वोट बैंक”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    भार्गव जी इस चुनाव के बाद मुस्लिम वोट बैंक नाम की कोई चीज़ नहीं रहेगी बेहरहाल पहले मुस्लिम भाई फिर सपाई फिर बसपाई फिर कांग्रेस आई का उसका फार्मूला भाजपा को पूरी तरह दफ़नाने के लिए उसका जारी रहेगा.

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  2. Anil Gupta

    इस बार के चुनाव में मुसलमानों को इस बात का दर नहीं है की भाजपा सत्ता में आ सकती है क्योंकि भाजपाई आपसी गुटबाजी और एक दूसरे की टांग खींचने में व्यस्त हैं और उनके सत्ता में आने की कोई सम्भावना कोई भी नहीं मान रहा है. ऐसे में मुस्लिम मतदाता ये जनता है की शेष दलों में कोई भी सत्ता में आये उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. सलिए किसी दल को मुसलमानों का थोक वोट नहीं पड़ेगा और भाजपा के आलावा सभी दलों को उनका कुछ कुछ वोट मिलेगा लेकिन मेरा मानना है की उनका एक बड़ा हिस्सा पीस पार्टी को जायेगा जिस तरह १९८४ में डी एस ४ के अनुयायियों ने बसपा को वोट दिया था उनका कहना था की सीट बेशक न आये लेकिन पार्टी को मान्यता के लायक चार प्रतिशत से ज्यादा वोट मिल जाएँ, वाही सोच इस बार पीस पार्टी के पक्ष में मतदान कराएगी क्योंकि मुस्लमान औरों के हाथों ठगा जाता रहा है अतः अब उसने अपनी राजनीतिक ताकत को पहचान कर उसका बुद्धिमत्ता पूर्वक इस्तेमाल करने का मन बना लिया है ताकि निकट भविष्य में ही बसपा की भांति वो भी सत्ता में अपनी मजबूत भागीदारी पेश कर सके.ऐसा होने पर प्रदेश की राजनीती में बहुत बड़ी उलटफेर होनी तय है.

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