मै एकान्त हूँ,एकांतवास से बोल रहा हूँ

मै एकान्त में हूँ,पर किसी के इन्तजार में हूँ |
शांत हूँ,पर कल के कोलाहल के इन्तजार में हूँ ||

डरा नहीं हूँ, इस सन्नाटे को देखकर मै आज |
देख रहा हूँ,इसमें भारत के भविष्य का आज ||

भाग दौड़ के माहौल से अलग एकांत चाहता हूँ मै |
अपनी यादो को फिर से जीवन देना चाहता हूँ मै ||

चाहता हूँ उन सबको,जो इस एकान्त में मेरे से बिछड़ गये |
चाहता हूँ उन दोस्तों को,जो इस सफर में आगे निकल गये ||

चाहता हूँ उस प्रेमिका का स्पर्श,जो मेरे एकांत से ऊब गयी |
चाहता हूँ उन चरणों का स्पर्श,जो झुररियों में सिमट गयी ||

मोल भाव भी करना चाहता हूँ,उन फल सब्जी ठेले वालो से |
तू तू मै मै,करना चाहता हूँ,उन सभी बेचारे रिक्शा वालो से ||

इन्तजार उस घड़ी का,जब जोंन चर्च से निकल कर आयेगा |
मेरी टूटी फूटी मोटर सायकिल पर बैठ के घर अपने जायेगा ||

करता है मन मेरा आज मत्था टेकना शीशगंज गुरुद्वारे का |
जूते उतार कर,शीश पे पग पहनकर,पंगत में लंगर खाने का ||

याद आती है आबिद के घर जाकर बढ़िया बिरयानी खाने की |
याद आती है होली व ईद पर उन दोस्तों को गले से लगाने की ||

मै एकांतवास में हूँ केवल इसमें मेरा और मेरे देश का हित होगा |
बाहर निकल कर मै आऊँगा,जब मेरा देश कोरोना से मुक्त होगा ||

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