विश्व इस समय अनेक प्रकार के आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक संकटों के दौर से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने केवल उस क्षेत्र को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। भारत जैसे विकासशील और विशाल जनसंख्या वाले देश पर भी इसका असर स्वाभाविक रूप से दिखाई दे रहा है। पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतें, आयात-निर्यात पर पड़ता प्रभाव, विदेशी मुद्रा पर बढ़ता दबाव तथा वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जैसे अनेक कारण देश की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में यदि देश का नेतृत्व जनता से संयम, बचत और किफायत अपनाने की अपील करता है, तो यह केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं बल्कि राष्ट्रहित में दिया गया दूरदर्शी संदेश होता है।
प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से अपील की गई कि वे अनावश्यक खर्चों से बचें, संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करें तथा आत्मनिर्भरता और बचत की भावना को अपनाएँ। यह अपील किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को ध्यान में रखकर की गई है। आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में यदि विदेशी मुद्रा का अत्यधिक व्यय होगा या ऊर्जा संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग बढ़ेगा, तो इसका सीधा प्रभाव आम नागरिकों के जीवन पर पड़ेगा। इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में किफायत और अनुशासन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश के कुछ विपक्षी दल इस गंभीर विषय पर भी राजनीति करने से नहीं चूक रहे। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना विपक्ष का अधिकार है, किन्तु राष्ट्रीय संकटों और संवेदनशील विषयों पर केवल विरोध के लिए विरोध करना उचित नहीं कहा जा सकता। जब पूरा विश्व आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा हो, तब देश के भीतर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देना ही सच्ची लोकतांत्रिक भावना होती है। जनता भी यह भलीभांति समझती है कि कठिन समय में देश को एकजुट नेतृत्व और सकारात्मक वातावरण की आवश्यकता होती है, न कि भ्रम और विवाद की।
भारत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि संकट की घड़ी में देशवासियों ने सदैव त्याग, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है। वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की थी। उस समय देश खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। शास्त्री जी की सादगी, ईमानदारी और राष्ट्र के प्रति समर्पण ने जनता के मन में इतना विश्वास पैदा किया कि लोगों ने स्वेच्छा से उनके आह्वान को स्वीकार किया। घर-घर में एक समय भोजन छोड़ने का संकल्प लिया गया। उस समय विपक्ष ने भी राष्ट्रीय भावना का सम्मान किया और देशहित में सरकार के साथ खड़ा दिखाई दिया। यही कारण था कि भारत ने कठिन परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना किया।
आज परिस्थितियाँ भले ही अलग हों, किन्तु आवश्यकता उसी राष्ट्रीय भावना की है। देश की आर्थिक मजबूती केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि नागरिकों की जिम्मेदारी और सहयोग से भी सुनिश्चित होती है। यदि प्रत्येक नागरिक ऊर्जा की बचत करे, अनावश्यक विदेशी वस्तुओं के उपभोग से बचे, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दे तथा संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करे, तो यह राष्ट्र निर्माण में एक बड़ी भागीदारी होगी। “बचत” केवल व्यक्तिगत आदत नहीं बल्कि राष्ट्रीय शक्ति का आधार भी है।
विपक्षी दलों को भी यह समझना चाहिए कि जनता अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं देखना चाहती। देश की जनता उन नेताओं को अधिक सम्मान देती है जो कठिन समय में सकारात्मक सोच और सहयोग की भावना प्रदर्शित करते हैं। यदि विपक्ष सरकार की हर अपील को केवल राजनीतिक दृष्टि से देखेगा, तो इससे उसकी विश्वसनीयता कमजोर होगी। लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरा देश एकजुट होकर संयम, अनुशासन और बचत की भावना को अपनाए। संकट के समय राष्ट्रहित को राजनीति से ऊपर रखना ही सच्ची देशभक्ति है। जब सरकार, विपक्ष और जनता एक साथ खड़े होते हैं, तभी देश बड़ी चुनौतियों को पार कर नई शक्ति और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत रही है और भविष्य में भी यही हमारी सफलता का आधार बनेगी।