-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा कर रखी है। भारत जैसा देश, जोकि विश्व की विशाल जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, स्वभाविक है कि अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, स्वाभाविक रूप से इस संकट से प्रभावित है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने, अनावश्यक सोना खरीदने से बचने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की है तो इसमें अनुचित क्या है?
यह अपील न तो किसी भय का संकेत थी और न ही किसी आपातकाल की घोषणा, बल्कि आर्थिक अनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है, किंतु कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे सरकार की विफलता बताकर राजनीतिक हमला शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हर राष्ट्रीय चुनौती को राजनीति के चश्मे से देखना उचित है? क्या राष्ट्रहित में की गई अपील का मजाक उड़ाना जिम्मेदार विपक्ष की पहचान है?
आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, वह सामान्य परिस्थितियां नहीं हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक सप्लाई चेन पहले ही प्रभावित थी। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने कच्चे तेल की आपूर्ति पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है। इस मार्ग में आई बाधा ने तेल की कीमतों में विस्फोटक वृद्धि कर दी है। जिसमें कि भारत लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 90 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है। अब ऐसी स्थिति में यदि सरकार जनता से ऊर्जा संरक्षण की अपील करती है तो यह उसकी दूरदर्शिता ही है, न कि विफलता।
वस्तुत: दुनिया के अधिकांश देश अपने नागरिकों से ऐसे समय में संयम और सहयोग की अपेक्षा करते हैं। जापान, जर्मनी और कई यूरोपीय देशों में ऊर्जा संकट के दौरान नागरिकों ने स्वेच्छा से बिजली और ईंधन की बचत की थी। वहां इसे राष्ट्रहित माना गया, लेकिन भारत में विपक्ष इसे राजनीतिक हथियार बनाने में जुट गया।
प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से कहा कि पेट्रोल-डीजल का कम उपयोग करें, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन अपनाएं, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दें, वर्क फ्रॉम होम और वर्चुअल मीटिंग्स को प्राथमिकता दें तथा सोने की अनावश्यक खरीद से बचें। इनमें ऐसा क्या है जिसे राष्ट्रविरोधी या जनविरोधी कहा जाए?
असल में यह अपील तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है, एक- विदेशी मुद्रा की बचत के संदर्भ में। भारत का व्यापार घाटा मुख्य रूप से तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात से बढ़ता है। सिर्फ सोने के आयात पर ही हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं। दो- ऊर्जा सुरक्षा के लिए। तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। परिवहन महंगा होता है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और अंततः आम जनता प्रभावित होती है।
तीसरा इसका मुख्यकारण देश की आत्मनिर्भरता की दिशा तय करना है। क्योंकि ‘वोकल फॉर लोकल’, इलेक्ट्रिक वाहन, सार्वजनिक परिवहन और डिजिटल कार्य संस्कृति- ये सभी दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती के स्तंभ हैं। प्रधानमंत्री की अपील वर्तमान संकट से निकलने के लिए ही नहीं दिखती, यह तो भारत के हित में भविष्य की तैयारी भी है।
राहुल गांधी की राजनीति: हर मुद्दे में नकारात्मकता
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की अपील को “सरकार की नाकामी” बताते हुए कहा कि जनता को त्याग और बचत की सलाह देना विफल शासन का प्रमाण है, किंतु कहना होगा कि यह तर्क बेहद सतही है। क्योंकि कोई भी राष्ट्र सिर्फ सरकार से नहीं चलता, नागरिकों की भागीदारी उसमें बराबर की चाहिए रहती है। वस्तुत: राहुल गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे हर राष्ट्रीय मुद्दे में विरोध का अवसर खोजते हैं। चाहे सेना का मनोबल हो, विदेश नीति हो, वैक्सीन अभियान हो या आर्थिक अनुशासन, आप देखेंगे कि वे हर जगह नकारात्मकता उनकी राजनीति का आधार बनती हुई दिखी है।
विडंबना यह है कि जिन देशों की आर्थिक नीतियों की कांग्रेस अक्सर प्रशंसा करती है, वहां नागरिक अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। अमेरिका और यूरोप में ऊर्जा संकट के दौरान सरकारों ने हीटिंग कम करने, सार्वजनिक परिवहन बढ़ाने और ईंधन बचाने की अपील की थी। तब उसे जिम्मेदार नेतृत्व कहा गया था।
राहुल गांधी के साथ सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी मोदी सरकार की आलोचना में शामिल दिखाई दे रहे हैं। यह वही राजनीति है जिसमें राष्ट्रीय संकट भी राजनीतिक अवसर बन जाता है। अखिलेश यादव लगातार भाजपा विरोध की राजनीति में इतने आगे बढ़ चुके हैं कि उन्हें हर सरकारी पहल में खामी ही दिखाई देती है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें यह समझ नहीं कि तेल की कीमतों का असर किसानों, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं पर कितना व्यापक पड़ता है? यदि सरकार पहले से लोगों को जागरूक कर रही है और विकल्प सुझा रही है तो इसमें गलत क्या है?
विपक्ष का दायित्व केवल आलोचना करना नहीं होता, बल्कि संकट के समय सकारात्मक सहयोग देना भी होता है। दुर्भाग्य से आज का विपक्ष राष्ट्रहित से अधिक राजनीतिक लाभ-हानि पर केंद्रित दिखाई देता है। दूसरी ओर विपक्ष जिस प्रकार यह चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है कि देश में ईंधन संकट खड़ा हो गया है, वह वास्तविकता से दूर है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में कच्चे तेल और एलपीजी का पर्याप्त भंडार है। किसी पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी से कमी की सूचना नहीं मिली है।
सरकार ने रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। तेल विपणन कंपनियां वैश्विक कीमतें बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर रखने का प्रयास कर रही हैं। कंपनियां प्रतिदिन भारी आर्थिक दबाव झेल रही हैं ताकि आम जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। यानी सरकार अपील ही नहीं कर रही, वह संकट से निपटने के लिए ठोस कदम भी उठा रही
कहना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी का संदेश मूलतः “साझी जिम्मेदारी” का संदेश है। पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रधानमंत्री मोदी की अपील आर्थिक अनुशासन, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक जिम्मेदार पहल है। इसमें न तो भय फैलाने की कोशिश है और न ही जनता पर बोझ डालने का प्रयास। यह एक ऐसी चेतावनी है जो भविष्य की चुनौतियों के प्रति देश को तैयार करने का प्रयास करती है।इसके विपरीत राहुल गांधी और अखिलेश यादव का रवैया राजनीतिक अवसरवाद अधिक प्रतीत होता है। उन्होंने न तो कोई वैकल्पिक समाधान दिया और न ही संकट की गंभीरता को स्वीकार किया।
अच्छा हो कि राजनीतिक दल कम से कम राष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों पर परिपक्वता दिखाएं। यदि देश की ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक स्थिरता मजबूत रहती है तो उसका लाभ हर नागरिक को मिलेगा, चाहे वह किसी भी विचारधारा का समर्थक क्यों न हो।प्रधानमंत्री मोदी की अपील को राजनीति के बजाय राष्ट्रहित के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।