छात्रों में पनपती हिंसक प्रवृत्ति

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प्रमोद भार्गव

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र प्रद्यम्न ठाकूर हत्या मामले में सीबीआई जांच के बाद जो नया मोड़ आया है, वह हैरानी में डालने वाला है। पुलिस और सीबीआई जांच के बाद एक ही सबूतों के आधार पर जो विरोधाभासी निष्कर्ष निकले हैं, उनसे यह संशय भी आम लोगों में उत्पन्न हुआ है कि आखिर किस निष्कर्ष को सही मानें ? यदि परीक्षा और अभिभावक-शिक्षक की बैठक टालने के लिए किसी छात्र द्वारा हत्या जैसा कदम उठाया गया है, तो क्या यह मान लिया जाए कि हम बड़े स्कूलों में भी वह शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं, जो छात्र को गुणवान, उदार और परिवार व देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाने का काम करती हैं। बाहरी लोगों को विद्यालय में प्रवेश से वंचित किया जा सकता है, लेकिन यदि छात्रों में भीतर से हिंसक प्रवृत्ति पनप रही है तो इसे भांपने का काम कौन करेगा ? पहले बच्चों को हत्या या मौत का अर्थ ठीक से पता नहीं होता था, लेकिन वे आज हत्या को किसी समाधान के रूप में देख रहे है तो यह स्थिति स्तब्ध करने वाली है।

सीबीआई जांच से खुलासा हुआ है कि कक्षा 11 का हत्यारा छात्र अमीर बाप की बिगड़ैल औलाद है। क्रूर स्वभाव का यह छात्र मोबाइल पर पोर्न फिल्में भी देखता था। वह अपने सहपाठियों से हमेशा सेक्स और हिंसा की बातें करता था। इस आदत के लती छात्र द्वारा हत्या की घटना को अंजाम देना स्वाभाविक लगता है। इसमें संशय अब इसलिए कम है, क्योंकि आरोपी छात्र ने अपने पिता और एक स्वतंत्र गवाह के सामने अपराध कबूल लिया है। लेकिन यही स्थिति पुलिस जांच में बस परिचालक अशोक कुमार को प्रद्युम्न की हत्या और उसके यौन शोषण का दोषी ठहराते समय बनी थी। तब क्या उसने पुलिस दबाव या हत्यारे छात्र को बचाने के लिए धन कें लालच में ऐसा किया ? क्योंकि 500 करोड़ का मालिक पिता अपनी संतान को कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए पानी की तरह पैसा आसानी से बहा सकता है ? इस लिहाज से पुलिस और पिता की भूमिका की पड़ताल भी करने की जरूरत है।

विद्यालयों में छात्र हिंसा से जुड़ी ऐसी घटनाएं दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में लगातार देखने में आ रही हैं। जबकि पहले अमेरिका जैसे विकसित देशों में ही देखने में आती थीं, लेकिन अब भारत जैसे विकासशील देशों में भी क्रूरता का यह सिलसिला चल निकला है। हालांकि भारत का समाज अमेरिकी समाज की तरह इतना आधुनिक नहीं है कि जहां पिस्तौल अथवा चाकू जैसे हथियार रखने की छूट छात्रों को हो। अमेरिका में तो बंदूक की ऐसी विकृत संस्कृति पनप चुकी है कि अकेले पन के शिकार एवं मां-बाप के लाड-प्यार से उपेक्षित बच्चें घर, मोहल्ले और संस्थाओं में जब-तब पिस्तौल चला दिया करते हैं।

पिछले एक दशक में छात्र-हिंसा से जुड़ी अनेक वारदातें सामने आई हैं। रैंगिग के बहाने छात्र-हिंसा एवं यौन उत्पीड़न के रूप में भी देखने में आई हैं। केरल के एक नर्सिंग काॅलेज में तो रैंगिग के बहाने बलात्कार की घटना भी सामने आई थी। इस घटना ने शिक्षा में मूल्यों के चरम बहिष्कार को रेखांकित कर दिया था। अंग्रेजी में पूर्ण दक्षता नहीं रखने वाले आईआईटी के छात्रों को भी रैगिंग के बहाने अपमान के दंश झेलने पड़ रहे हैं। रैंगिग के शिकार कई छात्रों ने कुण्ठा और अवसाद के दायरे में आकर आत्महत्या को ही गले लगाया है। ऐसे छात्रों के साथ आर्थिक और शैक्षिक असमानता भी हिंसक कारणों की वजह बन रही है। बच्चों को केवल धन कमाऊ कैरियर के लायक बना देने वाली प्रतिस्पर्धा का दबाव भी उन्हें विवेक शून्य बनाकर हिंसक और कामुक हरकतों की ओर धकेल रहा है ? समाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ये ऐसे गंभीर कारण हैं, जिनकी पड़ताल जरूरी है।

आज अभिभावकों की अतिरिक्त व्यस्तता और एकांगिकता जहां बच्चों के मनोवेगों की पड़ताल नहीं करने के लिए दोषी है, वहीं विद्यालय नैतिक और संवेदनशील मूल्य बच्चों में रोपने में सर्वथा चूक रहे हैं। छात्रों पर विज्ञान, गणित, प्रबंधन और वाणिज्य विषयों की शिक्षा का बेवजह दबाव भी बर्बर मानसिकता विकसित करने के लिए दोषी हैं। आज साहित्यिक शिक्षा पाठ्यक्रमों में कम से कमतर होती जा रही है, जबकि साहित्य और समाजशास्त्र ऐेसे विषय हैं जो समाज से जुड़े सभी विषयों और पहलुओं का वास्तविक यथार्थ प्रकट कर बाल-मनों में संवेदनशीलता का स्वाभाविक सृजन करने के साथ सामाजिक विषंगतियों से परिचत कराते हैं। इससे हृदय की जटिलता टूटती है और सामाजिक विशंगतियों को दूर करने के कोमल भाव भी अंकुरित होते हैं। महान और अपने-अपने क्षेत्रों में सफल व्यक्तियों की जीवन-गाथाएं (जीवनियां) भी व्यक्ति में संघर्ष के लिए जीवटता प्रदान करती हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा कोई पाठ्यक्रम पाठशालाओं में नहीं है, जिसमें कामयाब व्यक्ति की जीवनी पढ़ाई जाती हो ? जीवन-गाथाओं में जटिल परिस्थितियों से जूझने एवं उलझनों से मुक्त होने के सरल, कारगर और मनोवैज्ञानिक उपाय भी होते हैं।

भूमण्डलीकरण के आर्थिक उदारवादी दौर में हम बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते कि संचार तकनीक और ईंधन रसायनों का जाल बिछाए जाने की बुनियाद रखने वाले धीरूभाई अंबानी कम पढ़े लिखे साधारण व्यक्ति थे। वे पेट्रोल पंप पर वाहनों में पेट्रोल डालने का मामूली काम करते थे। इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने अपने व्यवसाय की शुरूआत मात्र दस हजार रूपए से की थी और आज अपनी व्यावसायिक दक्षता के चलते अरबों का कारोबार कर रहे हैं। दुनिया में कम्प्यूटर के सबसे बड़े उद्योगपति बिल गेट्स पढ़ने में औसत दर्जे के छात्र थे ? कामयाब लोगों के शुरूआती संघर्ष को पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जाए तो पढ़ाई में औसत हैसियत रखने वाले छात्र भी हीनता-बोध की उन ग्रंथियों से मुक्त रहेंग जो अवचेतन में क्षोभ, अवसाद और संवेदनहीनता के बीज अनजाने में ही बो देती हैं। नतीजतन छात्र तनाव व अवसाद के दौर में विवेक खोकर हत्या, आत्महत्या अथवा बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक कारनामे कर डालते हैं। वैसे भी सफल एवं भिन्न पहचान बनाने के लिए व्यक्तित्व में दृढ़, इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम की जरूरत होती है, जिसका पाठ केवल कामयाब लोगों की जीवनियों से ही सीखा जा सकता है।

शिक्षा को व्यवसाय का दर्जा देकर निजी क्षेत्र के हवाले छोड़कर हमने बड़ी भूल की है। ये प्रयास शिक्षा में समानता के लिहाज से बेमानी हैं। क्योंकि ऐसे ही विरोधाभासी व एकांगी प्रयासों से समाज में आर्थिक विषमता बढ़ी है। यदि ऐसे प्रयासों को और बढ़ावा दिया गया तो विषमता की यह खाई और बढ़ेगी ? जबकि इस खाई को पाटने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो शिक्षा केवल धन से हासिल करने का हथियार रह जाएगी। जिसके परिणाम कालांतर में और भी घातक व विस्फोटक होंगे। समाज में सवर्ण पिछड़े, आदिवासी व दलितों के बीच आर्थिक व सामाजिक मतभेद बढ़ेंगे जो वर्ग संघर्ष के हालातों को आक्रामक व हिंसक बनाएंगे। यदि शिक्षा के समान अवसर बिना किसी जातीय, वर्गीय व आर्थिक भेद के सर्वसुलभ होते हैं तो छात्रों में नैतिक मूल्यों के प्रति चेतना, संवेदनशीलता और पारस्परिक सहयोग व समर्पण वाले सहअस्तित्व का बोध पनपेगा, जो सामाजिक न्याय और सामाजिक संरचना को स्थिर बनाएगा।

वैसे मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आमतौर से बच्चे आक्रामकता और हिंसा से दूर रहने की कोशिश करते हैं। लेकिन मुट्ठी में बंद मोबाइल पर परोसी जा रही हिंसा, कामुकता और सनसनी फैलाने वाले कार्यक्रम इतने असरकारी साबित हो रहे हैं कि हिंसा का उत्तेजक वातावरण विकृत रूप लेने लगा है। यही बालमनों में संवेदनहीनता का बीजारोपण कर रहा है। मासूम और बौने से लगने वाले कार्टून चरित्र भी मोबाइल स्क्रीन पर बंदूक थामे दिखाई देते हैं, जो बच्चों में आक्रोश पैदा करने का काम कर रहे हैं। लिहाजा लगातार दिखाई जा रही हिंसक वारदातों के महिमामंडन पर अंकुश लगाया जाना जरूरी है। यदि बच्चों के खिलौनों का समाजशास्त्रिय एवं मनोवैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे की हथियार, सेक्स और हिंसा का बचपन में अनाधिकृत प्रवेश हो चुका है।

 

 

 

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