राजनीति

खामेनेई के जनाजे में जनरल सैयद अता हसनैन को भेज कर भारत ने साधा संतुलन

राजेश श्रीवास्तव

एक सवाल जो इस वक्त गलियारों में तैर रहा है वो ये कि भारत ने किसी बहुत बड़े सीनियर नेता, जैसे विदेश मंत्री एस जयशंकर या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को तेहरान क्यों नहीं भेजा? सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या विदेश राज्य मंत्री और एक राज्यपाल को खामेनेई के जनाजे में भेजना भारत के इजरायल के प्रति झुकाव का संकेत है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें कूटनीति के प्रोटोकॉल को समझना होगा. इसे इजरायल की तरफ पूरी तरह झुकना कहना जल्दबाजी होगी, बल्कि ये भारत का एक ‘नपा-तुला संतुलन’ है. प्रोटोकॉल का पालन विदेश राज्य मंत्री को भेजना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक आधिकारिक और पर्याप्त प्रतिनिधित्व माना जाता है. इजरायल-अमेरिका को संदेश बहुत बड़े स्तर के नेता को ना भेजकर भारत ने अपने पश्चिमी पार्टनर्स को ये भी साफ कर दिया कि वो ईरान की हर नीति या उसके ‘प्रोक्सी वॉर’ का अंधा समर्थक नहीं है. धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव जनरल हसनैन को भेजना ये दिखाता है कि भारत इस रिश्ते को सिर्फ सियासी चश्मे से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और शिया समुदाय के जुड़ाव के तौर पर देखता है. अगर भारत बहुत हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन भेजता तो इस वक्त इजरायल-हमास और इजरायल-हिजबुल्लाह संकट के बीच वाशिगटन और तेल अवीव में गलत संदेश जा सकता था. इसलिए भारत ने एक बीच का रास्ता चुना, जिससे ईरान का सम्मान भी रह गया और पश्चिमी देशों के साथ भारत के रिश्तों पर कोई आंच भी नहीं आई.

अब सवाल ये उठता है कि जब पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त ईरान पर टिकी हैं, तब भारत ने अपने इस खास दल को तेहरान क्यों भेजा?

भारत ने इस जनाजे में शामिल होने के लिए जो डेलिगेशन भेजा है, वो अपने आप में बहुत अनोखा है. इस दल में बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन शामिल हैं. जनरल हसनैन सिर्फ एक राज्यपाल नहीं हैं, बल्कि वो भारतीय सेना के एक बेहद प्रतिष्ठित रिटायर्ड मिलिट्री कमांडर हैं, जिन्होंने कश्मीर में सेना की कमान संभाली है. इसके साथ ही वो शिया समुदाय से आते हैं और इस संप्रदाय के एक बड़े स्कॉलर भी हैं.

भारत ने जनरल हसनैन को भेजकर एक बहुत बड़ा कूटनीतिक कार्ड खेला है. इस कदम के दो मायने हैं, पहला संदेश ये कि भारत ईरान के शिया नेतृत्व और वहां की जनता की भावनाओं का सम्मान करता है. दूसरा संदेश ये कि भारत ने एक मिलिट्री बैकग्राउंड और धार्मिक समझ रखने वाले व्यक्ति को भेजकर ये जता दिया कि वो ईरान की संवेदनशीलता को कितनी गहराई से समझता है.

डिप्लोमेसी की भाषा में इसे ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ कहते हैं. जिसका सीधा मतलब है कि भारत अपनी विदेश नीति किसी के दबाव में आये बिना खुद तय करता है. एक तरफ भारत की अमेरिका के साथ ‘क्वाड’ में गहरी साझेदारी है, इजरायल के साथ डिफेंस और टेक्नोलॉजी में अटूट दोस्ती है, तो दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रीय संकट के समय भारत उसके साथ खड़ा दिखाई देता है. ऐसे में भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनकर अपनी नीतियों को पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं झुका सकता.

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन दूसरी पीढ़ी के आर्मी अफसर हैं। उनके पिता मेजर जनरल सैयद महदी हसनैन भी आर्मी में थे। 1974 में हसनैन गढ़वाल राइफल्स में कमीशन हुए थे। जम्मू-कश्मीर, सियाचिन, श्रीलंका, पंजाब और नॉर्थ-ईस्ट में तैनात रहे। 2०1० में जम्मू-कश्मीर की 15 कोर (चिनार कोर) की कमान संभाली। करीब 4० साल तक सेना में रहे। एंटी-टेररिज्म, स्ट्रैटजी और डिप्लोमेसी एक्सपर्ट माने जाते हैं।

रिटायरमेंट के बाद 2०18 में वे सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर में चांसलर बने। 2०2० में बतौर सदस्य नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी से जुड़े। फिलहाल बिहार के राज्यपाल हैं। मार्च 2०26 में सैयद अता हसनैन बिहार के 43वें राज्यपाल बने। डेलिगेशन में क्यों चुना गया: ईरान शिया बहुल इस्लामिक देश है और अयातुल्ला खामेनेई शियाओं के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे। सैयद अता हसनैन भी शिया हैं। रिटायर्ड आर्मी अफसर और राज्यपाल जैसा संवैधानिक ओहदा भी रखते हैं।

पबित्र मार्गरिटा, केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री

राजनीति में आने से पहले पबित्र मार्गरिटा असमिया सिनेमा के मशहूर एक्टर, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर थे। 2०14 में वे बीजेपी से जुड़े। पबित्र ने पहले असम बीजेपी के संगठन में काम किया। सोशल मीडिया सेल के प्रभारी, प्रवक्ता और जिला प्रभारी रहे। 2०22 में राज्यसभा सांसद बने। इसी साल असम सीएम हिमंता बिस्व सरमा के पॉलिटिकल सेक्रेटरी नियुक्त किए गए। फिलहाल मोदी कैबिनेट में विदेश और कपड़ा राज्यमंत्री हैं। पबित्र मार्गरिटा जून 2०24 में मोदी सरकार में विदेश और कपड़ा राज्यमंत्री बने।

डेलिगेशन में क्यों चुना गया: सीधे विदेश मंत्रालय का हिस्सा हैं। हाई प्रोफाइल भी नहीं हैं और न ज्यादा लो-प्रोफाइल। ईरान को लेकर भारत के मौजूदा स्टैंड पर फिट बैठते हैं।

एक सवाल जो इस वक्त गलियारों में तैर रहा है वो ये कि भारत ने किसी बहुत बड़े सीनियर नेता, जैसे विदेश मंत्री एस जयशंकर या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को तेहरान क्यों नहीं भेजा? सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या विदेश राज्य मंत्री और एक राज्यपाल को खामेनेई के जनाजे में भेजना भारत के इजरायल के प्रति झुकाव का संकेत है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें कूटनीति के प्रोटोकॉल को समझना होगा. इसे इजरायल की तरफ पूरी तरह झुकना कहना जल्दबाजी होगी, बल्कि ये भारत का एक ‘नपा-तुला संतुलन’ है.

प्रोटोकॉल का पालन विदेश राज्य मंत्री को भेजना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक आधिकारिक और पर्याप्त प्रतिनिधित्व माना जाता है. इजरायल-अमेरिका को संदेश बहुत बड़े स्तर के नेता को ना भेजकर भारत ने अपने पश्चिमी पार्टनर्स  को ये भी साफ कर दिया कि वो ईरान की हर नीति या उसके ‘प्रोक्सी वॉर’ का अंधा समर्थक नहीं है.

धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव जनरल हसनैन को भेजना ये दिखाता है कि भारत इस रिश्ते को सिर्फ सियासी चश्मे से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और शिया समुदाय के जुड़ाव के तौर पर देखता है. अगर भारत बहुत हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन भेजता, तो इस वक्त इजरायल-हमास और इजरायल-हिजबुल्लाह संकट के बीच वाशिगटन और तेल अवीव में गलत संदेश जा सकता था. इसलिए भारत ने एक बीच का रास्ता चुना, जिससे ईरान का सम्मान भी रह गया और पश्चिमी देशों के साथ भारत के रिश्तों पर कोई आंच भी नहीं आई.

पीएम मोदी का बुलावा था, फिर वो खुद क्यों नहीं गए?

एक्सपर्ट्स पीएम मोदी के ईरान न जाने के पीछे 3 छिपी वजहें बताते हैं।

दूसरी वजह अचानक स्टैंड बदलने से आलोचना का खतरा : खामेनेई की मौत पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी। 5 दिन बाद पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी, जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरानी दूतावास जाकर शोक जताया। अब 4 महीने बाद अचानक पीएम मोदी का खामेनेई के जनाजे में जाना पूरी तरह स्टैंड बदलना होगा।

तीसरी और अंतिम वजह साझेदार देशों को गलत मैसेज जाने की चिता : खामेनेई के जनाजे में पीएम मोदी की मौजूदगी भारत के साझेदार और ईरान के विरोधी देशों को नाराज कर सकती है। इनमें अमेरिका, इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यूएई जैसे सुन्नी बहुल देश भी हैं।