डॉ. वन्दना सेन
‘वन्देमातरम्’ केवल दो शब्दों का उद्घोष नहीं है। यह भारत की आत्मा से निकला वह स्वर है, जिसमें मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, समर्पण, गौरव और राष्ट्रभक्ति का भाव एक साथ अभिव्यक्त होता है। जिस भूमि ने हमें जन्म दिया, जिसने हमें अन्न, जल, वायु और जीवन प्रदान किया, उसके प्रति सम्मान प्रकट करना प्रत्येक नागरिक का स्वाभाविक और नैतिक कर्तव्य है। इसलिए ‘वन्देमातरम्’ को किसी राजनीतिक दल, विचारधारा के चश्मे से देखना उसके व्यापक राष्ट्रीय अर्थ को सीमित करना होगा।
भारत की स्वतंत्रता-चेतना के इतिहास में ‘वन्देमातरम्’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में इसके उद्घोष ने असंख्य भारतीयों के भीतर राष्ट्रभक्ति की ऐसी लौ प्रज्वलित की, जिसने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। यह केवल गीत नहीं रहा; यह राष्ट्रीय जागरण का मंत्र बन गया था। इसके उच्चारण मात्र से लोगों के भीतर मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का संकल्प जाग उठता था। यही कारण है कि ‘वन्देमातरम्’ भारतीय राष्ट्रीय चेतना के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में दर्ज है।
आज भी जब ‘वन्देमातरम्’ का स्वर वातावरण में गूँजता है तो उसके साथ देशभाव का उफान दिखाई देता है। विद्यालयों से लेकर सार्वजनिक समारोहों तक और स्वतंत्रता दिवस से लेकर राष्ट्रीय पर्वों तक, इसका उद्घोष लोगों को अपनी जड़ों और अपनी मातृभूमि से जोड़ता है। यह भाव किसी एक समुदाय, वर्ग या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हो सकता। भारत की विविधता में एकता की जो विराट भावना है, ‘वन्देमातरम्’ उसी भावना का सशक्त प्रतीक है।
विडंबना यह है कि जिस ‘वन्देमातरम्’ को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने भी स्वीकार किया और जिसके स्वर ने स्वतंत्रता संघर्ष को ऊर्जा दी, आज उसी के प्रति कांग्रेस के कुछ नेताओं की असहजता दिखाई देती है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जो राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाव कभी स्वतंत्रता संघर्ष के संकल्प का हिस्सा था, उसे आज राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है? यदि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान व्यक्त करने में संकोच होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रभाव की व्यापक अवधारणा पर प्रश्न खड़ा करता है।
स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर नई दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में ‘वन्देमातरम्’ के प्रसंग को लेकर दिखाई देने वाली असहजता ने भी अनेक प्रश्नों को जन्म दिया। राष्ट्रीय पर्वों का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को तीखा करना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना को मजबूत करना होना चाहिए। ऐसे अवसर पर दलगत सीमाएँ पीछे छूटनी चाहिए और भारत की एकता, अखंडता तथा गौरव सर्वोपरि होना चाहिए।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न संविधान के संदर्भ में उठता है। यदि ‘वन्देमातरम्’ के सम्मान या उसके उद्घोष को लेकर कोई विधिक व्यवस्था अस्तित्व में आती है, तो उसका पालन करना प्रत्येक नागरिक और संस्था का संवैधानिक दायित्व होगा। संविधान केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार उद्धृत करने की वस्तु नहीं है। संविधान अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी स्मृति कराता है। इसलिए जो राजनीतिक शक्तियाँ संविधान की रक्षा का दावा करती हैं, उन्हें संविधान की भावना और उसके अनुशासन का समान रूप से सम्मान करना चाहिए।
वस्तुतः राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक किसी दल की राजनीतिक पूँजी नहीं हैं। वे करोड़ों भारतीयों की सामूहिक भावनाओं के प्रतीक हैं। ‘वन्देमातरम्’ के संदर्भ में भी यही दृष्टि अपनाई जानी चाहिए। इसके साथ किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ-हानि का गणित जोड़ना उचित नहीं है। राष्ट्रभक्ति को वोट की राजनीति से जोड़ना स्वयं राष्ट्रभाव को संकीर्ण करना है।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक पंथ और परम्पराएँ हैं, अनेक जीवन-पद्धतियाँ हैं, फिर भी भारत की पहचान एक है। इस एकता को मजबूत करने वाले प्रतीकों और भावनाओं का सम्मान करना आवश्यक है। ‘वन्देमातरम्’ इसी एकता का भावात्मक सूत्र है। यह हमें स्मरण कराता है कि हमारी पहली पहचान हमारी मातृभूमि से है और उसके सम्मान में व्यक्त किया गया स्वर किसी विभाजन का नहीं, बल्कि जुड़ाव का स्वर है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘वन्देमातरम्’ को विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व को समझा जाए। यदि इसके उद्घोष से देशभक्ति का ज्वार पहले उठता था, तो आज भी उठ सकता है। यदि इसके स्वर ने स्वतंत्रता सेनानियों में त्याग और बलिदान की भावना जगाई थी, तो आज यह नई पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध जागृत कर सकता है।
राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना है। किंतु जब कोई नागरिक अपनी मातृभूमि के सम्मान में ‘वन्देमातरम्’ कहता है, तो उसके उस भाव को संदेह की दृष्टि से देखना भी उचित नहीं। राष्ट्र के प्रति श्रद्धा को राजनीति की संकीर्ण सीमाओं में बाँधना भारत की विशाल सांस्कृतिक चेतना के साथ न्याय नहीं होगा।
‘वन्देमातरम्’ इसलिए किसी राजनीतिक दल का विषय नहीं है। यह भारत की पहचान, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और राष्ट्रीय एकता का भावपूर्ण उद्घोष है। इसके स्वर में इतिहास की स्मृति भी है, स्वतंत्रता का संघर्ष भी, बलिदान की गाथा भी और भविष्य के भारत का संकल्प भी। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इसे राजनीति के विवाद से ऊपर उठाकर राष्ट्रभाव की दृष्टि से देखें। जब करोड़ों कंठ एक स्वर में कहते हैं—‘वन्देमातरम्’—तो उसमें केवल शब्द नहीं होते, बल्कि एक राष्ट्र की आत्मा बोलती है।