राजनीति

हेमंत सरकार के निर्णय से एक सड़क से हटा नहीं, दूसरा सड़क पर उतर गया!


रामस्वरूप रावतसरे
झारखंड सरकार ने 17 अगस्त को छात्रों के 26 दिन लंबे आंदोलन के दबाव में  आखिरकार जेएसएससी – सीजीएल समेत टीडीपीएल द्वारा आयोजित परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला कर लिया। इसके साथ ही हेमंत सोरेन की सरकार ने 2014 से अब तक जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं और नियुक्तियों की जांच कराने तथा परीक्षा प्रक्रिया में सुधार के लिए उच्चस्तरीय समिति बनाने की भी घोषणा कर दी। सरकार के इस फैसले से उन छात्रों को राहत मिली है, जो लंबे समय से कथित परीक्षा धांधली की जांच और परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे थे। लेकिन इसी फैसले ने एक दूसरा और शायद ज्यादा कठिन सवाल खड़ा कर दिया है। अगर परीक्षा में कुछ लोगों ने गड़बड़ी की थी तो उन लोगों की पहचान और कार्रवाई करने के बजाय पूरी परीक्षा में सफल होकर नौकरी पाने वाले हर अभ्यर्थी को संदेह की नजर से क्यों देखा जा रहा है?
  विशेषज्ञों की दृष्टि में सरकार ने एक आंदोलन खत्म करने के लिए दूसरा संकट पैदा कर दिया है। हेमंत सरकार का फैसला पहली नजर में छात्रों की जीत दिखाई देता है। लेकिन सड़क पर चल रहे आंदोलन को खत्म करने के लिए एक ऐसा प्रशासनिक फैसला ले लिया है, जिसके दूरगामी परिणाम अब हजारों परिवारों को भुगतने पड़ सकते हैं? यह सवाल इसलिए और गंभीर है क्योंकि जेएसएससी – बीजीएल की परीक्षा पास कर चुके कई अभ्यर्थी अब सरकारी कर्मचारी हैं। वे नौकरी कर रहे हैं और उन्हें वेतन भी मिल रहा है। मगर अब अचानक सरकार कह रही है कि परीक्षा ही रद्द है। तो सवाल है – इन लोगों का क्या होगा?
   हेमंत सरकार के फैसले से नाराज कर्मचारी मंगलवार को भारी बारिश के बावजूद रांची के प्रोजेक्ट भवन के बाहर पहुंचे। उनका सवाल बेहद सीधा है और इसे नजरअंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। एएसओ के पद पर कार्यरत एक अन्य कर्मी का सवाल सरकार के लिए और असहज करने वाला है। उनका कहना है कि उन्होंने अदालत के फैसले के बाद नौकरी ज्वाइन की थी। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद 141 पेज के फैसले के आधार पर नियुक्ति हुई। ऐसे में यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी को दोषी मान लेना कहां का न्याय है?
     एक बड़ा तथ्य यह कि इन कर्मचारियों के सवालों का सरकार के पास फिलहाल कोई साफ और स्पष्ट जवाब दिखाई नहीं देता लेकिन अब झारखंड की हेमंत सरकार को बताना होगा कि- परीक्षा में गड़बड़ी हुई या पूरी भर्ती प्रक्रिया ही भ्रष्ट थी? यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। अगर सरकार के पास यह प्रमाण है कि पूरी जेएसएससी -सीजीएल परीक्षा ही भ्रष्ट तरीके से आयोजित हुई थी, तो सरकार को सार्वजनिक तौर पर बताना चाहिए कि किस स्तर पर क्या गड़बड़ी हुई। कौन अधिकारी जिम्मेदार था? किस एजेंसी की भूमिका संदिग्ध थी? कितने अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ मिला? कितने अभ्यर्थियों ने वास्तव में धोखाधड़ी की? क्या हर चयनित उम्मीदवार को किसी न किसी गड़बड़ी का लाभ मिला था? और अगर सरकार यह साबित नहीं कर सकती कि हर चयनित उम्मीदवार की सफलता संदिग्ध थी, तो पूरी परीक्षा और उससे हुई नियुक्तियों को एक साथ खत्म करने का नैतिक और कानूनी आधार क्या है?
  नौकरी कर रहे कर्मचारियों के अनुसार पहले जांच होती तो तथ्य सामने आते। दोषी अलग किए जाते और निर्दाष अलग किए जाते। उसके बाद परीक्षा और नियुक्तियों पर फैसला होता लेकिन सरकार ने पहले परीक्षा रद्द कर दी और अब जांच की बात कर रही है। क्या यह न्याय की उचित प्रक्रिया है? सवाल तो यह भी कि एक छात्र आंदोलन को खत्म करने के लिए हजारों युवाओं का भविष्य दांव पर क्यों?
  जानकार कहते हैं कि दरअसल, हेमंत सरकार ने छात्रों की मांग मानकर शायद यह मान लिया कि परीक्षा रद्द कर देने से विवाद खत्म हो जाएगा, लेकिन विवाद अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ने की दिशा में अग्रसर है। छात्र अब भी सीबीआई जांच और अन्य परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। यानी सरकार ने इतना बड़ा फैसला लिया, लेकिन जिस आंदोलन को शांत करने के लिए फैसला लिया गया, वह पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ। दूसरी ओर जिन लोगों ने परीक्षा पास की और नौकरी हासिल की, वे अब अपनी नौकरी जाने के डर से सरकार के खिलाफ खड़े हैं।
   झारखंड में एक तरफ आंदोलनकारी छात्र संतुष्ट नहीं हुए और दूसरी तरफ नौकरी कर रहे कर्मचारियों में असुरक्षा और आक्रोश पैदा हो गया। क्या सरकार ने एक समस्या का समाधान किया या दो नए मोर्चे खोल दिए? सरकार को यह भी बताना होगा कि निर्दाष साबित हुए तो नौकरी वापस कैसे मिलेगी? मान लीजिए जांच होती है और जांच में बड़ी संख्या में कर्मचारी निर्दाष निकलते हैं, तब क्या होगा? क्या सरकार उन्हें उसी पद पर वापस लाएगी? क्या उनकी वरिष्ठता सुरक्षित रहेगी? जिस अवधि में उन्होंने नौकरी नहीं की, उस अवधि का वेतन और सेवा लाभ मिलेगा?
   विशेषज्ञों के अनुसार  छात्रों की मांग सुनना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सिर्फ छात्रों की बात सुनना ही सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। लोकतंत्र में सरकार का काम सबसे ऊंची आवाज सुनना नहीं, बल्कि सबसे कमजोर और सबसे ज्यादा प्रभावित व्यक्ति के अधिकार की रक्षा करना भी है। आज परीक्षा पास कर नौकरी पाने वाला कर्मचारी शायद सरकार के सामने उतनी बड़ी संख्या में सड़क पर नहीं है और उसके हाथ में नारे लिखी तख्तियां नहीं हैं। वह आंदोलन भी नहीं कर रहे लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि उसका दर्द कम है!
     जानकारों के अनुसार अब इस पूरे मामले के अदालत में जाने की पूरी संभावना है। और अगर मामला हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है तो वहां सरकार से पूछा जा सकता है कि परीक्षा रद्द करने का ठोस आधार क्या है? क्या सभी चयनित अभ्यर्थियों को सुनवाई का अवसर दिया गया? क्या व्यक्तिगत दोष तय किए गए? क्या पूरी परीक्षा रद्द करना ही एकमात्र विकल्प था? क्या कम कठोर उपायों से दोषियों पर कार्रवाई संभव नहीं थी? और सबसे महत्वपूर्ण – क्या निर्दाष अभ्यर्थियों के अधिकारों को बचाने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई?
    इस सारे घटना कर्म को निष्पक्ष तौर पर देख रहे लोगों का कहना है कि सरकार अगर सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए और दोषियों को चिन्हित करना चाहिए।  जांच निष्पक्ष होनी चाहिए एवं जरूरत पड़े तो सीबीआई या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो, परीक्षा प्रणाली बदली जाए। लेकिन, एक बात सरकार को हर हाल में सुनिश्चित करनी होगी – किसी दोषी को बचाया नहीं जाए और किसी निर्दाष को सिर्फ इसलिए नहीं कुचला जाए। क्योंकि वह गलत समय पर सही परीक्षा पास कर गया था। झारखंड के छात्रों को न्याय चाहिए। लेकिन नौकरी कर रहे उन युवाओं को भी न्याय चाहिए जिन्होंने उसी सरकारी व्यवस्था के तहत परीक्षा पास की है।