टेलिविज़न मनोरंजन

भारत के मीडिया जगत को चाहिए एक समावेशी और सशक्त प्रेस काउंसिल

नव ठाकुरीया

भारत सरकार ने अपनी कानूनी और स्वायत्त संस्था—जो प्रिंट मीडिया की निगरानी और उसके अधिकारों की रक्षा करती है—में खाली पदों को भरने के लिए 13 मीडिया पेशेवरों को नामित किया है। इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकार बिरादरी को अब बेहतर दिनों की उम्मीद है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को पूर्ण रूप से गठित न करने के कारण कई तरफ से कड़ी आलोचना झेलने के बाद, नई दिल्ली में केंद्र सरकार ने 7 अक्टूबर 2026 को 15वीं काउंसिल का पुनर्गठन किया। इसमें अखबारों और समाचार एजेंसियों से जुड़े छह संपादकों और सात कामकाजी पत्रकारों को शामिल किया गया। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली PCI में 14 सदस्य थे, जिनमें कानून निर्माता, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), साहित्य अकादमी के प्रतिनिधि और कुछ अखबारों के मालिक शामिल थे। हैरानी की बात यह है कि 29 सदस्यों वाली 15वीं काउंसिल का कार्यकाल 18 दिसंबर 2027 को समाप्त हो जाएगा।
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक अधिसूचना में कहा गया, “प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978 (1978 का 37) की धारा 5 की उप-धारा (3) के क्लॉज (a) और उप-धारा (5) तथा धारा 6 की उप-धारा (1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, केंद्र सरकार प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए इन सदस्यों को नामित करती है: संपादक—प्रदीप कुमार जैन, सैयद रज़ा हुसैन रिज़वी, अंकुर दुआ, अपर्णा शुक्ला, राज परवाना/नरेंद्र सिंह और विनोद बाजपेयी; और कामकाजी पत्रकार—विनोद कोहली, गीतार्थ पाठक, प्रज्ञानानंद चौधरी, किंगशुक प्रमाणिक, सीके नायक, प्रसन्न कुमार मोहंती और बिजोय काकचिंगताबम।”
लेकिन कई महीनों से अर्ध-न्यायिक PCI कामकाजी पत्रकारों (संपादकों सहित) की श्रेणी के प्रतिनिधियों के बिना ही काम कर रही थी। PCI को शुरू में 1966 में ‘प्रेस काउंसिल एक्ट, 1965’ के तहत बनाया गया था और बाद में दक्षिण एशियाई देश में मुख्यधारा की मीडिया की आजादी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ‘प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978’ के तहत 1979 में इसे फिर से स्थापित किया गया। जस्टिस आरपी देसाई, जिन्होंने 17 जून 2022 से 16 दिसंबर 2025 तक PCI चेयरमैन के तौर पर काम किया, उन्होंने 24 अप्रैल 2026 को एक बार फिर वही पद संभाला। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज को तीन साल के एक और कार्यकाल के लिए नामित किया गया था। लेकिन PCI की 15वीं काउंसिल को पूरा करने के लिए काम करने वाले पत्रकारों का कोटा खाली ही रहा (http://www.presscouncil.nic.in/CurrentMemberPCI.aspx)।
कुछ महीने पहले, राज्यसभा (भारतीय संसद का ऊपरी सदन) के एक सदस्य ने यह मुद्दा उठाया था और सस्मित पात्रा ने नई दिल्ली में केंद्र सरकार से मौजूदा PCI को पूरा करने का आग्रह भी किया था, ताकि मीडिया पर नजर रखने वाली यह संस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा और मीडिया की जवाबदेही को मजबूत करने का अपना काम कर सके। ओडिशा से बीजू जनता दल के नेता पात्रा ने कहा कि एक आजाद, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस के लिए 14वीं काउंसिल (जिसका कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को खत्म हो गया था) के बाद पूरी काउंसिल का गठन जरूरी था। इससे पहले, संबंधित मंत्रालय ने संसद को बताया था कि इन सदस्यों (काम करने वाले पत्रकारों की श्रेणी के तहत) के नामांकन की प्रक्रिया दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन थी।
चेयरपर्सन (आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज को यह पद दिया जाता है) के अलावा, PCI में 28 सदस्य होते हैं, जिनमें से 13 सदस्य पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। छह सदस्य अखबारों के मैनेजमेंट (मालिकों सहित) का प्रतिनिधित्व करते हैं—इनमें बड़े, मध्यम और छोटे अखबारों से दो-दो सदस्य लिए जाते हैं—जबकि एक सदस्य समाचार एजेंसियों का प्रतिनिधित्व करता है। संसद के दोनों सदनों से आमतौर पर पांच सदस्य आते हैं और BCI, UGC और साहित्य अकादमी से तीन लोगों को नामित किया जाता है; साथ ही छोटे अखबारों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों को भी काउंसिल में जगह मिलती है।
अब तक PCI में काम करने वाले सदस्यों में डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, बृज लाल (राज्यसभा सांसद), डॉ. संबित पात्रा, नरेश गणपत म्हास्के और काली चरण मुंडा (लोकसभा सदस्य), प्रो. अश्विनी के. महापात्रा (UGC), मनन कुमार मिश्रा (BCI), डॉ. के. श्रीनिवासराव (साहित्य अकादमी), सुधीर कुमार पांडा, एम.वी. श्रेयम्स कुमार, गुरिंदर सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी, ब्रज मोहन शर्मा और आरती त्रिपाठी (ये सभी बड़े, मध्यम या छोटे अखबारों के मालिक हैं या उनके मैनेजमेंट का काम देखते हैं) शामिल रहे हैं।
PCI के लिए संकट तब शुरू हुआ जब कुछ राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों (जिनमें इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज़ कैमरामैन एसोसिएशन शामिल हैं) ने PCI के नियमों में बदलाव का कानूनी तौर पर विरोध किया। इस बदलाव के तहत, वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय मंच के बजाय अलग-अलग प्रेस क्लबों से सदस्य चुने जाने थे। उनका तर्क है कि प्रेस क्लब मूल रूप से मनोरंजन के लिए बने संगठन हैं और उनका दायरा आमतौर पर किसी खास इलाके, शहर या कस्बे तक ही सीमित होता है। कई प्रेस क्लब अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए गैर-पत्रकारों (जैसे शिक्षाविदों, लेखकों, फिल्मी हस्तियों और राजनयिकों) को भी सदस्यता देते हैं; इसलिए, हो सकता है कि उनके सदस्य कई अहम मौकों पर पेशेवर मीडिया कर्मियों के हितों के साथ सही न्याय न कर पाएं।
भारत का प्रिंट मीडिया जगत बहुत बड़ा है, जिसमें ‘रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज़पेपर्स फॉर इंडिया’ द्वारा मान्यता प्राप्त 1,00,000 से ज्यादा प्रकाशन शामिल हैं, जो अलग-अलग भाषाओं और समय-अंतराल (जैसे दैनिक, साप्ताहिक आदि) पर प्रकाशित होते हैं। एक अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश में लगभग 400 सैटेलाइट न्यूज चैनल भी हैं, साथ ही हजारों पोर्टल, व्हाट्सऐप चैनल और अन्य डिजिटल मीडिया आउटलेट भी मौजूद हैं। कोविड-19 महामारी के बाद, जब वैकल्पिक मीडिया ने फाइनेंशियल मार्केट पर कब्जा करना शुरू किया, तो भारतीय अखबारों की कमाई (बिक्री और विज्ञापन दोनों से) लगातार घटती गई। हालांकि, प्रिंट मीडिया पर नजर रखने वाले कई लोगों का मानना है कि पारंपरिक मीडिया धीरे-धीरे अपने अचानक हुए नुकसान से उबर जाएगा। पाठकों की संख्या में फिर से बढ़ोतरी की उम्मीद है क्योंकि डिजिटल थकान से परेशान उपभोक्ता जल्द ही भरोसेमंद जानकारी के लिए प्रिंट मीडिया की ओर लौटेंगे। अनुमान है कि 2030 तक भारतीय प्रिंट मीडिया के पाठकों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि PCI के पास किसी भी अखबार/न्यूज़ एजेंसी या संपादक/काम करने वाले पत्रकार के खिलाफ शिकायतें स्वीकार करने का अधिकार है, अगर वे पेशेवर दुर्व्यवहार करते हैं, जिससे पत्रकारिता के व्यवहार का स्तर गिरता है। हालांकि, दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के लिए प्रिंट आउटलेट और उनके संपादकों व पत्रकारों को दंडित करके अपने दिशा-निर्देशों को लागू करने की उसकी शक्ति सीमित है। कई मीडिया पेशेवर PCI को फिर से संगठित करने (इसका नाम बदलकर ‘मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया’ करने) की मांग कर रहे हैं, ताकि टेलीविजन चैनल, रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसके अधिकार क्षेत्र में आ सकें।
चूंकि प्रेस काउंसिल को यह देखने का अधिकार है कि क्या प्रेस की गारंटीकृत आजादी के संबंध में किसी सरकार का आचरण उचित है या नहीं, इसलिए पत्रकार समुदाय एक ऐसी काउंसिल की मांग कर रहा है जो ज्यादा अधिकार-संपन्न हो और जिसका दायरा बड़ा हो।