निजता के संरक्षण की पहल

 प्रमोद भार्गव

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार माना है। देशके हर नागरिक पर असर डालने वाले इस फैसले पर विपक्ष और सरकार ने एक-दूसरे को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष ने इसे सरकार के लिए झटका बताया है, जबकि केंद्रीय कानून मंत्री रविषंकर प्रसाद ने पलटवार करते हुए कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस बात की पुष्टि की है, जो संसद में आधार बिल पेश करते हुए कही गई थी। निजता तार्किक बंदिशों के सापेक्ष मौलिक अधिकार होना चाहिए।‘ प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्शता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी है कि ‘निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार तथा निजी स्वतंत्रता के अधिकार और संविधान के खंड तीन के पूरे भाग का स्वाभाविक अंतर्भूत हिस्सा है।‘ कोर्ट की यह व्यवस्था सभी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ लेने के लिए ‘आधार‘ को अनिवार्य बनाए जाने के केंद्र सरकार की पहल को दी गई चुनौतियों के संदर्भ में आई है। हालांकि इस याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार की दलील थी कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है, इसके उलट याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यदि कोई नागरिक अपना बायोमेट्रिक्स तथा निजी ब्यौरा सरकार को देता है और उसका इस्तेमाल व्यावसायिक संगठन करते हैं तो यह निजता का उल्लंघन है। आधार, बायोमेट्रिक्स और व्हाट्सप कानून ही नहीं सरकार ‘मानव डीएनए सरंचना विधेयक‘ लाकर भी मनुष्य की जिंदगी के राज जानने के कानून उपायों में लगी है।  निजी स्वतंत्रता के तहत निजता का अधिकार भी शामिल है, यह सवाल गुजरे सात दशकों में कई बार सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया है। संविधान में नागरिकों को कुछ ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिनके छीने जाने पर वह हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। हालांकि इन अधिकारों को भी कुछ सीमाएं हैं, जिनका जिक्र भी संविधान में है। अब तक दो अवसर ऐसे आए हैं, जब अदालत की संविधान पीठ ने उस पर विचार किया है। 1954 में बहुचर्चित एमपी शर्मा प्रकरण में आठ सदस्यीय और 1962 के खड़क सिंह मामले में छह जजों की पीठ इस नतीजे पर पहुंची कि भारतीय संविधान में निजता के अधिकार की व्यवस्था नहीं है। लेकिन अब नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा है कि ‘निजता का अधिकार स्वाभाविक रूप से जीवन और उसकी स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ हैं।‘ स्पष्ट है कि 55 वर्ष बाद न्यायपालिका ने इस प्रष्न की बिल्कुल अलग व्याख्या की है। लेकिन उसके इस नजनिए का विशेष संदर्भ है। असल में संविधान कहीं भी निर्जीव अभिलेकख नहीं होता और ना ही कानून पत्थर की लकीर होते हैं। बदलती परिस्थतियों के मुताबिक इनका बदलना समय की जरूरत है। ऐसा इसलिए भी हुआ है क्योंकि अब निजता के संरक्षण की बात वैश्विक फलक पर की जाने लगी है। नतीजतन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निजता के संरक्षण का वातावरण निर्मित हुआ है। यही वजह है कि निजता को मानवाधिकारों का अंग माना जाने लगा है। दरअसल संचार क्रांति के आने के बाद आधुनिक तकनीक का लोगों की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है कि चाहे-अनचाहे उस अपनी निजी व गोपनीय जानकारियां आधार, बैंक, पेन, एटीएम, मोबाइल डेविट-क्रेडिट, पेटीएम और जमीन-जायदाद के दस्तावेजों के साथ साझा करना होता है। अब इसके आगे भी केंद्र सरकार की मंशा है कि वह प्रत्येक नागरिक की कुण्डली तैयार करने कीदृष्टि से ‘मानव डीएनए सरंचना विधेयक-2015‘ को संसद के दोनों सदनों से पारित करा ले।कालातंर में यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो देशके हरेक नागरिक का जीन आधारित कंप्युटरीकृत डाटाबेस तैयार हो जाएगा। चुनांचे एक क्लिक पर मनुष्य की आतंरिक जैविक जानकारियां पर्दे पर होंगी। लिहाजा इस विधेयक को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 में आम नागरिक के मूल अधिकारों में दर्ज गोपनीयता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन माना जा रहा है। हालांकि इसे अस्तित्व में लाने के प्रमुख कारण अपराध पर नियंत्रण और बीमारी का रामबाण इलाज बताए जा रहे हैं। सवा अरब की आबादी और भिन्न-भिन्न नस्ल व जाति वाले देशमें कोई निर्विवाद व आशंकाओं से परे डाटाबेस तैयार हो जाए यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि अब तक हम न तो विवादों से परे मतदाता पहचान पत्र बना पाए और न ही नागरिक को विषिश्ट पहचान देने का दावा करने वाला आधार कार्ड ? लिहाजा देशके सभी लोगों की जीन कुण्डली बना लेना भी एक दुश्कर कार्य लगता है ? हां, तकनीक आधारित इस डाटाबेस को तैयार करने के बहाने प्रौद्योगिकी उत्पादों से जुड़ी कंपनियों के जरूर बारे-न्यारे हो जाएंगे।

जीन संबंधी परिणामों को सबसे अहम् चिकित्सा के क्षेत्र में माना जा रहा है। क्योंकि अभी तक यह शत-प्रतिशत तय नहीं हो सका है कि दवाएं किस तहर बीमारी का प्रतिरोध कर उपचार करती हैं। जाहिर है,अभी ज्यादातर दवाएं अनुमान के आधार पर रोगी को दी जाती हैं। जीन के सूक्ष्म परीक्षण से बीमारी की सार्थक दवा देने की उम्मीद बढ़ गई है। लिहाजा इससे चिकित्सा और जीव-विज्ञान के अनेक राज तो खुलेंगे ही, दवा उद्योग भी फलेगा। इसीलिए मानव-जीनोम से मिल रही सूचनाओं का दोहन करने के लिए दुनिया भर की दवा और जीन-बैंक उपकरण निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियां अरबों का न केवल निवेष कर रही हैं, बल्कि राज्य सत्ताओं पर  जीन बैंक बनाने का पर्याप्त दबाव भी बना रही हैं।हालांकि जीन की किस्मों का पता लगाकर मलेरिया, कैंसर, रक्तचाप, मधुमेह और दिल की बीमारियों से कहीं ज्यादा कारगर ढंग से इलाज किया जा सकेगा, इसमें कोई आशंका नहीं है। लेकिन इस हेतु केवल बीमार व्यक्ति अपना डाटाबेस तैयार कराए, हरेक व्यक्ति का जीन डाटा इकट्ठा करने का क्या औचित्य है ? क्योंकि इसके नकारात्मक परिणाम भी देखने में आ सकते हैं। यदि व्यक्ति की जीन-कुडंली से यह पता चल जाएगा कि व्यक्ति को भविश्य में फलां बीमारी हो सकती है, तो उसके विवाह में मुष्किल आएंगी ? बीमा कंपनियां बीमा नहीं करेंगी और यदि व्यक्ति, एड्स से ग्रसित है तो रोग के उभरने से पहले ही उसका समाज से बहिष्कार होना तय है। गंभीर बीमारी की शंका वाले व्यक्ति को खासकर निजी कंपनियां नौकरी देने से भी वंचित कर देंगी। जाहिर है, निजता का यह उल्लंघन मानवाधिकारों के हनन का प्रमुख सबब बन जाएगा ? मानव डीएनए सरंचना विधेयक अस्तित्व में आ जाता है तो इसके क्रियान्वयन के लिए बड़ा ढांचागत निवेष भी करना होगा। डीएनए नमूने लेने, फिर परीक्षण करने और फिर डेटा संधारण के लिए देशभर में प्रयोगशालाएं बनानी होंगी। प्रयोगशालाओं से तैयार डेटा और आंकड़ों को राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर सुरक्षित रखने के लिए डीएनए डाटा-बैंक बनाने होंगे। जीनोम-कुण्डली बांचने के लिए ऐसे सुपर कंप्युटरों की जरूरत होगी, जो आज के सबसे तेज गति से चलने वाले कंप्युटर से भी हजार गुना अधिक गति से चल सकें। बावजूद महारसायन डीएनए में चलायमान वंशाणुओं की तुलनात्मक गणना मुष्किल है। इस ढांचागत व्यवस्था पर नियंत्रण के लिए विधेयक के मसौदे में डीएनए प्राधिकरण के गठन का भी प्रावधान है। हमारे यहां आजादी के 70 साल बाद भीे राजस्व-अभिलेख, बिसरा और रक्त संबंधी जांच-रिपोर्ट तथा आंकड़ों का रख-रखाव विष्वसनीय व सुरक्षित नहीं है। भ्रष्टाचार के चलते जांच प्रतिवेदन व डेटा बदल दिए जाते हैं। ऐसी अवस्था में आनुवंशिक रहस्यों की गलत जानकारी व्यक्तिगत स्वंतत्रता तथा सामाजिक समरसता से खिलवाड़ कर सकती है ? बावजूद निजी जिनेटिक परीक्षण को कानून के जरिए अनिवार्य बना देने में कंपनियां इसलिए लगी हैं, जिससे उपकरण और आनुवंशिक सूचनाएं बेचकर मोटा मुनाफा कमाया जा सके ? बहरहाल इन जानकारियों को निरापद मानना एक भ्रम भी हो सकता है। जैसा कि क्लोन के आविश्कार के समय दावा किया गया था कि पृथ्वी से विलुप्त हो चुके जीवों की मृत कोशिका से उक्त जीव का पुनर्जीवन संभव हो जाएगा ? लेकिन अब तक ऐसा हो नहीं पाया, ऐसा ही हश्र जीन बैंक में जमा डाटाबेस का भी हो सकता है। हालांकि अब सुप्रीमकोर्ट के फैसले ने निजता के संरक्षण की जो पहल की उसके तईं अब इस विधेयक को मूल प्रारूप में संसद में प्रस्तुत करना ही मुश्किल है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,180 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress