सत्य सदा निर्भीक है, झेले लाख प्रहार।
झूठ महल-सा ढह पड़े, आते ही उजियार॥
कर्म बिना मिलता नहीं, जीवन में सम्मान।
मेहनत ही लिखती सदा, मानव की पहचान॥
वाणी ऐसी बोलिए, दे सबको विश्वास।
शब्दों से ही बन सके, जीवन का इतिहास॥
क्रोध जलाए स्वयं को, जैसे धधके आग।
क्षमा शीतल छाँव है, देती सुख अनुराग॥
माता-पिता का मान जो, रखता हर पल साथ।
उसके जीवन में सदा, खिलते शुभ दिन-रात॥
लोभ बढ़ाए प्यास को, घटे नहीं संताप।
संतोषी के द्वार पर, रहता सुख प्रताप॥
ज्ञान तभी उपयोग हो, जब हो विनय विचार।
फल से झुकती डाल ही, पाती है सत्कार॥
निंदा करके और की, मत खो अपना मान।
अपने कर्मों से बनो, जग में श्रेष्ठ इंसान॥
धन से ऊँचा मान है, मान से ऊँचे कर्म।
कर्मों से ही जीव का, जग में बनता धर्म॥
छोटा दीपक रात में, हरता तम का भार।
एक किरण भी कर सके, जग का यूँ उद्धार॥
समय न रुकता एक पल, रखता सबका लेख।
जो आलस में खो गया, पाया केवल क्लेश॥
रिश्तों का आधार है, विश्वासों की डोर।
टूटी यदि यह बार इक, कठिन मिले फिर छोर॥
सेवा सबसे श्रेष्ठ है, सबसे सुंदर दान।
पीड़ित आँसू पोंछना, सच्चा है सम्मान॥
ईर्ष्या की चिंगारियाँ, करती मन बीमार।
प्रेम सुधा बरसाइए, होगा जग साकार॥
ऊँचा वही मनुष्य है, जिसके ऊँचे भाव।
पद से कोई कब बड़ा, बड़े हृदय के चाव॥
दर्प सदा ले डूबता, विनय करे उत्थान।
झुकती डाली फल भरे, यह प्रकृति का ज्ञान॥
सपनों को मत छोड़िए, रखिए दृढ़ विश्वास।
मेहनत से मिलती सदा, मंजिल अपने पास॥
भाषा में हो प्रेम यदि, मिट जाएँ तकरार।
मीठे बोलों से सजे, जीवन का संसार॥
सच्चा मित्र वही बने, दे जो सही सलाह।
सुख में सब साथी मिलें, दुख में मिले न राह॥
धैर्य कभी मत छोड़िए, आए चाहे काल।
काले बादल छँट गए, निकला फिर से भाल॥
संस्कारों की छाँव में, खिलता हर परिवार।
प्रेम जहाँ पर बस गया, होता सुखद अपार॥
नारी का सम्मान ही, संस्कृति की शान।
जिस घर उसका मान हो, बसता है भगवान॥
जल की हर इक बूँद का, रखना सदा विचार।
बूँद-बूँद से ही बने, जीवन का आधार॥
पेड़ लगाओ प्रेम से, धरती का श्रृंगार।
हरियाली से ही मिले, जीवन को विस्तार॥
अहंकार के राज में, टूटे हर संबंध।
प्रेम जहाँ मुस्का उठे, खिलते सारे छंद॥
भाग्य नहीं लिखता स्वयं, लिखते अपने कर्म।
पुरुषार्थ के सामने, झुकता हर दुष्कर्म॥
मन निर्मल हो प्रेम से, मिट जाएँ विकार।
अंतर का उजियाल ही, सबसे बड़ा श्रृंगार॥
काँटों में भी मुस्करा, खिलता सुंदर फूल।
विपदा में जो हँस सके, वही बने अनमोल॥
जीवन एक किताब है, कर्म बने अध्याय।
जैसा लिखते रोज़ हम, वैसा फल अभिप्राय॥
नाम अमर होता नहीं, केवल रहते बोल।
सेवा, सत्य, सद्कर्म से, जीवन हो अनमोल॥
– डॉ. प्रियंका सौरभ