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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-हजरत साज रहमानी ‘फिरदोसी बाबा’

हिन्दू-धर्म ही संसार में सबसे प्राचीन धर्म है’- यह एक प्रसिद्ध और प्रत्यक्ष सच्चाई है। कोई भी इतिहासवेत्ता आज तक इससे अधिक प्राचीन किसी धर्म की खोज नहीं कर सके हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि हिन्दू-धर्म ही सब धर्मों का मूल उद्गम-स्थान है। सब धर्मों ने किसी-न-किसी अंश में हिन्दू मां का ही दुग्धामृत पान किया है। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास जी का वचन है- ‘बुध किसान सर बेद निज मते खेत सब सींच।‘ अर्थात् वेद एक सरोवर है, जिसमें से (भिन्न-भिन्न मत-मतान्तरों के समर्थक) पण्डितरूपी किसान लोग अपने-अपने मत (सम्प्रदाय) रूपी खेत को सींचते रहते हैं।

उक्त सिद्धान्तानुसार इस्लाम को भी हिन्दू माता का ही पुत्र मानना पड़ता है। वैसे तो अनेकों इस प्रकार के ऐतिहासिक प्रमाण हैं, जिनके बलपर सिद्ध किया जा सकता है कि इस्लाम का आधार ही हिन्दू-धर्म है; परन्तु विस्तार से इस विषयको न उठाकर यहाँ केवल इतना ही बताना चाहता हूँ कि मूलत. हिन्दू-धर्म और इस्लाम में वस्तुत. कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं। इस्लाम के द्वारा अरबी सभ्यता का अनुकरण होने के कारण ही दोनों परस्पर भिन्न हो गये हैं।

धर्मानुकूल संस्‍कृति भारत में ही है

वास्तविक सिद्धान्त तो यही है कि किसी देश की सभ्यता और संस्कृति पूर्णरूप से धर्मानुकूल ही हो; परन्तु भारत के अतिरिक्त और किसी भी देश में इस सिद्धान्त का अनुसरण नहीं किया जाता। वरन् इसके विपरीत धर्म को ही अपने देश की प्रचलित सभ्यता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न किया जाता है। यदि किसी धर्म प्रवर्तक ने सभ्यता को धर्मानुकूल बनाने का प्रयत्न किया भी तो उसके जीवन का अन्त होते ही उसके अनुयायियों ने अपने देश की प्रचलित सभ्यता की अन्धी प्रीति के प्रभाव से धर्म को ही प्रचलित सभ्यता का दासानुदास बना दिया। श्री मुहम्मद जी के ज्योति-में जोत समाने के पश्चात् इस्लाम के साथ भी यही बर्ताव किया गया। केवल इसी कारण हिन्दू-धर्म और इस्लाम में भारी अन्तर जान पड़ता है।

प्राचीन अरबी सभ्यता में युद्ध वृत्ति को विशेष सम्मान प्राप्त है। इसी कारण जब अरब के जनसाधारण के चित्त और मस्तिष्क ने इस्लाम के नवीन सिद्धान्तों को सहन नहीं किया, तब वे उसे खड्ग और बाहुबल से दबाने पर उद्यत हो गये- जिसका परिणाम यह हुआ कि कई बार टाल जाने और लड़ने-भिड़ने से बचे रहने की इच्छा होते हुए भी इस्लाम में युद्ध का प्रवेश हो गया, परन्तु उसका नाम ‘जहाद फी सबीलउल्ला’ अर्थात् ‘ईश्वरी मार्ग के लिये प्रयत्न’ रखकर उसे राग-द्वेष की बुराइयों से शुद्ध कर दिया गया।

गंगा के दहाने में डूबा

श्रीमुहम्मद जी के स्वर्ग गमन के पश्चात् जब इस्लाम अरबी सभ्यता का अनुयायी हो गया, तब जेहाद ही मुसलमानों का विशेष कर्तव्य मान लिया गया। इसी अन्ध-श्रद्धा और विश्वास के प्रभाव में अरबों ने ईरान और अफगानिस्तान को अपनी धुन में मुस्लिम बना लेने के पश्चात् भारत पर भी धावा बोल दिया। यहाँ अरबों को शारीरिक विजय तो अवश्य प्राप्त हुई, परन्तु धार्मिक रूप में नवीन इस्लाम की प्राचीन इस्लाम से टक्कर हुई, जो अधिकपक्का और सहस्रों शताब्दियों से संस्कृत होने के कारण अधिक मजा हुआ था। अत. हिन्दू धर्म के युक्ति-युक्त सिद्धान्तों के सामने इस्लाम को पराजय प्राप्त हुई। इसी सत्य को श्रीयुत मौलाना अल्ताफ हुसैन हालीजी ने इन शब्दों में स्वीकार किया है-

वह दीने हिजाजीका बेबाक बेड़ा।

निशां जिसका अक्‍साए आलम में पहुंचा।।

मजाहम हुआ कोई खतरा न जिसका।

न अम्‍मांमें ठटका न कुल्‍जममें झिझका।।

किये पै सिपर जिसने सातों समुंदर।

वह डूबा दहाने में गंगा के आकर।।

अर्थात् अरब देश का वह निडर बेड़ा, जिसकी ध्वजा विश्वभर में फहरा चुकी थी, किसी प्रकार का भय जिसका मार्ग न रोक सका था, जो अरब और बलोचिस्तान के मध्य वाली अम्मानामी खाड़ी में भी नहीं रुका था और लालसागर में भी नहीं झिझका था, जिसने सातों समुद्र अपनी ढाल के नीचे कर लिये थे, वह श्रीगंगा जी के दहाने में आकर डूब गया। ‘मुसद्दए हाली’ नामक प्रसिद्ध काव्य, जिसमें उक्त पंक्तियाँ लिखी हैं, आज तक सर्वप्रशंसनीय माना जाता है। इन पंक्तियों पर किसी ने कभी भी आक्षेप नहीं किया। यह इस बात का प्रसिद्ध प्रमाण है कि इस सत्य को सभी मुस्लिम स्वीकार करते हैं, परन्तु मेरे विचार में वह बेड़ा डूबा नहीं, वरन् उसने स्नानार्थ डुबकी लगायी थी। तब अरबी सभ्यता का मल दूर करके भारतीय सभ्यता में रँग जाने के कारण वह पहचाना नहीं गया।

क्योंकि आचार-व्यवहार-अनुसार तो हिन्दू-धर्म और इस्लाम में कोई भेद ही नहीं था। अरबी सभ्यता यहाँ आकर उस पर भोंड़ी सी दीखने लगी; क्योंकि हिन्दू-धर्म और हिन्दू-सभ्यता एक दूसरे के अनुकूल हैं और यहाँ सैद्धान्तिक विचारों, विश्वासों और आचरण में अनुकूलता होने के आधार पर ही किसी व्यक्ति का सम्मान किया जाता है। अत: इस्‍लाम पर हिन्‍दुओं के धर्मांचरण का इतना प्रबल प्रभाव पड़ा कि सर्वसाधारण के आचार-व्‍यवहार में कोई भेदभाव न रहा। यदि विशिष्ट मुस्लिमों के हृदय भी पक्षपात से अलग हो जाते तो अरबी और फारसी भाषाओं के स्थान पर हिन्दी और संस्कृत को इस्लामी विचार का साधन बना लिया जाता। अरबी संस्कृति को ही इस्लाम न मान लिया जाता तथा भारतीय इतिहास के माथे पर हिन्दू-मुस्लिम-दंगों का भोंड़ा कल. न लगा होता; क्योंकि वास्तव में दोनों एक ही तो हैं।

इस्‍लाम में उपनिषदों के सिद्धांत

मौलाना रूम की मसनवीको पढ़ देखो, गीता और उपनिषदों के सिद्धान्तों के कोष भरे हुए मिलेंगे, संतमत के सम्बन्ध में उनका कथन है-

मिल्‍लते इश्‍क अज हमां मिल्‍लत जुदास्‍त।

आशिकां रा मजहबों मिल्‍लत खुदास्‍त।

अर्थात् ‘भक्तिमार्ग सब सम्प्रदायों से भिन्न है। भक्तों का सम्प्रदाय और पन्थ तो भगवान् ही है।’ संतजन सत्य को देश, काल और बोली के बन्धनों से मुक्त मानते हैं। ‘समझेका मत एक है, का पंडित, का शेख॥’ वे सत्य को प्रकट करना चाहते हैं। इसी से जनसाधारण की बोली में ही वाणी कहते हैं। जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-

का भाषा, का संस्‍कृत, प्रेम चाहिये सांच।

काम जु आवै कामरी का लै करै कमाच।।

इसी सिद्धान्त के अनुसार मुसलमान संतों ने भी कुरआनी शिक्षा को जनता की बोली अर्थात हिन्दी भाषा के दोहों और भजनों के रूप में वर्णन किया, तो उसे सबने अपनाया। क्योंकि उनके द्वारा ही दोनों धर्मों की एकता सिद्ध हो गयी थी। बाबा फरीद के दोहों को ‘श्रीगुरु ग्रन्थ साहब’- जैसी सर्व-पूज्य धार्मिक पुस्तक में स्थान प्राप्त हुआ। निजामुद्दीन औलिया ने स्पष्ट कहा है-

मीसाक के रोज अल्लाह का मुझसे हिन्दी जबान में हमकलाम हुआ था। अर्थात् ‘मुझे संसार में भेजने से पूर्व जिस दिन भगवान् ने मुझसे वचन लिया था, तो मुझसे हिन्दी बोली में ही वार्तालाप किया था।’ मलिक मुहम्मद जायसी, बुल्लेशाह इत्यादि अनेकों मुसलमान संतों ने हिन्दी में ही इस्लामी सत्य का प्रचार किया, जो आज भी वैसा ही लोकप्रिय है। अरबी भाषा के पक्षपातियों ने ईरान इत्यादि मुस्लिम देशों में भी संतों की वाणी के विरुद्ध आन्दोलन किया था।

मौलवियों की करतूतें

भारतीय मुसलमान संतों पर भी मौलवियों ने कुफ्रके फतवे (नास्तिक होने की व्यवस्थाएँ) लगाये। इसी खींचातानी का परिणाम यह हुआ कि वास्तविक इस्लाम न जाने कहाँ भाग गया।

इसका कारण यह था कि तअस्सुब (पक्षपात) ने मौलवी लोगों को अंधा कर दिया था। इसकी व्याख्या मौलाना हाली से सुनिये। वह कहते हैं –

हमें वाइजोंने यह तालीम दी है।

कि जो काम दीनी है या दुनयवी है।।

मुखालिफ की रीस उसमें करनी बुरी है।

निशां गैरते दीने हकका यही है।

न ठीक उसकी हरगिज कोई बात समझो।

वह दिनको कहे दिन तो तुम रात समझो।।

अर्थात् ‘हमें उपदेशकों ने यह शिक्षा दी है कि धार्मिक अथवा सांसारिक-कोई भी काम हो, उसमें विरोधियों का अनुकरण करना बहुत बुरा है। सत्य धर्म की लाजका यही चि. है कि विरोधी की किसी बात को भी सत्य न समझो। यदि वह दिन को दिन कहे तो तुम उसे रात समझो।’ इसके आगे कहा गया है-

गुनाहों से होते हो गोया मुबर्रा।

मुखालिफ पै करते हो जब तुम तबर्रा।।

‘जब तुम विरोधी को गाली देते हो (सताते हो) तो मानो अपने अपराधों से शुद्ध होते हो।‘

बस, मौलवियों के इन्हीं सिद्धान्तों और बर्तावों ने हिन्दू मुसलमानों को पराया बनाने का प्रयत्न किया, जिसका भयानक परिणाम आज विद्यमान है। नहीं तो, हिन्‍दू-धर्म ने कट्टर मुसलमान बादशाहों के राज्‍य में भी जनसाधारण पर ऐसा प्रभाव डाला था कि मुसलमान लेखक अपनी हिन्‍दी-रचनाओं में ‘श्रीगणेशाय नम:’, ‘श्रीराम जी सहाय’, ‘श्री सरस्‍वती जी,’ ‘श्री राधा जी’, ‘श्री कृष्‍ण जी सहाय’, आदि मंगलाचरण लिखने को कुफ्र (नास्तिकता) नहीं समझते थे। प्रमाण के लिये अहमद का ‘सामुद्रिक’, याकूबखाँ का ‘रसभूषण’ आदि किताबें देखी जा सकती है। अरबी के पक्षपातियों की दृष्टि में भले ही यह पाप हो, परन्तु ‘कुरआन’ की आज्ञा से इसमें विरोध नहीं है।

इस्‍लाम चमक उठा था

कुरआन की इन्हीं आज्ञाओं को मानकर ईरान के एक कवि ने म.लाचरण का यह पद पढ़ा है –

बनाम आंकिह कि ऊ नामे नदारद।

बहर नामे के रबानी सर बरारद।।

अर्थात् उसके नाम से आरम्‍भ करता हूं कि जिसका कोई नाम नहीं है, अत: जिस नाम से पुकारो-काम चल जाता है।

यदि पक्षपाती और कट्टर मौलवी ऊधम न मचाते, संसार स्‍वर्ग बन जाता। क्‍योंकि हिन्‍दू-धर्म के पवित्र प्रभाव से, मंजकर इस्‍लाम चमक उठा था। सत्याग्रही और न्यायशील मुसलमानों ने तो मुसलमान शब्द को भी ‘हिन्दू’ शब्द का समर्थक ही जाना। इसी कारण से सर सय्यद अहमद खाँ ने कई बार अपने भाषणों में हिन्दुओं से प्रार्थना की कि उन्हें हिन्दू मान लिया जाय, जिस पर उन्हें अपने लिये काफिर की उपाधि ग्रहण करनी पड़ी।

यदि दोनों धर्मों में सैद्धान्तिक एकता सिद्ध न की जाय, तो निबन्ध अधूरा रह जायगा; परन्तु वास्तव में इसकी आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि जैसे हिन्दू-धर्म किसी एक सम्प्रदाय का नाम नहीं है, वरन् मानवधर्म के अनुयायी सभी सम्प्रदाय हिन्दू कहलाते हैं-

कारण कि मानव-धर्मका ही एक नाम हिन्दू-धर्म भी है, और ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाले आर्य समाज जैसे सम्प्रदाय भी हिन्दू ही कहलाते हैं- उसी प्रकार इस्लाम में भी अनेकों सम्प्रदाय विद्यमान हैं। खुदाकी हस्ती (ईश्वर का अस्तित्व) न मानने वाला नेचरी फिरका भी मुसलमान ही कहलाता है।

इस्‍लाम और अद्वैत

पक्षपाती और कट्टर मुसलमानों को जिस तौहीद (अद्वैत) पर सबसे अधिक अभिमान है और जिसे इस्लाम की ही विशेषता माना जाता है, उसके विषय में जब हम कुरआन की यह आज्ञा देखते हैं-

कुल आमन्‍ना बिल्‍लाहि माउंजिल अलेना व मा उंजिल अला इब्राहीम व इस्‍माईल व इस्‍हाक व यअकूब वालस्‍वाति व मा ऊती मूसा व ईसा वलबीय्यून मिंर्रबिहिम ला नुफर्रिकु बैन अहदिम्मिन्‍हुम व नह्न लहु मुस्लिमून।

अर्थात् (ऐ मेरे दूत! लोगों से ) कह दो कि हमने ईश्वर पर विश्वास कर लिया और जो (पुस्तक अथवा वाणी) हमपर उतरी है, उसपर और जो ग्रन्थ इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक, याकूब और उसकी सन्तानों पर उतरी, उसपर भी तथा मूसा, ईसा और (इनके अतिरिक्त) अन्य नबियों (भगवान् से वार्तालाप करने वालों) पर उनके भगवान् की ओर से उतरी हुई उन सब पर (भी विश्वास रखते हैं) और उन (पुस्तकों तथा नबियों) में से किसी में भेद-भाव नहीं रखते और हम उसी एक (भगवान्) को मानते हैं। और इस आज्ञा के अनुसार तौहीद को समझने के लिये हिन्दू-सद्ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं, तो जान पड़ता है कि मौलवी लोग तौहीद को जानते ही नहीं। यदि जानते होते हो स्वर्गीय स्वामी श्री श्रद्धानन्द, महाशय राजपाल इत्यादि व्यक्तियों की हत्या का फतवा (व्यवस्था) न देते और न पाकिस्तान ही बनता।

पंजाब और बंगाल का घृणित हत्याकाण्ड भी देखने में न आता। जहाँ तक मैंने खोज की है, मौलवियाना इस्लाम में यह तौहीद ‘दिया’ लेकर ढूँढ़ने से भी नहीं मिलती, हाँ, संतों के इस्लाम में इसी का नाम तौहीद है।

मिआजार कसे व हर चिन्‍ह खाही कुन।

कि दर तरीकते मन गैर अजीं गुनाहे नेस्‍त।।

अर्थात् ‘किसी को दु.ख देने के अतिरिक्त और तेरे जी में जो कुछ भी आये, कर; क्योंकि मेरे धर्म में इससे बढ़कर और कोई पाप ही नहीं।’

दिल बदस्‍तारद कि ह‍ज्जि अकबरस्‍त।

अज हजारां कआबा यक दिल बेहतरस्‍त।।

अर्थात्- दूसरों के दिल को अपने वश में कर लो, यही काबाकी परम यात्रा है; क्योंकि सहस्रों काबों से एक दिल ही उत्तम है। कुरआन में भगवान् ने बार-बार कहा है-

इनल्लाह ला यहुब्बुल्जालिमीन (अथवा मुफ्सिदीनइ त्यादि) अर्थात् भगवान् अत्याचारियों (अथवा फिसादियों) से प्रसन्न नहीं होता।

एक हदीस में भी आया है-

सब प्राणी भगवान् के कुटुम्बी हैं। अत. प्राणियों से भगवान् के लिये ही अच्छा बर्ताव करो- जैसा अच्छा कि अपने कुटुम्ब वालों से करते हो। इस इस्लाम और हिन्दू-धर्म में कोई भेद नहीं।

(साभार-कल्‍याण)

17 Responses to “इस्‍लाम भी हिन्‍दू-माता का पुत्र है”

  1. abuzar alam

    यह तो मुझे अच्छा लगा के आपने ऐसे विषय पर लिखा है लेकिन बात जो है यह है के आपने कुर’आन का जो तर्जुमा किया है उसमे आपने कहा है विश्वास की बात कही है तो यह विश्वास की ही बात है न की उपासना की . विश्वास उपासना नहीं है उसका matlab यह है के हम उन्हें सच्छा मानें क्यूंकि अल्लाह ने उन्हें भेजा .

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  2. ajit bhosle

    अपने विचार फिरदोसी बाबा के लिए व्यक्त करने के बाद मुझे ध्यान आया की मैंने मो.शाकिर खान साहब के विचारों को भी तरजीह देनी चाहिए, जैसा की इन्होने फरमाया है की हिन्दू कोई धर्म नहीं यह शब्द तो हिंद की धरती पर रहने वालों के लिए उपयोग में लाया जाता है, तो इनकी यह बात स्वतः फिदोसी बाबा की बातों की पुष्टि करती है(कम से कम हिन्दुस्तान के मुसलमानों के सन्दर्भ में ) क्योंकि निश्चित रूप से उनकी माओं ने भी हिंद में ही जन्म लीया हे और उन्होंने भी, अतः मेरा मंतव्य अब सबके समझ में आ गया होगा. जब उनके अनुसार हिन्दुस्तान में रहने वाला हर प्राणी हिन्दू है चाहे वह इंसान हो या जानवर तो शाकिर साहब आप ने भी तो इंसान के रूप में ही हिन्दुतान में जन्म लिया है.

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  3. ajit bhosle

    mai bhi firdosi baba ko muslim nahi mantaa, ve fijool ki baat kah rahe hain, agar unhone(muslimo ke poorvajo ne) hindoo mataao kaa dugdh-paan kiyaa hota to ve sansaar bhar me chal rahee hinsaatmak gatividhiyo me lipt nahee paaye jaate, hindu mataao kaa dugdh-paan karne ke baad insaan hinsak ho hee nahee saktaa, wah nek, sadaachaaree or keval unnattee ke baare me hee sochegaa, swarthee hogaa kabhee bhee apne jaatee bhaaiyon par hone wale attyaacharo par apnee pritikriyaa nahee degaa, mujhe udaaharan dene ki jarurat nahee pad rahee kyonki varsho se kasmir or 24 parganaa me ye sab baate hum-logo ke saamne khule-aam ho rahee hai atah mai firdosee baba ke muslim hone ko sire se kharij kartaa hoon or unki baaton se bilkul bhee sahmat nahee hoon.

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  4. sriom gupta

    kripya , asa vishay hi n laya kare jusase “do logo” ke bich se viprit vichar ana shuru ho jay………………………………. dhanywad.

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  5. GOPAL K ARORA

    सच्चाई कुछ लोगों को कडवी लगाती है पर कडवी हो या मीठी सच्चाई तो सचाई ही रहेगी … उच्चतम न्यायालय ने काफी विस्तार से चर्चा के बाद अपने निर्णय में लिखा की “हिन्दू एक जीवन पद्धति का नाम है” इस जीवन पद्धति में दानवता से मानवता की ओर बढ़ने की प्रेरणा है… यहाँ कर्त्तव्य प्रधानता है.. इसा दिशा में करने योग्य हर कर्म को धर्मं का नाम दिया गया है…. ऐसे धर्म-प्रधान कर्मों की भरमार होने से ऐसी जीवन पद्धति का प्रचलित नाम “हिन्दू धर्म” बना… यह ऐतिहासिक सत्य है कि इसे कोई किसी भी नाम से पुकारे पर यह “हिन्दू धर्म” निश्चित रूप से इस्लाम से पूर्व विद्ध्यमान था या कह सकते हैं कि इस्लाम से पूर्व जन्मा था .. इसलिए फिरदौसी बाबा के इस कथन पर कि “इस्लाम भी हिन्दू माता का पुत्र है ” किसी को एतराज क्यों हो ? पर सच्चाई स्वीकारना हर एक के बूते की बात नहीं होती.. फिरदौसी बाबा को एक सुन्दर लेख के लिए बधाई ….

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  6. Anil Sehgal

    श्रीमान हजरत साज रहमानी ‘फिरदोसी बाबा’ जी आपका लेख है
    – “इस्‍लाम भी हिन्‍दू-माता का पुत्र है”.
    – May I suggest, instead, plead :
    “We all are children of God. God is one. So we all natives of India, that is Bharat, are brothers and sisters of same God.”
    – Janab, why say इस्‍लाम भी हिन्‍दू-माता का पुत्र
    – आपने ही लिखा है के – हिन्दू-धर्म किसी एक सम्प्रदाय का नाम नहीं है, वरन् मानवधर्म के अनुयायी सभी सम्प्रदाय हिन्दू कहलाते हैं.

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  7. Md. Shakir Khan

    Mujhe to firdosi baba ke islami hoe per shak hai , ye baba ye sab bhadkau lekh sohrat paane ke liye kar raha hai, isko ye pata nahi hai ki in sab baaton se dilo me nafrat bharti hai.
    firdosi baba ko hindu ka matalab nahi pata hai, Hindu ka arth hota hai hindustan me rahne wala((sanskrit grammer ke anusar)jaise Hindi grammer me “EE” ki matra se Jagah ka bidg hota Jaise Panjabi, nepali, bangali, bihari theek usi tarah sanskrit grammer me “U” ki matra se us jagah ka bodh hota hai jaise Hindu(Hind me rahne wala) , Bindu (Bindu re sambandhit),Indu etyadi,
    firdoshi baba ko to ye bhi pata nahi hai ki Shankracharya ji Kaha hai ki hindu koi dharm hi nahi hai ,Hindu se to us jagah ke rahe wale ka bodh hota hai aur Hindu Shabd kishi bhi Hindu granth me ek bar bhi istemaal nahi hua hai i.e Kalki puran , ramcharitmanas, upnishad, ved,valmiki ramayan etc.
    Han hindustan me rahne wala har ek pranee hindu hai chahe wo insan ho ya phir janwar.
    firdosi baba kahte hai ki Hazrat nizamuddin baba se Allah hindi me baat karta hai to wo jhoote hai aur inko quran ka gyan nahi hai kyonki Allah sirf Nabiyon se hi kalam karta tha aur is batcheet ko “wahi ” kahte hai,
    Firdoshi likhte hai ki Sir Sayyed per isliye fatwa lagaya gya ki woh kate the ki inko hindu bana liya jaaye bilkul jhoot ” sir sayyed ne quran per comment kiya tha ” goya apne ko Allah se jyada samajhdar samajh raha tha .

    is baba ko agar maloom nahi to mai bata deta hoon ki Muhammad (SAW) ke duniya me tasreef lane ke baad sari pichli baate aur rawayte mansookh(discontinue) kar di gayeen , Huzoor S.A.W. ke baad na koi nabi aayega na koi dharam,
    ye baba phir kah rahen hain ki “खुदाकी हस्ती (ईश्वर का अस्तित्व) न मानने वाला नेचरी फिरका भी मुसलमान ही कहलाता है” to jisne klhuda ka aur nabi ka inkar kiya fasiq aur rafji bad akida ho sakta hai musalmaan nahi ho sakta hao,
    Agar dilo ko jeetna kaba jane se achha hota to Guru Nanak kaba nahi jate

    Islam ka parchar parsaar talwar aur jang ke bal per nahi hua iska parchar parsaar iske sadachar aur achhaeyon pakijgi ke karan hua , hindustan me islam ki hukumat since year 605 se lekar 1857 tak rahi , islam ki saltnat me kabhi suraj dooba hi nahi.
    pakistan ka banna ek rajneetik uddand tha
    tauheed ke mana ek hone ke hai.

    firdosi baba aap ko chahiye ki sahi se kitabo ka addhyan karen aur kisi aalim se apne imaan ki islah kar le

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  8. mazharuddeen khan

    firdosi baba first read principle of islam then he comment in this matter. he did not think than islam is a best religion in word and he did not make any distance with neighbour but some person involve to against Islam, firdosi baba also one of them. i say any religion can not be make hate in his follower but some person make hate in two neighbour who are living peaceful. quran,s aayat gave everyperson way of living and respect of all religion,s follower. so why some people misbehave muslim,s and islam. please do not upload any article. Mazharuddeen Khan Editor Rajasthan Gaurav Bhiwadi (Alwar)

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  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    shree firdausi baba ji kalyan ank ki jaankaari taja karne ke liye sadhuwad .toheed ki barabree ka tod bhi hai shreemadbhagvadgeeta men .men uska ullekh sirf isliye kar raha hun ki idhar jo hindu paksh ke perokaar hain we bhi jaane ki touheed ka jabaab wo nahin jo we jnmbhoomi ke naam par ya satta men aajaane ke uddeshy se kar rahe hain
    naantiasmi mam divyaanaam vibhootinaam paramtaph:
    esh tuddeshthprokto विभूतेर्विस्तरो mayaa.
    geeta -10/40

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  10. S

    Islam is a cult just like Christianity is, in fact, Islam is a bad copy of Christianity, no more and no less. Hindus should stop trying to defend Islam and think about the fact that they have lost a lot of their land to these barbarians in the form of Afghanistan, Pakistan and Bangladesh. In modern times, they have lost Kashmir to Islam, Nagaland to Southern Baptist Church and Mizoram to Baptists and Presbytarian churches. Central and South India are under the assault of Catholic church and St. Paul’s Evangelical church, among the most prominent.

    Stop trying to justify the barbaric Abrahamic faiths.

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  11. सुमित कर्ण

    सुमित कर्ण

    “इस्लाम भी हिन्दू माता का पुत्र है” मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई अतिश्योक्ति है.यह बिलकुल निर्विवाद सत्य है.तभी तो हम कहते है कि हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई, कुछ मजहबियों कि वजह से पुरे इस्लाम को शक कि नज़रों से देखा जाता है.
    लेखक साहब ने क्या खूब कहा है कि “सब धर्मों ने किसी-न-किसी अंश में हिन्दू मां का ही दुग्धामृत पान किया है।” इस हिसाब से तो सभी धर्म के लोग एक ही जननी के पुत्र हुए. फिर,भाई भाई में वैमनस्य कैसा? क्यूँ हम अपने ही भाई के बैरी बने हुए है? क्यूँ फिर हिन्दू मुस्लिम के दंगे होते है? क्यों कश्मीर में सिखों के सुरक्षा पर सवाल उठता है?
    यह सब इस बात कि ओर इशारा करता है कि हम केवल जबानी रूप से भाईचारे कि बातें करते है,जबकि रूहानी रूप से हम अभी भी असमंजस में पड़े हैं.

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  12. shishir chandra

    shaandaar lekh hai. meri taraph se pravkta team ko badhai.
    hindu sanskriti ko log jaan bujh kar undekha kar dete hain. anyatha aisi koi sanskriti nahi. sanskrit to sab bhasaon ki janni hai. muslim santon ne bhi hindu sanskriti ko parimarjit kiya hai. jaysi, kabir aur kavi rahim iske udahran hain.

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  13. दीपा शर्मा

    Deepa sharma

    Bahut acha lekh he. Ham sab ko isi ekta ki zarurat he. Aur hindu muslim maulviuo se savdhan rehne ki jarurat he. Hinduo me bhe aaj kae fatwedhari hain. Aaj ka sabse bada saty he ki hamko apni ekta par bal dena hoga

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

      दीपाजी आपने कहा।
      (१) “Hinduo me bhe aaj kae fatwedhari hain”
      कृपा करेंगी, और बाताएंगी दीपाजी, कि यह फतवा किसके नामसे और किसपर निकला हुआ है?
      आप पर तो नहीं निकला ना?
      कुछ हमें भी पता चले कि कौनसे हिंदू फतवे निकाल रहे हैं?
      किस समाचार पत्र में छपा है यह फतवा?
      या छपे बिना ही निकला हुआ है?
      उसका कुछ प्रमाण प्रस्तुत करें।आप पर यदि निकला है, तो बहुत बुरा है। ऐसा नहीं होना चाहिए।
      या हो सकता है, किसीने हिंदुओंकी बदनामी करने के उद्देश्यसे कोई फतवा निकाल दिया हो।
      फिर भी आप इसी बिंदुपर (अन्य विषयों मे ना फैलाते हुए) जब भी आपकी परीक्षा समाप्त हो उत्तर दीजिएगा।
      परिक्षामें आप उज्ज्वल सफलता पाएं। इस शुभेच्छाके साथ। विराम।

      Reply

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