लेखक परिचय

विशाल आनंद

विशाल आनंद

लेखक पिछले तेरह सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। फिलहाल पिछले पांच सालों से ‘मिशन इण्डिया’ नई दिल्‍ली से प्रकाशित अखबार में ‘कार्यकारी संपादक’ पद पर हैं। वर्ष 2009 में इन्‍हें ‘बेस्‍ट न्‍यूज एडीटर ऑफ द ईयर’ पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया गया।

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-विशाल आनंद

”क्या वह प्रेस, जिसका व्यापारिक लाभ के लिए संचालन होता है और जिसका इस प्रकार नैतिक पतन हो जाता है, स्वतंत्र है? इसमें संदेह नहीं कि पत्रकार को जिंदा रहने और लिखने के लिए धन कमाना जरूरी है, किन्तु उसको धन कमाने के लिए ही जिंदा रहना और लिखना नहीं चाहिए। प्रेस की पहली स्वतंत्रता इसमें है कि व्यापार से उसका छुटकारा हो। जो संपादक या स्वामी प्रेस के पतन के लिए जिम्मेदार है और जो उसको अर्थ का दास बना देता है, दण्ड पाने के योग्य है और इस आरंभिक दासता के लिए दण्ड वह बाह्य दासता है, जिसे प्रेस का नियंत्रण कहते हैं अथवा कदाचित उसका जिंदा रहना ही उसका दण्ड है।” -कार्ल मार्क्‍स: ”अर्ली राइटिंग्स” पृष्ठ 40

कार्ल मार्क्‍स की इस बात का हवाला मैं इसलिए दे रहा हूं क्योंकि आज पत्रकारिता को उसी दिशा में घसीटकर ले जाया जा रहा है। दूसरा सच यह भी है कि ”पत्रकारिता व्यवसायिक घरानों की गुलाम हो गई है।” यह बदलाव पिछले दो दशक से देखने को मिल रहा है। बदलाव के साथ साधन-संसाधन भी बदले हैं और संपादकों की सोच भी बदली है। सामाजिक सरोकारों से जो रिश्ता समाचार पत्र का हुआ करता था, अब वो आहिस्ता-आहिस्ता सुविधा संपन्न-समृध्द समाज से प्रगाढ़ हो चुका है। यही वजह है आम आदमी की आवाज पन्ने के किसी कोने में सिंगल कॉलम या दो चार लाइनों में सिमट कर रह जाती है और ‘ऐश्वर्या को सर्दी-जुकाम’ हो जाने की खबर पहले पन्ने पर पहुंच जाती है। हालांकि कुछ एक अखबारों-न्यूज-चैनलों को छोड़ अधिकांश अखबारों और चैनलों ने ‘आदर्श पत्रकारिता’ की अर्थी उठा दी है। या यू कहें कि निजी और व्यापारिक हितों की खातिर पत्रकारिता को पूंजी पतियों ने अपनी ‘रखैल’ बना लिया है। जिससे हर रोज जबरर्दस्ती और सामूहिक तौर पर बलात्कार किया जा रहा है। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के बहाने पत्रकारिता में अवैध घुसपैठ भी हो चुकी है और लगातार हो रही है। यह अवैध घुसपैठ पत्रकारिता के लिए आत्मघाती है, यह उतनी ही खतरनाक और घातक साबित होगी, जितनी भारत में सीमापर से घुसपैठ और भीतर का नक्सलवाद। पत्रकारिता की दुनिया का एक मुहावरा ‘पहाड़े’ की तरह इन अवैध घुसपैठियों ने रट लिया है कि ‘मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है’। इस गुमान में, इस अभियान में चौथा स्तम्भ भी आज बाकी तीन स्तम्भों की तरह खोखला, जर्जर गिराऊ हालत में है। वजह साफ है पत्रकारिता की पवित्रता को दिनों-दिन मैला किया जा रहा है। मैला करने वाले वे चेहरे हैं जो अखबार या चैनल को धंधा समझकर खोले हैं। गैरपेशेवर लोगों ने आज पूंजी लगाकर मीडिया की दुकानें तो खोल ली पर ‘पत्र’ की सुरक्षा, ‘पत्रकार’ का सम्मान और ‘पत्रकारिता’ के सिध्दांत को खास तवज्जो नही दी। नतीजतन हाल ही में देश की पत्रकारिता के आदर्श चेहरे कहे जाने वाली शाख्सियतों के साथ न्यूज चैनलों के स्वामियों की बदसलूकी जगजाहिर है। मैं मानता हूं बाजारवाद के इस दौर में प्रतियोगी पत्रकारिता का दबाव है और उसके साथ तालमेल बनाना जरूरी है। बावजूद इसके पत्रकारिता में बाजारवाद तो शामिल किया जा सकता है, मगर पत्रकारिता की मूल आत्मा को व्यवसायी नहीं बनाया जा सकता।… पर ऐसा है नहीं। आज पत्रकारिता पूरी तरह धंधेबाज हो चुकी है। धंधा चोखा है सो हर कोई इस धंधे में हाथ आजमाना चाहता है क्योंकि ‘सूचना प्रसारण मंत्रालय’ की ‘कृपा’ से और ‘रजिस्ट्रार न्यूजपेपर ऑफ इण्डिया’ आरएनआई के ‘खुले दरबार’ से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। वहां जो भी जाता है अपनी झोली में अखबार या चैनल खोलने का रजिस्टर्ड प्रमाण-पत्र ले आता है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब पिछली लोकसभा सत्र के दौरान केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री मोहन जटुआ ने एक लिखित सवाल के जवाब में बताया कि देश में तकरीबन 74,000 समाचार पत्र आरएनआई में रजिस्टर्ड हैं। इसमें सबसे ज्यादा रजिस्टर्ड यूपी से-11789, और उसके बाद दिल्ली, फिर महाराष्ट्र से पंजीकृत हैं। अब जरा सोचिए 74.000 समाचार पत्रों में वास्तविक कितने अखबार अस्तित्व में हैं और कितने बंद फाइलों में चल रहे हैं। दरअसल, ‘आरएनआई’ की निगरानी कमेटी भी कहां तक निगरानी कर पाएगी। 74,000 अखबार कोई कम नहीं होते। यह सभी जानते हैं कि 65 फीसदी अखबार न तो अस्तित्व में हैं, नाही वो नियमित प्रकाशित होते हैं और नाहीं वो अखबारी कायदे-कानूनों की परवाह करते हैं। ‘डीएवीपी’ के सौजन्य से विशेष मौकों पर जारी होने वाले विज्ञापनों को डकारने के लिए 65 फीसदी अखबार कब्र में से अचानक जिंदा हो उठते हैं। ऐसे अखबारों की कतार खास मौकों पर देखी जा सकती है। जब यह सूरत-ए-हाल हो तो ‘पत्रकारिता की पतंग’ और उस पतंग की ‘डोर’ किन हाथों में है ? यह सैध्दांतिक, प्रायोगिक और प्रतियोगी पत्रकारिता के पैरोकारों को सोचना होगा। खासतौर से देश की पत्रकारिता के आदर्श चेहरों को लामबंद होकर ‘व्यवसायी माफियाओं’ के चंगुल से पत्रकारिता को मुक्त कराना होगा नहीं तो ‘आजाद देश’ में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ जंजीरों में जकड़ी रहेगी।

2 Responses to “उठ चुकी है ‘आदर्श पत्रकारिता’ की अर्थी”

  1. लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार

    LAXMI NARAYAN LAHARE

    आन्नद जी सप्रेम अभिवादन
    आपको नव वर्ष की हार्दिक बधाई ……बेस्ट समाचार संपादक सम्मान २००९ में सम्मानित किया गया था
    यह जानकार ख़ुशी हुई ..आप को हार्दिक बधाई
    आपका लेख पढ़ा जो प्रसंसनीय है …………………………………………..
    लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर
    पत्रकार

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