लेखक परिचय

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

दीपक शर्मा 'आज़ाद'

स्वतंत्र पत्रकार, जयपुर

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देखा जाये तो जनजागरण शब्द राष्ट्रवादी है क्योंकि अभी तक किसी अन्य ने इस पर अपना अधिकार नहीं जताया है। ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि हमारी दो बड़ी रा​ष्ट्रीय पार्टियों की आपसी लड़ाई का केंद्र ही गांधी और पटेल पर अपने अपने आधिपत्य को लेकर रहा है। मैं तो कहूंगा न केवल यह शब्द राष्ट्रवादी है बल्कि सांप्रदायिक भी है। इसे भारतीय राष्ट्रवादियों की धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। त्रेता युग में श्री राम ने भी सुप्त समाज में जनजागरण कर असीम चैतन्य भरा था। ऐसे ही कई कारणों से मैं ‘जनजागरण’ जैसे अथाह पाण्डित्य से सुसंपन्न शब्द को राष्ट्रवादियों के ज्यादा करीब मानता हूं।
पर आजकल इस शब्द का धड़ल्ले से दुरप्रयोग होता देखता हूं तो मन आहत हो उठता है। इतनी वेदना मैंने इससे पहले कभी महसूसी थी। इस शब्द के प्रति मेरा लगाव शुरू से ही रहा है। क्योंकि जब मुझसे एक्जाम हॉल में एक बार यह प्रश्न पूछा गया कि जनजागरण किसे कहते हैं तो मैं उसका जवाब नहीं दे पाया। उस प्रश्न का उत्तर मुझे सीधे सीधे सौ में से बीस अंक दिलाने का लालच भी दे रहा था। फिर भी मैं अति साम्प्रदायिक भावना से ग्रसित उसके सम्मान में कोई ठीक ठीक जवाब नहीं ढूंढ पाया। पर आजकल तो जैसे मुंह से निकले थूंक की तरह अपने प्रत्येक वाक्य में लोग जनजागरण जैसे अतिविशेष शब्दों का चस्पाकरण करते हैं तो मन क्रोध से भर उठता है। इन दिनों संसद से सड़क तक, मैरिज हॉल से लेकर एक्जाम हॉल तक इस एक ​परम सम्माननिय शब्द का ही उच्चारण किया जा रहा है और वह भी धड़ल्ले से। जैसे ये कोई एंटीसेप्टिक क्रीम हो, कभी भी ​कहीं भी और किसी भी चोट पर लगा लो।
दिन भर की कुछ प्रमुख घटनाओं में जनजागरण कुछ ऐसे आया। टीवी पर एक खबर देखी कि अमूक शहर में ओवर लोडेड वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुआ तो नेता जी के पहले शब्द यही थे, ‘हम जनजागरण करेंगे की जनता ओवरलोडेड वाहनों में यात्रा न करें।’ नेता जी चाहते तो इस पर सख्ती दिखाते और कार्यवाही करने का आदेश भी देते मगर वे स्वभावत: राष्ट्रवादी थे। इसलिये जनजागरण का पथ चुनकर सारा रायता जनता के माथे पर ढ़ोल दिया। वहां से हटकर तनिक आगे बढ़े तो पनवाड़ी की दुकान पर शर्मा जी सिगरेट फूंकते हुए बोले, ‘गुटखा और तंबाकू स्वास्थ्य के हानिकारक है। यदि इसे बंद करना है तो जनजागरण का रास्ता अख्तियार करना होगा। हम बोल रहे हैं इन सख्त कानूनों से कुछ न होगा।’ पनवाड़ी से हट कर हम हमारे मोहल्ले वाले सिंह साहब की बच्ची की शादी में पहुंचे। इस विवाह में हुए अनाप सनाप खर्चों पर हमारे मोहल्ले के ही सामाजिक कार्यकर्ता सिंघल साहब ताने मारते हुए बोले, ‘दहेज और इन जैसे कदम कदम पर मुंह फाड़े खड़े खर्चों का अगर खात्मा करना है तो जन जागरण ही एक उपाय है, सच्ची बोल रहे हैं आजाद बाबू।’
सुबह से बस इसी एक शब्द का सत्संग पाकर हमारा सर भी झन्ना रहा था। घर पहुंचकर निंद्रासन की सैर पर​ निकले तो दिमाग की मशीन दिनभर के वाकिये पर अपनी सरसरी निगाह मारने लगी। इसी दौरान हम सोचे कि इतने सारे लोग गाये बगाहे जनजागरण की पीपड़ी बजाते ड़ोल रहे हैं और हम हैं कि अपना पेपर ही खाली छोड़ आये थे। मुझे लगता है कि हमारे नेताओं से लेकर वह प्रत्येक व्यक्ति जो सामाजिक ताने बाने में कसमसा रहा है उसे असल ‘जनजागरण’ का मतलब ही नहीं पता है। क्योंकि जनजागरण का मतलब फलाने नेताजी को बुलाकर ​फीता काटकर उसकी शुरूआत करने भर से नहीं है। असल में यह तो स्वयं से शुरू करने वाली विधा है। गांधी जी ने पहले खुद ही छोटे से छोटा काम करके दिखाया तब कहीं जाकर उस का अनुसरण जनता ने किया और यही तरीका आगे चलकर जनजागरण बन गया।
ऐसा सोचते हुए लग रहा था कि अब कोई मुझसे जनजागरण के बारे में कुछ पूछेगा तो मैं पेपर खाली छोड़ने के बजाये एक अच्छा उत्तर दे सकूंगा। मैं अमूक व्यक्ति को दहेज, नशा और अराष्ट्रीय गतिविधियों का विरोध करने की सलाह नहीं दूंगा, बल्कि स्वयं उसे करके उसका उदाहरण रखुंगा। तब होगी असली जनजागरण की शुरूआत। बाकी तो राष्ट्रवादियों का और अराष्ट्रवादियों का जनजागरण भी तो चल ही रहा है अनवरत….
दीपक शर्मा ‘आज़ाद’

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