विलुप्त हो रही सिक्की कला की पहचान

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मधुबनी की पहचान पेंटिंग से होती है लेकिन ऐसी कई कलाएं है जो अपनी पहचान के लिए बाट जोह रही है ऐसी ही एक कला है सिक्की कला,
सिक्की कला से बननेवाली कलाकृतियाँ न केवल खूबसूरत होती है बल्कि गांव घर की महिलाओं को स्वरोजगार देने का विकल्प है | मिथिलाचल की गरीबी का सौन्दर्य है और लोगों की कठिन परिस्थितियों में रहने वाली जीवनशैली से प्रमुखता से उभर कर निकला |गरीबी और कठिन परिस्थितियों में कला किस प्रकार जन्म लेती है और पहचान बनाती है सिक्की कला इसका प्रतीक है.
सिक्की कला का मुख्य आधार है खर की एक प्रजाति जिसे सिक्की कहते हैं.  सिक्की को काटकर सुखाकर फिर इसे कलाकारों द्वारा जीवंत शक्ल दिया जाता है |
सिक्की घास से घरेलु उपयोग की सामान जैसे डलिया, डोलची अनेक सामान बनाये जाते हैं जो देखने में बड़े ही सुन्दर और मनमोहक लगते हैं | शहरों में तो बड़े बड़े घरों मे सजावट के सामान के रुप में सिक्की घास द्वारा निर्मित वस्तुएं आलमारियों एवं दीवारों पर इस तरह से सजाये जाते है कि घर में प्रवेश करते ही आने वाले मेहमानो का ध्यान उस ओर चला जाता है | सिक्की कला मिथिला की गरीबी का सौन्दर्य है | मिथिलाचल की ग्रामीण इलाको में सिक्की घास, मंजु घास और खर से विभिन्न प्रकार के सामानों को बनाकर शादी विवाहों के अवसर पर बेच कर जीविकोपार्जन करते है| गरीबी और दलित महिलाएं अपनी आमदनी का एक नया जरिया बनाती है |
बिहार के सीतामढी, मधुबनी और दरभंगा जिला की औरतें मिथिला पेंटिंग और सिक्की कला की कार्य करती है |
यहां की कलाएं देश विदेश में प्रचार का माध्यम बना जबकि सिक्की कला इन सब अभावों एवं अन्य कारणों से पिछड़ी हुई है मिथिला में सदियो से सिक्की कला वंशानुगत कहे तो पीढी से दूसरी पीढी तक फलती फूलती रही| लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के कारण पिछले पचीस तीस साल से मिथिला के लोगों का भारत के बड़े बड़े शहरों में पलायन होता आ रहा है| जिसके कारण यहां सिक्की कला दम तोड़ने की स्थिति में आ गयी है | इससे घरों एवं दीवारों को सजाया जाता है |वही इससे बनी वस्तुओं का प्रयोग मसाले, गहने, फूलपती, डाईफुटस के रखने के काम में लाया जाता है |
इस कला में जितनी रूचि मिथिला से बाहर देश विदेश की लोगों की है उतनी रुचि स्थानीय को भी नही है |100साल बिहार के पुरे होने पर दिल्ली में एक प्रदशनी लगाई गयी थी जिसमें बिहार की विभिन्न कला की झांकी थी |सिक्की कला का कोई स्थान नहीं था|सिक्की कला के अनेकों ऐसे कारीगर है जिन्हें सरकार की ओर से कुछ भी सहायता नहीं मिला है |यदि सरकार की ओर से इस कारीगरों को सहायता मिले तो यह कला काफी बेहतर तरीके से विकसित होगी|देश एवं विदेशों में लोकप्रिय बन जाएगी|
सदियों से एक परंपरा के रूप में यह कला एक पीढी से दूसरी पीढी तक फलती फूलती रही, रंग बिरंगी सिक्की से टकुआ से गुंदती कलाकृतियाँ अब भी लोगों के जेहन में है | बाहर की ओर पलायन करने के कारण यह कला दम तोड रही है |अब कुछ गांवो मे सिमट कर रह गई है |
जहां बारिश की प्रचुरता हो सिक्की की उपज वहां ज्यादा होती है नदी,तालाबो,के कछार पर दलदल जमीन में इसकी पैदावार होती है |
सिक्की को पहले विभिन्न रंगों से रंगते है फिर टकुआ से बुनते है मछली, सूरज, कदम पेड, आम, आंख, गुलदान, शिव शंकर, हाथी, कछुआ|
इस कलाकृति के चलते विदेश्वरी देवी, कुमुदनी देवी राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी है |राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने 1969में विदेश्वरी देवी को पुरस्कृत किये| मिथिला में शादी विवाह के अवसर पर गौना के समय बेटियों को बिदाई में उपहार स्वरुप दिया जाता है | व्यवसायियों के लिए बाजार मुहैय्या नहीं कराया गया|जीविका द्वारा इनकी कमाई हो जाती है स्थानीय स्तर पर, गैर सरकारी संस्खानो के हवाले इन्हे छोड दिया गया है | सिक्की कला की जानकार प्रेमलता बहन कहती है आधुनिक कलाकार समय के साथ फूलदान, पेन स्टैण्ड, कुशन, पेपरवेट, कान की बाली, अगूंठी, चूडियाँ बनाकर सिक्की कला के स्वरुप को बचाने का प्रयास कर रहे हैं |सिक्की घास को गरम पानी में उबाल उसे रंगा जाता है तब रंग बिरंगे साजो सामान बनते हैं |इस कला से जुड़ी महिलाएं आज भी वहीं है जहां कल थी|कलात्मक वस्तुओं का समुतित बाजार उपलब्ध नहीं| इन कलाकारो को अपना जीवनयापन करने मे मशक्कत करनी पड़ रही है |यह कला पीढी दर पीढी चली आ रही महिलाओं को कोई टेनिगं नही दिया गया |बारिश के अभाव मे इनका रोजगार मंदी के कगार पर पहुच जाता है |
सिक्की कला से जीवनयापन करने वाली महिलाएं आज आथिक संकट से गुजर रही है |15साल पहले इनके कला से मिथिलाचल की पहचान होती थी सभी एकजुट होकर घास को बिनती उसे छाटती फिर रंग सुनहरे होने पर कलाकृतियो को आकार देती थी |घोडे डलिया हाथी जैसे सामान बिना ऑडर बनाये जाते हैं लेकिन चुकी, कंगन, शादियो मे उपहार के लिए दिया जाता है जो ऑडर पर बनाये जाते है. 15-20  महिलाएं एक जगह इन सामानो को बना कर बेचा करती थी लेकिन अब समय नही रहा| सभी महिलाएं बेरोजगार होते चली गई|लोग भी हाथो से बने सामानो को लेने के बजाय बाजार से खरीदते है|सभी बाहर की तरफ पलायन कर रहे हैं काम खोज रहे हैं लेकिन कला विलुप्त होती जा रही |आज जरुरत इनको आगे करने का है|विदेशो मे अपनी पहचान बना चुके कलाकारो को अपने मिथिलाचल मे पहचान नही मिली सरकार आर्थिक मदद कर इनको आगे बढा सकती है |
जो सामान यहां औने-पौने दाम मे बिकता है वही सामान बड़े शहरो और विदेशो मे हजारो लाखो मे बिकता है |आथिक स्थिति से जुझ रही महिलाओं को इस बात की शिकायत है कि इस कला को जीवंत और पहचान बनाये रखने मे कोई सरकारी स्तर पर कोई मदद नही मिली है |
सिक्की कला को आगे बढाने के लिए बस जरुरत है सही सरकारी मागदशन और सहयोग की इससे न केवल मधुबनी बल्कि दरभंगा, सीतामढी जिलो मेैभी गामीण अथव्यसस्था मे सुधार लाया जा सके|महिलाओ और बच्चो का भविष्य इस कला के जरिये बेहतर बन सके |इनक पलायन को रोकने के लिए जरुरत बाजार मुहैय्या कै साथ आथिक मदद करने की जिससे मिथिलाचल की कला सिक्की कला जीवित रह्|समद्ध हो सके जीवन महिलाएं अपने पौरो पर खड़ा हो सके |घर बैठे लोगो को रोजगार मुहैय्या करा सके परिवार के साथ बच्चो को आगे बढा सके.

1 thought on “विलुप्त हो रही सिक्की कला की पहचान

  1. I am so much thankful of you Gunjan ji. Because of your this literature on Sikki art i’ve came to know about it this much. U will be happy to know that in Patna, products of Sikki art are most often made available via. Saras mela and Udyog mela by Bihar government. I was not so fond of it. But, now as i know that it is an art of our Bihar, from next time i’ll definately by some product to give out a place in my home with any excuse.

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