कविता

जौहर और अस्मिता

जौहर केवल ज्वाल ना, नारी का सम्मान।
अस्मिता की रक्षा हेतु, दिया अमर बलिदान॥

इतिहासों के घाव को, मत तौलो बाजार।
बलिदानों की राख में, छिपा हुआ संसार॥

जिनने प्राण गँवा दिए, रखकर अपना मान।
उन वीरांगना को सदा, शत-शत है सम्मान॥

जौहर को जो भूलकर, करते हैं उपहास।
इतिहासों की पीर का, उनको कहाँ अहसास॥

नारी केवल देह नहीं, नारी है अभिमान।
उसकी मर्यादा से बड़ा, जग में क्या सम्मान॥

त्याग जहाँ सर्वोपरि हो, वहाँ न होता मोल।
बलिदानों की वेदना, समझे कौन अनमोल॥

जिनके मन में मान हो, वे समझें बलिदान।
जौहर की उस अग्नि में, दिखता नारी-मान॥

इतिहासों को आज के, चश्मे से मत देख।
कालखंड की पीड़ा को, मन में रखकर देख॥

शब्दों से इतिहास का, मत करना अपमान।
वीरांगना के त्याग को, दे उचित सम्मान॥

जौहर की उस ज्वाल में, जलता था अभिमान।
पराधीनता के सम्मुख, अडिग रहा स्वाभिमान॥

जिसने सहा इतिहास का, सबसे गहरा घाव।
उसकी पीड़ा पूछना, केवल शब्द न भाव॥

नारी की अस्मिता रही, युग-युग से अनमोल।
जिसने उसको समझ लिया, वह समझा ये मोल॥

बलिदानों की भूमि पर, शब्द रहें सतर्क।
इतिहासों की पीर को, समझे हर एक तर्क॥

जौहर की परंपरा को, समझो उसके काल।
आज खड़े होकर करो, मत फिजूल सवाल॥

सम्मानित हो इतिहास में, हर नारी का नाम।
त्याग और साहस से बनी, उनकी अमर पहचान॥

जिनको केवल दृश्य दिखे, उनको क्या इतिहास।
अग्नि के पीछे छिपा था, अस्मिता का त्रास॥

इतिहास नहीं खिलौना है, न टिप्पणी का खेल।
पीड़ा की हर स्मृति में, छिपा समय का मेल॥

मतभेदों के बीच भी, बची रहे मर्याद।
जौहर के बलिदान पर, हो संयमित संवाद॥

जौहर-ज्वाला कह रही, रखो सदा यह मान।
नारी अस्मिता से बड़ा, क्या कोई सम्मान॥

  • डॉ. प्रियंका सौरभ