कविता

जौहर

जौहर की वह ज्वाल थी, साहस की पहचान।
विपदा में भी ना झुकीं, दृढ़ था स्वाभिमान॥

मस्तक ऊँचा रख चलीं, लेकर मन में मान।
इतिहासों के पृष्ठ पर, अमर हुआ बलिदान॥

अग्नि बनी जब आखिरी, रक्षा की दीवार।
अस्मिता के मान पर, न्योछावर संसार॥

राजमहल से रणभूमि तक, नारी रही महान।
संकट में भी रख लिया, धरती का सम्मान॥

केसरिया जब तन सजा, मन में दृढ़ विश्वास।
धर्म, धरा और मान का, रखा सदा ही पास॥

इतिहासों की राख में, छिपे हुए अंगार।
आज हमें दे रहे सदा, चेतना की पुकार॥

जिनके साहस से जगी, जन-मन में पहचान।
उन वीरांगनाओं को, बारंबार सम्मान॥

नारी केवल त्याग नहीं, नारी शक्ति अपार।
सम्मान मिले हर मोड़ पर, यह सच्चा सत्कार॥

नारी की गरिमा रहे, भारत का अभिमान।
उनकी पावन स्मृति से, रोशन हिंदुस्तान॥

घृणा नहीं इतिहास से, सीखें हम सद्भाव।
बीते कल से ले चलें, बेहतर कल का भाव॥

नारी का सम्मान ही, संस्कृति का श्रृंगार।
जिस घर में सम्मान हो, खुशियों का संसार॥

जीवन भी अनमोल है, मान रखें हम साथ।
नारी को अधिकार दें, यही समय की बात॥

रक्त नहीं, अब लेखनी, लिखे शौर्य की बात।
मानवता के साथ हो, भारत की हर बात॥

त्यागों की स्मृति रहे, जीवन का भी मान।
नारी के अधिकार से, ऊँचा हिंदुस्तान॥

त्याग, शौर्य, स्वाभिमान, रहें सदा जीवंत।
इन मूल्यों से ही बने, भारत देश प्रचंड॥

इतिहासों को याद कर, वर्तमान सँवार।
नारी के सम्मान से, सुंदर हो संसार॥

राख नहीं वह इतिहास है, चेतना की चिंगार।
दीप अस्मिता का जले, युग-युग बारंबार।।

डॉ. सत्यवान सौरभ