आंदोलन के 26वें दिन सरकार का फैसला, छात्रों की विदाई और फिर हाईकोर्ट की रोक ने पूरे घटनाक्रम को खड़ा किया सवालों के कटघरे में
अशोक कुमार झा
झारखंड में पिछले 26 दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन अंततः जयपाल सिंह स्टेडियम से समाप्त हो गया। आंदोलन समाप्त होने के बाद छात्र अपने-अपने घर लौट गए, धरना स्थल पर लगे टेंट हटा दिए गए और कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि लंबे समय से चले आ रहे इस संघर्ष का पटाक्षेप हो गया है। आंदोलनकारी छात्रों ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति आभार व्यक्त किया। छात्र संगठनों की ओर से आभार यात्रा निकाली गई और यह संदेश दिया गया कि सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया है तथा यह छात्र एकता की जीत है। लेकिन घटनाक्रम ने आंदोलन समाप्त होने के तुरंत बाद जिस तरह करवट बदली, उसने इस पूरे प्रकरण को एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
छात्र आंदोलन की प्रमुख मांगों में पूर्व में हुई नियुक्तियों को रद्द करना और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराना प्रमुख था। सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर पूर्व की नियुक्तियों को रद्द करने का निर्णय लिया। सरकार के इस फैसले के बाद आंदोलनकारी छात्रों के बीच उत्साह का माहौल बना और उन्होंने इसे अपनी मांगों की बड़ी सफलता माना। मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताया गया और आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी गई। यहां तक तो पूरी कहानी छात्रों की जीत जैसी दिखाई दे रही थी लेकिन सरकार के इस फैसले का दूसरा पहलू उन हजारों लोगों के रूप में सामने आया, जिन्हें पूर्व में नियुक्त किया गया था और जिनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। अचानक नौकरी चली जाने के बाद इन कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के सामने अपने भविष्य, परिवार और रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया। परिणाम यह हुआ कि एक आंदोलन समाप्त होते ही दूसरा आंदोलन शुरू हो गया और बड़ी संख्या में प्रभावित कर्मचारी सड़क पर उतर आए।
यहीं से पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक अध्याय शुरू होता है। जिन नियुक्त कर्मियों की सेवाएं सरकार ने समाप्त की थीं, उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। 20 अगस्त को इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट का हस्तक्षेप सामने आया और सरकार द्वारा सेवा समाप्त किए जाने संबंधी आदेश के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगा दी गई। इस न्यायिक घटनाक्रम ने उस राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को ही बदल दिया, जिसके आधार पर छात्र आंदोलन समाप्त हुआ था। जिस सरकारी फैसले को छात्र अपनी जीत मानकर आंदोलन समाप्त कर चुके थे, उसी फैसले पर न्यायालय की रोक लग गई। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठना ही चाहिए कि आखिर जीत किसकी हुई?
क्या यह छात्रों की जीत थी? क्या यह सरकार की रणनीतिक जीत थी? क्या प्रभावित कर्मचारियों को न्यायालय के आदेश से मिली राहत उनकी जीत है? अथवा इस पूरे मामले में अभी किसी की भी अंतिम जीत नहीं हुई है और वास्तविक फैसला न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आंदोलन की समाप्ति के समय छात्रों में जिस उत्साह का वातावरण था, हाईकोर्ट के आदेश के बाद वही फैसला एक अलग कानूनी और संवैधानिक प्रश्न बन गया है।
पूरे घटनाक्रम को यदि राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सरकार ने निश्चित रूप से तत्काल पैदा हुए संकट को संभालने में सफलता हासिल की है। छात्र आंदोलन लगातार लंबा खिंच रहा था। सरकार के खिलाफ छात्रों का आक्रोश बढ़ रहा था और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग तक पहुंच चुका था। मुख्यमंत्री आवास के घेराव का अल्टीमेटम दिया जा चुका था। ऐसे समय में सरकार के सामने राजनीतिक रूप से एक गंभीर चुनौती खड़ी थी। इसी बीच कैबिनेट की बैठक बुलाकर पूर्व की नियुक्तियों को रद्द करने का निर्णय लिया गया। इस निर्णय ने आंदोलनकारी छात्रों को तत्काल संतुष्ट कर दिया और आंदोलन समाप्त हो गया। सरकार के खिलाफ बन रहा दबाव अचानक कम हो गया। मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग पीछे चली गई और जिस जयपाल सिंह स्टेडियम में कई दिनों से आंदोलन का केंद्र बना हुआ था, वह खाली हो गया।
राजनीति में इसे संकट प्रबंधन की एक प्रभावी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। सरकार ने छात्रों की सबसे बड़ी मांग पर निर्णय लिया, छात्र संतुष्ट हुए, आंदोलन समाप्त हुआ और सरकार को तत्काल राजनीतिक राहत मिल गई लेकिन इसी निर्णय का दूसरा पक्ष उन कर्मियों के रूप में सामने आया जिनकी सेवाएं समाप्त हुईं। वे सड़क पर आ गए और उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने सरकार के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि सरकार द्वारा लिया गया फैसला कानूनी चुनौती के सामने है और छात्र आंदोलन भी समाप्त हो चुका है। इसीलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार तत्काल राजनीतिक संकट से बाहर निकलने में सफल रही, लेकिन नियुक्तियों का विवाद अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
इसे एक राजनीतिक मुहावरे में समझें तो स्थिति कुछ ऐसी दिखाई देती है कि सरकार ने एक तरफ आंदोलन का दबाव कम कर दिया और दूसरी तरफ अब पूरा मामला न्यायालय की प्रक्रिया में चला गया। यदि न्यायालय आगे इस मामले में कोई अलग निर्णय देता है, तो सरकार के पास यह कहने का आधार रहेगा कि उसने अपने स्तर पर कार्रवाई की थी और अब मामला न्यायालय के अधीन है। इस दृष्टि से देखा जाए तो तत्काल राजनीतिक संकट सरकार के सिर से टल गया। लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि सरकार की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त हो गई है। न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को अब पूरे मामले में अत्यंत सावधानी और संवैधानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना होगा।
दूसरी ओर, छात्रों के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। किसी आंदोलन में सरकार से आदेश जारी करवाना निश्चित रूप से एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अंतिम जीत तभी मानी जाती है जब वह निर्णय कानून और न्यायालय की कसौटी पर भी कायम रहे। यदि किसी निर्णय पर अदालत रोक लगा देती है तो आंदोलनकारियों को यह समझना होगा कि केवल राजनीतिक घोषणा या सरकारी आदेश को अंतिम सफलता मान लेना उचित नहीं है। छात्रों की मूल मांग यदि नियुक्तियों को पूरी तरह रद्द करना और अनियमितताओं की जांच कराना थी, तो अब उन्हें यह देखना होगा कि न्यायिक प्रक्रिया में इस मामले का अंतिम परिणाम क्या निकलता है।
यहां एक और गंभीर प्रश्न है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि नियुक्ति प्रक्रिया में वास्तव में गंभीर अनियमितता हुई थी तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन दूसरी तरफ यदि ऐसे कर्मचारी हैं जिनकी व्यक्तिगत भूमिका किसी अनियमितता में साबित नहीं होती और उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत नौकरी प्राप्त की है, तो उनकी सेवा समाप्ति से उनके जीवन और परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा। किसी व्यक्ति की नौकरी केवल उसका रोजगार नहीं होती, बल्कि उसके पूरे परिवार की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य से जुड़ी होती है। इसलिए इस पूरे विवाद का समाधान केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं बल्कि कानून, तथ्य और न्याय के आधार पर होना चाहिए।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकार के अगले कदम को लेकर है। क्या सरकार हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट जाएगी? यदि सरकार अपने ही द्वारा जारी सेवा समाप्ति के आदेश को बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है, तो यह अपने आप में एक दिलचस्प स्थिति होगी। एक तरफ सरकार ने छात्रों की मांग के दबाव में नियुक्तियां रद्द कीं और दूसरी तरफ अब उसी फैसले को न्यायालय में बचाने की जिम्मेदारी सरकार के सामने होगी। यदि सरकार आगे कानूनी लड़ाई लड़ती है तो छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह भी देखने वाली बात होगी। और यदि सरकार न्यायालय के आदेश के अनुरूप आगे बढ़ती है, तो उन छात्रों के सामने क्या स्थिति बनेगी जिन्होंने इस निर्णय को अपनी जीत मानकर आंदोलन समाप्त किया है, यह भी भविष्य का बड़ा सवाल है।
फिलहाल जयपाल सिंह स्टेडियम शांत है। वहां आंदोलन के टेंट नहीं हैं, न नारे हैं, न धरना है और न ही छात्रों की भीड़। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि विवाद समाप्त हो गया? बिल्कुल नहीं। आंदोलन का मंच भले ही खाली हो गया हो, लेकिन विवाद अब अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। एक तरफ छात्र अपनी मांगों को लेकर पहले ही आंदोलन समाप्त कर चुके हैं, दूसरी तरफ प्रभावित कर्मचारी अपने रोजगार की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं और तीसरी तरफ सरकार दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रही है।
इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए मेरे विचार से अभी किसी एक पक्ष को अंतिम विजेता घोषित करना उचित नहीं होगा। यदि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो सरकार ने तत्काल संकट को टालने में सफलता जरूर हासिल की। छात्रों ने सरकार पर दबाव बनाकर एक बड़ा निर्णय करवाया, इसलिए वे अपने आंदोलन को सफल मानने के अधिकारी हैं। प्रभावित कर्मचारियों को हाईकोर्ट से तत्काल राहत मिली है, इसलिए उनके लिए यह महत्वपूर्ण न्यायिक सफलता है। लेकिन इन तीनों में से अंतिम जीत किसकी होगी, इसका फैसला अभी बाकी है।
मेरा मानना है कि इस पूरे मामले का सबसे बड़ा नुकसान झारखंड के उस युवा वर्ग को नहीं होना चाहिए जो रोजगार की तलाश में वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। परीक्षा और नियुक्ति की पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानूनी स्थिरता अत्यंत आवश्यक है। यदि नियुक्तियों में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों को दंड मिलना चाहिए, लेकिन निर्दोष अभ्यर्थियों का भविष्य भी सुरक्षित रहना चाहिए। सरकार, छात्र संगठन और प्रभावित कर्मचारी—तीनों को इस मूल प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा।
आज झारखंड के सामने केवल यह सवाल नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा। असली सवाल यह है कि क्या झारखंड की नियुक्ति व्यवस्था पर युवाओं का विश्वास कायम रहेगा? क्या भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा नहीं होगी? क्या सरकार ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिसमें परीक्षा से लेकर नियुक्ति तक हर चरण पारदर्शी हो और किसी भी विवाद की स्थिति में हजारों युवाओं का भविष्य अधर में न लटके?
जयपाल सिंह स्टेडियम से आंदोलन भले समाप्त हो गया हो, लेकिन झारखंड के युवाओं के मन में उठे सवाल अभी समाप्त नहीं हुए हैं। सरकार के आदेश पर न्यायालय की रोक ने पूरे घटनाक्रम को एक नया मोड़ दे दिया है। अब आने वाला समय बताएगा कि सरकार आगे क्या करती है, न्यायालय का अंतिम निर्णय क्या आता है और छात्र संगठन अपनी अगली रणनीति क्या तय करते हैं।
इसलिए आज का सबसे बड़ा सवाल यही है—जीत किसकी हुई और ठगा कौन गया?
शायद इस सवाल का उत्तर आज नहीं, बल्कि आने वाला समय देगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि आंदोलन समाप्त हुआ है, लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुआ। जयपाल सिंह स्टेडियम खाली हुआ है लेकिन झारखंड के रोजगार और नियुक्ति व्यवस्था से जुड़े सवाल अभी भी पूरी ताकत के साथ खड़े हैं।
अशोक कुमार झा