कविता

पानी यूँ ही बह गया, जागो मेरे यार॥

बूंदों ने बरसा दिया, धरती पर उपहार।
पानी यूँ ही बह गया, जागो मेरे यार॥

प्यासे खेतों की सदा, सुनता नहीं समाज।
जल को ना संजो सके, क्या होगा कल आज॥

नदियाँ रोतीं आज हैं, सूखे उनके कूल।
लापरवाही छोड़कर, रोपें जीवन-फूल॥

जल की हर एक बूंद में, बसता है संसार।
आज बचाओ जल अगर, कल होगी भरमार॥

नल टपके तो रोक दो, मत करना अपमान।
बूंद-बूंद से ही बने, जीवन का सम्मान॥

बारिश का जल रोक लो, धरती की पहचान।
जल संरक्षण बन सके, आने वाली शान॥

हरियाली का हाथ थाम, जल को देना मान।
सच्चे अर्थों में तभी, बचेगा हिंदुस्तान॥

मेघ बरसकर चल दिए, छोड़ गए संदेश।
बूंद-बूंद को रोक लो, तभी बचे परिवेश॥

छत पर गिरती बूँद को, मत जाए बेकार।
आज बचाओ जल अगर, कल मिले संसार॥

तालाबों की गोद में, जल का सच्चा मान।
सूखी धरती माँगती, फिर अपना सम्मान॥

धरती माँ की प्यास को, समझो मेरे मीत।
जल-संचय का दीप ही, जीवन की है जीत॥

वर्षा का हर एक कण, अनमोलों का हार।
सहेज लिया जो जल यहाँ, वही बने सरदार॥

नल खुला और बह गया, पानी बारंबार।
बूंद-बूंद को खो दिया, फिर ढूँढे संसार॥

सूखी नदियाँ पूछतीं, किसने किया अन्याय।
जल बचाने की घड़ी, समझो अब तो हाय॥

आज बचाओ वर्षा-जल, कल की यही पुकार।
बिन पानी के सूना पड़े, जीवन का संसार॥

  • डॉ. सत्यवान सौरभ