लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य

ईश्वर, जीव तथा प्रकृति अनादि, नित्य, अविनाशी, अजर व अमर हैं। जीवात्मा ईश्वर से कर्मानुसार जन्म मरण प्राप्त कर कर्म-फलों को भोगता है। मनुष्य योनि उभय योनि है जिसमें मनुष्य पूर्व किये हुए कर्मों के फलों को भोगता भी है और नये कर्मों को करता भी है। मनुष्य जीवन में यदि मनुष्य वेदानुसार जीवन व्यतीत करते हुए समाधि अवस्था को प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है तो इससे वह मोक्ष का पात्र बन जाता है। ईश्वर साक्षात्कार के बाद वह अनेक बार समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार करता रहता है। प्रथम ईश्वर साक्षात्कार से आरम्भ होकर मृत्यु पर्यन्त वह जीवन मुक्त अवस्था में रहता है। मृत्यु होने पर उस जीवात्मा का मोक्ष होता है। यह मुक्ति अनेक जन्मों में किये हुए शुभ कर्मों का परिणाम होती है। मोक्ष में जाने के बाद अवधि पूरी होने पर उस जीवात्मा का मनुष्य योनि में पुनर्जन्म होता है। वह फिर नये सिरे से कर्म करना आरम्भ करता है और सम्भव है कि उसे पुनः मोक्ष मिल जाये व अनेक जन्म लेने के बाद उसका पुनः मोक्ष हो सकता है। ऐसा वैदिक साहित्य को पढ़ने से विदित होता है।

 

संसार में जितनी भी प्राणी योनियां हैं उनमें सभी प्राणियों मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट व पतंग आदि में एक ही समान प्रकार का जीवात्मा है जो कर्मानुसार कभी मनुष्य तो कभी अन्य योनियों में जन्म लेते हैं। यह कर्म अनादि काल से चलता आ रहा है। हम सब भी अनादि काल से कर्मानुसार अनेक वा सभी योनियों में जन्म लेते आ रहे हैं। अनुमान से कह सकते हैं कि प्रायः हमारे सभी योनियों में अनेक अनेक बार जन्म हुए हैं। अनेक बार हम सांप, बिच्छू, सिंह व विषैले जीव वा प्राणी भी बने हैं। अनेक बार हमारा व सबका मोक्ष भी हुआ है। अतिश्योक्ति न होगी यदि यह भी कहें कि अनन्त अनन्त बार हमारे सभी प्राणी-योनियों में जन्म हुए हैं और अनन्त बार हमारा मोक्ष भी हुआ है। हम सभी मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिये और मोक्ष प्राप्ति के लिए किये जाने वाले कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये। मुमुक्षुओं के लिए किये जाने वाले कर्मों का उल्लेख सत्यार्थप्रकाश व दर्शन आदि ग्रन्थों में मिलता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन कर ज्ञान लाभ करना चाहिये जिससे हमारी आत्मा की उन्नति हो।

 

मोक्ष संसार में सब सुखों से बढ़कर है। ऐसा शास्त्र व हमारे ऋषि मुनि कहते आये हैं और इसकी प्राप्ति के लिए भीषण तप व पुरुषार्थ भी करते आये हैं। हम अपने इस मनुष्य जीवन में भी तो सुख की इच्छा करके साध्य सुखों के अनुरूप साधनों का प्रयोग कर उन सुखों को प्राप्त करते ही हैं। मनुष्य जीवन में हम जिन सुखों को सुख मान कर उनको प्राप्त करने के लिए सारा जीवन लगा देते हैं, उनमें से कुछ लोगों को कुछ सुख ही प्राप्त होते हैं और कईयों को अनेक सुख जिनकी उन्होंने इच्छा की हुई होती है, प्राप्त नहीं होते। कई लोग तो सुखों की प्राप्ति के लिए रात्रि दिन धनोपार्जन में ही अपना सारा समय गवां बैठते हैं। अपने इस जीवन की उन्नति व परलोक के सुधार पर उनका ध्यान जाता ही नहीं है। ऐसे सांसारिक लोग धनोपार्जन आदि में अत्यधिक पुरुषार्थ करते हुए कम आयु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। हमारे कुछ मित्रों के साथ भी ऐसी घटनायें हुई हैं। उनका उपार्जित किया हुआ धन उनके परिवारजनों के काम तो आता है परन्तु जिसने अच्छे व बुरे कार्यों से धन उपार्जित किया, वह व्यक्ति उस धन से प्राप्त हो सकने वाले सुखों से वंचित ही रहे और संसार से चले गये। पता नहीं की उनका परलोक बना या बिगड़ा? यह जीवन तो उस धन से सुख भोगने से पहले ही समाप्त हो गया।

 

बुद्धिमान मनुष्य वही है जो अपने से अधिक बुद्धिमान व विवेकशील मनुष्यों की बातों को माने व उनका आचरण करे। सृष्टि के आरम्भ से आज तक ऋषियों व वेद के विद्वानों से अधिक बुद्धिमान व विवेकशील मनुष्य उत्पन्न नहीं हुए हैं। वह सब मनुष्यों को मुमुक्ष बनने की प्रेरणा करते रहे हैं। स्वयं के जीवन से भी वह इसका उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं। स्वामी दयानन्द जी का जीवन हमारे सम्मुख है। हमें उनके जीवन से शिक्षा लेकर उनके अनुसार ही आचरण करना चाहिये। इसी में हमारा कल्याण व हित है। मोक्ष के विषय में अधिक जानकारी के लिए हमारा निवेदन है कि पाठक सत्यार्थप्रकाश का नवम् समुल्लास व ऋषि के अन्य ग्रन्थों सहित सांख्यदर्शन व उपनिषदों आदि का अध्ययन करें। इससे उनके आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति होगी व आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा मिलेगी। ऋषि दयानन्द के कार्यों से सारे संसार के लोग ऋणी है। उन्होंने सारे संसार को वह ज्ञान दिया जो किसी मत-मतान्तर के ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं था। मत-मतान्तरों के आचार्य भी उस ज्ञान से वंचित थे जो ऋषि दयानन्द ने हम मनुष्यों को दिया है। इस दृष्टि से हम ऋषि दयानन्द से पूर्व हुए मनुष्यों की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं। जो मोक्ष आदि विषयक अनेक प्रकार का ज्ञान ऋषि दयानन्द जी ने हमें दिया है उनका यदि किसी मत में उल्लेख हुआ भी हो, तो भी लोग उसकी प्राप्ति के साधनों से अपरिचित थे। मोक्ष का स्वरूप, मोक्ष में जीवात्मा की स्थिति, मोक्ष की अवधि, मोक्ष में जीव का ईश्वर में लय नहीं होता, मोक्ष से वापसी आदि अनेकानेक समस्याओं का समाधान ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में किया है। इस पर भी यदि हम ऋषि द्वारा प्रदत्त ज्ञान से लाभ नहीं उठाते तो यह हमारी अपनी मूर्खता व अज्ञान है और इससे हमें ही हानि होनी है। अपने हित व अहित का विचार करना हमारा अपना काम है। आईये, आप और हम विचार करें। ओ३म् शम्ं।

 

 

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