राजनीति

जेपी का बिगुल और अधूरा रह गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना

कुमार कृष्णन

“जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है,
तिलक लगाने तुम्हें जवानों, क्रांति द्वार पर आई है।”

ये पंक्तियां केवल किसी आंदोलन का गीत नहीं थीं। ये उस दौर की बेचैनी की आवाज थीं, जब देश की युवा पीढ़ी के सामने यह सवाल खड़ा था कि आजादी के बाद बने लोकतंत्र का अर्थ आखिर क्या है? क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम है, या वह ऐसी व्यवस्था भी है जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जा सके, सत्ता से सवाल पूछा जा सके और आम नागरिक को अपने भविष्य का फैसला करने में भागीदार बनाया जा सके?
जयप्रकाश नारायण का नाम इसी सवाल के साथ जुड़ता है। उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान नेता को याद करने का अवसर नहीं है। यह लोकतंत्र को आईना दिखाने का दिन है। यह पूछने का दिन है कि जिस सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल जेपी ने बजाया था, उसके कितने स्वर आज हमारे सार्वजनिक जीवन में बचे हैं?
कविता आगे कहती है—
“कौन चलेगा आज देश से भ्रष्टाचार मिटाने को,
बर्बरता से लोहा लेने, सत्ता से टकराने को,
आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है।”

आज इन पंक्तियों को पढ़ते हुए लगता है जैसे समय ने अपना कैलेंडर बदला है, सवाल नहीं। भ्रष्टाचार का स्वरूप बदला है, सत्ता के तौर-तरीके बदले हैं, राजनीति की भाषा बदली है, लेकिन नागरिक की बेचैनी अब भी मौजूद है। फर्क इतना है कि तब सड़कों पर उतरने वाली तरुणाई सत्ता को चुनौती देने को लोकतांत्रिक कर्तव्य मानती थी और आज राजनीतिक वातावरण में असहमति को कई बार संदेह की निगाह से देखा जाने लगता है।
जेपी की पूरी राजनीतिक यात्रा सत्ता पाने की यात्रा नहीं थी। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, जेल गए, भूमिगत आंदोलन का हिस्सा बने। लेकिन आजादी के बाद उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना। समाजवाद से गांधी तक और गांधी से लोकशक्ति तक उनकी यात्रा लगातार उन्हें सत्ता के केंद्र से समाज के केंद्र की ओर ले गई।
उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़कर यह समझने की कोशिश की कि समाज में परिवर्तन केवल कानून और सरकार के जरिए नहीं आता। जमीन, संसाधन, सामाजिक संबंध और मनुष्य की चेतना में बदलाव भी जरूरी है। यही विचार आगे चलकर सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा में व्यापक रूप से सामने आया।
सत्तर का दशक आते-आते देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासन की अक्षमता के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था। बिहार के छात्र आंदोलन ने जेपी से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया। उस समय उनकी उम्र और स्वास्थ्य दोनों सक्रिय राजनीति की सामान्य कसौटियों के अनुकूल नहीं थे। लेकिन उन्होंने छात्रों की पुकार सुनी। यही वह क्षण था जब एक बुजुर्ग समाजवादी और गांधीवादी विचारक फिर से युवाओं के बीच खड़ा हुआ और उसने राजनीति को सत्ता परिवर्तन से आगे ले जाने की कोशिश की।
सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ सरकार बदलना भर नहीं था। जेपी राजनीतिक क्रांति के साथ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और नैतिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। वे ऐसी राजनीति चाहते थे जिसमें नागरिक केवल पांच साल में एक बार मतदान करने वाला व्यक्ति न हो, बल्कि रोजमर्रा के शासन में अपनी आवाज रखने वाला नागरिक हो।
उनकी चिंता का केंद्र यही था कि अगर सत्ता बदल जाए लेकिन भ्रष्टाचार बना रहे, अगर सरकार बदल जाए लेकिन प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह न बने, अगर चुनाव होते रहें लेकिन समाज में असमानता बनी रहे, तो इसे वास्तविक परिवर्तन कैसे कहा जाएगा?
यहीं से जेपी का सबसे बड़ा सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा होता है।क्या हमने सम्पूर्ण क्रांति को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित कर दिया है?
जेपी लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था नहीं मानते थे। लोकतंत्र में चुनाव जरूरी हैं, लेकिन चुनाव लोकतंत्र का पूरा अर्थ नहीं हैं। स्वतंत्र प्रेस, संस्थाओं की स्वायत्तता, नागरिक अधिकार, असहमति का सम्मान, सत्ता की जवाबदेही और जनता की सक्रिय भागीदारी—ये सब लोकतंत्र की आत्मा हैं।
1975 में आपातकाल के दौरान जब नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, तब जेपी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाई। उनका स्वास्थ्य कमजोर था लेकिन लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कमजोर नहीं हुई।
उनका संघर्ष हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता से असहमति पैदा होती है। सत्ता के पक्ष में बोलना आसान हो सकता है, लेकिन सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार बचाए रखना लोकतंत्र की कठिन जिम्मेदारी है।
आपातकाल के बाद 1977 में सत्ता परिवर्तन हुआ। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की बड़ी घटना थी। जनता ने पहली बार केंद्र में लंबे समय से शासन कर रही कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया। लेकिन जनता पार्टी सरकार के भीतर के अंतर्विरोध और नेतृत्व संघर्ष ने यह भी दिखाया कि सत्ता परिवर्तन अपने आप में व्यवस्था परिवर्तन की गारंटी नहीं है।जेपी व्यवस्था बदलना चाहते थे; राजनीति कई बार केवल सत्ता बदलने तक सीमित रह गई।यही सम्पूर्ण क्रांति की सबसे बड़ी अधूरी कहानी है।
जेपी का सपना विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का था। वे ग्राम स्वराज की बात करते थे। वे चाहते थे कि निर्णय लेने की शक्ति नीचे तक पहुंचे। गांव केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी न हों, बल्कि अपने विकास की दिशा तय करने वाले नागरिक समुदाय बनें।
आज पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन सवाल यह है कि वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति कितनी नीचे पहुंची है? क्या गांव की सभा सचमुच गांव के भविष्य पर निर्णायक प्रभाव डालती है? क्या गरीब, किसान, मजदूर, महिला और वंचित नागरिक स्थानीय सत्ता में बराबर की आवाज रखते हैं?
सम्पूर्ण क्रांति का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक न्याय था। जेपी समझते थे कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा रहेगा, जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी। संविधान ने नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार दिए, लेकिन समाज में अवसरों की असमानता आज भी लोकतंत्र की गहराई को चुनौती देती है।
लाखों झोपड़ियों में उदासी और सत्ता-संपत्ति के बंगलों में चमक का जो विरोधाभास कविता में दिखाई देता है, वह आज भी हमारे विकास मॉडल पर सवाल खड़ा करता है। आर्थिक विकास के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं लेकिन उनके साथ यह देखना भी जरूरी है कि विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है। क्या किसान की आय, मजदूर की मजदूरी, युवाओं का रोजगार, बच्चों की शिक्षा और गरीब की गरिमा भी विकास के पैमाने में शामिल हैं?
जेपी की सम्पूर्ण क्रांति में शिक्षा भी केवल डिग्री हासिल करने का साधन नहीं थी। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो व्यक्ति को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाए। आज जब शिक्षा रोजगार की दौड़ और बाजार की जरूरतों के बीच सीमित होती जा रही है, तब जेपी का यह विचार फिर महत्वपूर्ण हो जाता है कि शिक्षित नागरिक का पहला दायित्व केवल अपना भविष्य बनाना नहीं, समाज के भविष्य के प्रति जिम्मेदार होना भी है।
और यहां पत्रकारिता की भूमिका भी सामने आती है। जेपी के दौर में पत्रकारिता सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती थी। आज भी लोकतंत्र को ऐसी पत्रकारिता की जरूरत है जो न सत्ता की चापलूसी करे, न विपक्ष की अंधभक्ति। पत्रकार का काम किसी दल के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि नागरिक के पक्ष में खड़ा होना है।
जेपी की विरासत को किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं बनाया जा सकता। वे समाजवादी थे, गांधीवादी थे, स्वतंत्रता सेनानी थे, लोकनायक थे—लेकिन इन सभी पहचान से ऊपर वे लोकतांत्रिक चेतना के प्रतिनिधि थे।
उनकी सबसे बड़ी देन शायद यही थी कि उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि सत्ता अंतिम सत्य नहीं है। जनता उससे बड़ी है। सरकार जनता के लिए है और जनता को सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
इसलिए जेपी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण से नहीं होगी। श्रद्धांजलि तब होगी जब कोई युवा भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएगा। कोई पत्रकार सत्ता से कठिन सवाल पूछेगा। कोई किसान अपने अधिकार के लिए संगठित होगा। कोई गांव अपने संसाधनों पर अपना हक मांगेगा। कोई नागरिक अन्याय के सामने चुप रहने से इनकार करेगा।
कविता की पंक्तियां फिर याद आती हैं—
“आओ कृषक, श्रमिक, नागरिको, इंकलाब का नारा दो,
कविजन, शिक्षक, बुद्धिजीवियो, अनुभव भरा सहारा दो।”

यह आह्वान आज भी उतना ही जरूरी है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज क्रांति का अर्थ बंदूक या हिंसा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार है। आज की सम्पूर्ण क्रांति का अर्थ हो सकता है—भ्रष्टाचार के विरुद्ध पारदर्शिता, सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध विकेंद्रीकरण, सामाजिक विभाजन के विरुद्ध बराबरी, भय के विरुद्ध नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक निष्क्रियता के विरुद्ध जनभागीदारी।
जेपी की मशाल किसी स्मारक में रखने के लिए नहीं थी। वह अंधेरे में रास्ता दिखाने के लिए थी।
आज जब लोकतंत्र की भाषा में चुनाव तो बहुत हैं लेकिन नागरिक भागीदारी का सवाल उतना ही बड़ा है; जब विकास की चमक के बीच असमानता की छाया दिखाई देती है; जब सत्ता मजबूत होती है लेकिन संस्थाओं की स्वतंत्रता पर बहस होती है; जब पत्रकारिता के सामने बाजार और सत्ता दोनों की चुनौतियां हैं—तब जेपी की याद इतिहास की ओर लौटना नहीं, वर्तमान से सवाल करना है।
जयप्रकाश का बिगुल कभी केवल एक व्यक्ति की आवाज नहीं था। वह जनता को उसकी शक्ति का अहसास कराने वाली आवाज थी।
उस आवाज का सबसे कठिन हिस्सा यही था कि उसने सत्ता से पहले समाज को बदलने की बात की थी।
इसलिए जेपी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम फिर पूछें—लोकतंत्र में जनता की जगह कहां है? सत्ता कितनी जवाबदेह है? असहमति के लिए कितनी जगह बची है? और सम्पूर्ण क्रांति का सपना आखिर किस मोड़ पर अधूरा रह गया?
जब तक ये सवाल जीवित हैं, जेपी भी जीवित हैं।
और जब तक अंधेरा है, मशाल की जरूरत भी बनी रहेगी।

कुमार कृष्णन