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संशय के दौर में सच का संबल हैं कबीर के विचार

संत कबीर जयंती विशेष : २९ जून

उमेश कुमार साहू

आज तकनीक के चरम और मानवीय संवेदनाओं के अवसान के इस संक्रमण काल में, जब समाज वैचारिक ध्रुवीकरण, असहिष्णुता और दिखावे की अंधी दौड़ से जूझ रहा है, तब से लगभग छह सौ साल पहले बनारस की गलियों से गूंजी एक फकीर की आवाज आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक लगती है। संत कबीरदास केवल अतीत के एक कवि नहीं, बल्कि वर्तमान की हर सामाजिक और मानसिक व्याधि के अचूक वैद्य हैं।

आज जब ‘फेक न्यूज’ और आपसी अविश्वास के कारण समाज खंडित हो रहा है, तब कबीर का सत्य, उनकी निडरता और आत्म-अवलोकन की दृष्टि हमारे लिए जीवन बदलने वाले ज्ञान का अजस्र स्रोत है। आइए, कबीर जयंती के इस पावन अवसर पर उनके 10 कालजयी दोहों के माध्यम से समझें कि आज के संदर्भ में वे हमारे लिए कितने अनिवार्य हैं।

1. आत्म-अवलोकन और सहिष्णुता (Self-Reflection)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: सोशल मीडिया के इस दौर में हम दूसरों को जज करने, उनकी कमियाँ निकालने और उन्हें ‘ट्रोल’ करने में एक पल नहीं लगाते। कबीर कहते हैं कि उंगली उठाने से पहले खुद के भीतर झांको। यदि हर व्यक्ति दूसरों को सुधारने के बजाय आत्म-सुधार पर ध्यान दे, तो समाज से आधा विद्वेष स्वतः समाप्त हो जाएगा।

2. वाणी की मधुरता और मानसिक शांति (Right Speech)

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोये।

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होये॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: आज की बहसों और चर्चाओं में तर्क कम और चीख-पुकार ज़्यादा है। कबीर का यह दोहा ‘कम्युनिकेशन स्किल’ का सबसे बड़ा पाठ है। अहंकार मुक्त और मधुर वाणी न केवल सुनने वाले को शांति देती है, बल्कि बोलने वाले के मानसिक तनाव को भी कम करती है।

3. बाह्याडंबर और पाखंड पर प्रहार (Authenticity over Show-off)

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहीं।

मनुआं तो दहुं दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहीं॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: आज का युग ‘दिखावे’ (Lifestyle Show-off) का युग है। लोग अंदर से अशांत हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर सुखी होने का ढोंग कर रहे हैं। कबीर कहते हैं कि जब तक आपका मन एकाग्र और सच्चा नहीं है, तब तक आपके सारे बाहरी प्रयास, डिग्रियां और स्टेटस सिंबल व्यर्थ हैं।

4. अतिवाद का विरोध और संतुलन (The Middle Path)

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।

अति का भला न बरसनाव, अति की भली न धूप॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: चाहे राजनीति हो, खान-पान हो या विचार—आज हर जगह अतिवाद (Extremism) हावी है। कबीर यहाँ बुद्ध के ‘मध्यम मार्ग’ की वकालत करते हैं। जीवन में संतुलन ही स्थिरता की कुंजी है। किसी भी चीज की ‘अति’ विनाश का कारण बनती है।

5. ज्ञान और योग्यता का सम्मान (Value of Substance)

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: आज भी समाज जाति, धर्म और वंश के संकीर्ण दायरों में बंटा हुआ है। कबीर कहते हैं कि बाहरी आवरण (म्यान) को देखकर भ्रमित न हों, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक योग्यता और ज्ञान (तलवार) का सम्मान करें। यह दोहा आधुनिक ‘मेरिटोक्रसी’ (योग्यता तंत्र) का आधार है।

6. धैर्य और सतत प्रयास (Patience and Consistency)

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: ‘इंस्टेंट नूडल्स’ और ‘वन-क्लिक’ के इस दौर में युवा पीढ़ी में धैर्य (Patience) समाप्त होता जा रहा है। कबीर याद दिलाते हैं कि प्रकृति का नियम नहीं बदलता। सफलता के लिए समय और निरंतर प्रयास अनिवार्य हैं। सही समय आने पर ही मेहनत का फल मिलता है।

7. निंदा का सकारात्मक उपयोग (Constructive Criticism)

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: आज लोग जरा सी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते और ‘इको चैंबर’ में रहना पसंद करते हैं जहाँ सिर्फ उनकी तारीफ हो। कबीर के अनुसार, आलोचक तो आपके मुफ्त के सलाहकार हैं, जो बिना किसी खर्च के आपकी कमियाँ बताकर आपका व्यक्तित्व निखारते हैं।

8. कर्म की प्रधानता और टालमटोल की आदत (Procrastination)

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: ‘प्रोक्रैस्टिनेशन’ यानी काम को टालना आज की सबसे बड़ी समस्या है। कबीर समय की महत्ता और उसकी अनिश्चितता को रेखांकित करते हैं। जो काम करना है, उसे तुरंत करें, क्योंकि भविष्य किसी के नियंत्रण में नहीं है।

9. सादगी और संतोष का जीवन (Contentment)

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।

मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: असीमित उपभोक्तावाद (Consumerism) और लालच ने पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को संकट में डाल दिया है। कबीर का यह दोहा ‘सस्टेनेबल लिविंग’ (सतत जीवन) का मूलमंत्र है। जितनी आवश्यकता हो, उतना ही संचय करें, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक संसाधन पहुँच सकें।

10. अहंकार का त्याग (Humility)

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे॥

·    आज के संदर्भ में प्रासंगिकता: सत्ता, संपत्ति और पद का अहंकार क्षणभंगुर है। कबीर जीवन की अंतिम सच्चाई यानी मृत्यु से साक्षात्कार कराते हुए याद दिलाते हैं कि हम सब अंततः इसी मिट्टी में मिल जाना है। इसलिए अहंकार छोड़कर विनम्रता का मार्ग अपनाना ही बुद्धिमानी है।

कबीर सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, जीने के लिए हैं

कबीरदास जी ने जब ये बातें कहीं थीं, तब न तो इंटरनेट था और न ही आधुनिक सुख-सुविधाएं। इसके बावजूद इंसानी फितरत को भांपने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। कबीर का दर्शन किसी एक धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है।

आज कबीर जयंती पर केवल उनकी मूर्ति पर सूत की माला चढ़ा देना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी प्रासंगिकता तब सिद्ध होगी जब हम उनके विचारों की ‘सच्ची तलवार’ से अपने भीतर के ‘अहंकार और पाखंड की म्यान’ को काट फेंकेंगे। आज के भ्रमित जनमानस के लिए कबीर के ये दोहे जीवन बदलने वाले प्रकाशपुंज हैं। आइए, इस उजाले को अपने भीतर उतारें।

उमेश कुमार साहू