(करवा चौथ पर विशेष) 29 अक्तूबर
चेतन चौहान
करवा चौथ अब केवल लोक परम्परा नहीं रह गई है। पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश भी हो चुका है और अब यह त्योहार भावनाओं पर केन्द्रित हो गया है। आज न केवल पत्नी बल्कि पति भी अपनी पत्नी के लिए करवा चौथ का व्रत करते हैं। पति का व्रत रखना परंपरा का विस्तार है। इस पर्व को अब सफल और खुशहाल दाम्पत्य की कामना के लिए किया जा रहा है। हमारे समाज की यही खासियत है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश लगातार करते रहते हैं। कभी करवा चौथ पत्नी के, पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा से दमक और महक रहा है। आधुनिक होते दौर में हमने अपनी परंपरा तो नहीं छोड़ी है, अब इसमें ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। इस पर्व में आज की युवा पीढ़ी ने नए रंग भर दिए हैं, जिसमें आज भी परम्पराएं कायम हैं।
करवा चौथ का व्रत शुरू होता है सुबह तारों की छाव में सास के हाथ की सरगी खाने से जो कि महिलाओं के धैर्य और प्रेम की परीक्षा के साथ चन्द्रोदय पर पूरा होता है। सरगी में फेनी, केला, दूध, मिठाई के साथ सास का प्यार भरा आशीर्वाद होता है। इसके बाद महिलाएं सज-धज कर व्रत की कथा सुनती है, सास को बायना और करवा भेंट कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। पूजा में रोली-मोली, बिंदी, सिंदूर, अक्षत, चावल सहित सुहाग की चीजें रखी जाती हैं। करवा चौथ का व्रत हमें प्यार की सीख देने के साथ-साथ भूल करने से भी बचने का संदेश देता है। पति की लम्बी उम्र की कामना के लिए इस व्रत में महिलाएं दिनभर निर्जल उपवास रखती हैं।
इस दिन सुहागिनें रंग-बिरंगे कपड़े पहन कर सोलह श्रृंगार से खुद कों सजाती हैं। घर में खुशहाली और सौभाग्य प्राप्ति के लिए हाथों पर मेहंदी लगाती हैं। शाम को चंद्रमा उदय होने के बाद विवाहित स्त्रियां विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं और पति के हाथों से ही जल ग्रहण कर अपना उपवास तोड़ती हैं।
करवाचौथ की शाम सुहागन छलनी से चांद देखकर व्रत खोलती हैं। इसलिए अमीर हो या गरीब, सभी व्रत रखने वाली महिलाएं इस अवसर पर नई छलनी खरीदती हैं। व्रत की शाम छलनी की पूजा करके चांद को देखते हुए प्रार्थना करती हैं कि उनका सौभाग्य और सुहाग सलामत रहे। करवाचौथ में छलनी के महत्व के पीछे एक पैराणिक कथा है। कथा के अनुसार करवा चौथ के व्रत के दौरान अपनी बहन की परेशानी से व्याकुल होकर भाईयों ने छलनी में दीपक जला कर बहन को चांद दिखा कर उसका उपवास तुड़वा दिया जिसके कारण बहन के पति की मृत्यु हो गई। इस कथा को ध्यान में रखते हुए महिलाएं छलनी में दीपक रखकर अपना व्रत पूरा करती है। जो यह सिखाती है कि कोई छल से उनका व्रत तोड़ न दे। साथ ही करवा चौथ में छलनी लेकर चांद को देखना यह भी सिखाता है कि पतिव्रत का पालन करते हुए किसी प्रकार का छल उसे प्रतिव्रत से डिगा न सके।
करवाचौथ में सबसे अहम करवा होता है। करवा का अर्थ होता है मिट्टी का बर्तन। इस व्रत में सुहागिन स्त्रियां करवा की पूजा करके करवा माता से प्रार्थना करती है कि उनका प्रेम अटूट हो। पति-पत्नी के बीच विश्वास का कच्चा धागा कमजोर न हो पाए। इसके लिए मिट्टी के बरतन को प्रतीक चिन्ह के रूप में प्रयोग किया जाता है, क्योंकि मिट्टी के बर्तन को ठोकर लग जाए तो चकनाचूर हो जाता है, फिर जुड़ नहीं पाता है। इसलिए हमेशा यह प्रयास बनाए रखना चाहिए कि पति-पत्नी के प्रेम और विश्वास को ठेस नहीं पहुंचे।
वैसे देखा जाए तो अखंड सौभाग्य की इच्छा के व्रत के रूप में यह पति-पत्नी का विशुद्ध प्रेम व्रत है ही, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि यह पर्व संबन्धों में भी प्रेम प्रगाढ़ता को बढ़ावा देता है। इस दिन सास, जेठानी या घर के अन्य सदस्यों के प्रति भी कोई मनमुटाव रहता है तो उसकी कालिमा भी व्रत के प्रकाश में धुल जाती है। सामीप्य तो बढ़ता ही है, साथ ही स्नेह की जो अविरल धारा पूरे परिवार में बहने लगती है, उससे सभी भावविभोर हो जाते हैं व पति के मन में भी अपनी पत्नी के प्रति अनन्य प्रेम – उपजता है, क्योंकि पत्नी और चाहती भी क्या है, सिवाय अपने पति से प्रेम-प्यार और सहानुभूति के अलावा कुछ भी तो नहीं।
चेतन चौहान