लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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dsc_0438सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल कश्मीर हो आया। नतीजा क्या निकला? उल्टा ही हुआ! गृहमंत्री राजनाथसिंह ने पूरी कोशिश कर ली। न जाकर भी देखा और जाकर भी देख लिया। पहले खुद जाकर देखा, फिर सबको ले जाकर देख लिया। हुर्रियतवालों के हाथों अपनी उपेक्षा भी देख ली। शरद यादव, सीताराम येचूरी, डी. राजा वगैरह को जीलानी ने अपने घर में घुसने तक नहीं दिया। वे अपना-सा मुंह लेकर लौट आये। जिन सैकड़ों लोगों से यह प्रतिनिधि-मंडल मिला, क्या उन्होंने पत्थरफेंकू नौजवानों से शांति की अपील की? यदि वे अपील करते तो क्या उसका जरा-सा भी असर उन लड़कों पर होता?

तो फिर नतीजा क्या निकला? यही कि सारे मामले से अब प्रीतिपूर्वक नहीं, यथयोग्य ढंग से निपटा जाए। पत्थरफेंकू जवानों पर अब छर्रे नहीं चलाएं जाएंगे लेकिन उनको भड़काने वाले नेताओं पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। अलगाववादी नेताओं के पासपोर्ट जब्त किए जाएंगे, ताकि वे विदेश-यात्राएं नहीं कर सकें। उनके बैंक-खातों और नकद लेन-देन पर निगरानी और जांच भी कड़ी की जाएगी। उनकी सुरक्षा पर खर्च भी काटा जाएगा। हिंसक तत्वों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई काफी कड़ी की जाएगी।

इतना सख्त रवैया सरकार पहले भी अपना सकती थी लेकिन उसने अच्छा किया कि पहले उसने इंसानियत की राह पकड़ी। अब वह वही करेगी, जो सरकारें अक्सर करती हैं। यदि लड़के पत्थर चलाएंगे तो वह गोलियां चलाएगी। यह बहुत ही बुरा होगा। कई गुना ज्यादा लोग मरेंगे लेकिन कश्मीरियों का कोई फायदा नहीं होगा। दुनिया में उनकी कोई नहीं सुनेगा, क्योंकि उनकी बगावत पाकिस्तान से जुड़ गई है और पाकिस्तान आतंकवाद से जुड़ गया है। यदि वह हिंसा 60 दिन क्या, 600 दिन भी इसी तरह से चलती रही तो भी उनके लिए कोई आंसू गिराने वाला देश सामने नहीं आएगा।

कश्मीर के नौजवान यह क्यों नहीं समझते कि उनके कश्मीर को न भारत से अलग किया जा सकता है और न ही पाकिस्तान से। हां, दोनों कश्मीरों को आपस में मिलाया जा सकता है और उन्हें ज्यादा से ज्यादा स्वायत्तता दी जा सकती है। इसी स्वायत्तता का नाम आजादी है, खुदमुख्तारी है। जो लोग अपने आपको कश्मीरियों का नेता कहते हैं, वे इस आजादी पर भी बात नहीं करना चाहते तो वे चाहते क्या हैं? यदि वे चाहते हों कि कश्मीर एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बन जाए तो उसका विरोध भारत से भी ज्यादा पाकिस्तान करेगा।

One Response to “कश्मीरः अब पत्थरों के बदले गोलियां”

  1. Dr Ashok kumar Tiwari

    लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं ——– एहसानफरामोशी की भी एक हद होती है । काश्मीर में आतंकवादियों की नाज़ायज़ औलादों ने वो भी तोड़ दी ।पहले उग्रवादी दहशतगर्दों ने कश्मीरी पंडितों को तरह-तरह की यातनाएं देकर विस्थापित किया और उनके अधिकार पर खुद कब्जा कर लिया । इतने पर मन नहीं भरा इनका । नित नए कारनामे । कभी आतंक का ख़ूनी खेल तो कभी भारत का तिरंगा जला देना । भारत सरकार द्वार प्रदान की गयी सुरक्षा और सेवा लेना फिर भी उसी पर पत्थर बरसाना । घटिया, गिरे हुए, निम्न मानसिकता वाले गंदे नाली के कीड़े हैं ये लोग । जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं । गत वर्ष बाढ़ में जिन्हें बचाया सेना ने , जीवन दान दिया , ये उन्हीं जवानों पर पत्थर बरसा रहे हैं । नवाज़ शरीफ में शराफत तो ज़रा भी नहीं है , अक्ल भी घास चरने गयी है । आतंकी बुरहान को शहीद कह रहा है और जितने गधे है वे भी यही अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं । इन कूप मंडूकों को जल्दी ही अपनी सेना शहादत का मज़ा भी चखायेगी और उसका अर्थ भी बताएगी । उसके बाद ही इन कमजर्फों को अकल आएगी और शहीद होने न नाम नहीं लेंगे दुबारा । लातों के भूत बातों से नहीं मानते , इनको यहीं की भाषा में समझाना पड़ता है ।
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    आपको रुबैया याद है…
    1989 में रुबैया जो की मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी थी… को जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादियों ने अगवा कर लिया था.. मुफ़्ती मोहम्मद सईद उस वक्त V P Singh की सरकार में गृह मंत्री हुआ करते थे… रुबैया को छोड़ने की ऐवज में आतंकियों ने अपने पांच साथियों की रिहाई की शर्त राखी थी…
    मुफ़्ती मोहम्मद सईद आज़ाद भारत के पहले मुस्लिम गृह मंत्री थे… और उनके गृह मंत्री पद की शपथ लेने के महज पांच दिनों बाद ही उनकी बेटी रुबैया को अगवा कर लिया गया था…. रुबैया उस वक्त 23 साल की थी, जिन पांच आतंकियों की रिहाई की शर्त उन मुजाहिदीनों ने रखी थी, वो थे शेख अब्दुल हमीद, jklf का एरिया कमांडर, गुलाम नबी भट्ट (मक़बूल भट्ट का छोटा भाई), नूर मोहम्मद कलवल, मोहम्मद अल्ताफ, और जावेद अहमद ज़रगर…
    8 दिसम्बर को रुबैया को अगवा किया गया, और पांच दिनों बाद, 13 दिसम्बर को छोड़ दिया गया…. पहले तो मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने आतंकियों की मांग को ठुकरा दिया था, लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने मांगे मान लीं….
    उसके बाद मुफ़्ती साहब दो बार जम्मू और कश्मीर के मुख्य मंत्री रहे… उसी रुबैया की बड़ी बहिन मेहबूब मुफ़्ती आज जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री है, बाद में ऐसा सुनने में आया था, की वो किडनैपिंग मात्रा एक सोची समझी साजिश थी, आतंकियों को छुड़ाने के लिए….

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