समाज

केरल की वृद्ध संरक्षण पहल से जगेगी नई चेतना

-ः ललित गर्ग:-

भारत की संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। यहाँ कहा गया है-‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।’ जिस देश में माता-पिता के चरणों में स्वर्ग देखने की परंपरा रही हो, उसी देश में यदि वृद्धावस्था में माता-पिता अपने ही घर में उपेक्षा, अपमान, अकेलेपन और असुरक्षा का दंश झेलने को विवश हों, तो यह केवल पारिवारिक विघटन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है। जिस बुजुर्ग ने अपनी संतान के भविष्य के लिए वर्तमान को खपा दिया, यदि उसी संतान के पास उसके बुढ़ापे के लिए समय, संवेदना और स्नेह न बचे, तो विकास की चमक के बीच मानवीय मूल्यों का अंधेरा साफ दिखाई देता है। ऐसे समय में केरल विधानसभा द्वारा अक्टूबर 2026 में वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से संबंधित व्यापक विधेयक पारित किया जाना एक आशाजनक पहल है। यह कानून की किताब में जुड़ा एक नया अध्याय भर नहीं, बल्कि बुजुर्गों के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और भरोसे का नया सूर्योदय बनने की क्षमता रखता है। भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 15 करोड़ बताई जा रही है। अनुमान है कि यह आबादी 2036 तक लगभग 23 करोड़ और 2050 तक 34 करोड़ से अधिक हो सकती है। यह बदलती जनसांख्यिकी हमें चेतावनी भी देती है और अवसर भी। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति तथा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं ने मनुष्य की आयु बढ़ाई है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमने जीवन की बढ़ती अवधि को गरिमापूर्ण बनाने की तैयारी भी की है? सिर्फ लंबी उम्र उपलब्धि नहीं है, उस उम्र में सम्मान, आत्मनिर्भरता और अपनापन बनाए रखना ही वास्तविक उपलब्धि है।
केरल की इस पहल का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह बुजुर्गों की समस्याओं को केवल परिवार की निजी जिम्मेदारी मानकर छोड़ देने के बजाय सामाजिक और संस्थागत दायित्व के रूप में देखती है। विधेयक में वरिष्ठ नागरिकों के साथ शारीरिक एवं मानसिक दुर्व्यवहार, क्रूरता और उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें बेसहारा छोड़ने जैसे कृत्यों के लिए दंड का प्रावधान किया गया है। इसके साथ संरक्षण इकाइयों, देखभाल केंद्रों के नियमन, देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण और शिकायतों के निवारण जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है। साइबर धोखाधड़ी से बचाव तथा बुजुर्गों के स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों के अधिकार जैसे विषयों को स्थान देना भी बदलते समय की जरूरतों को समझने का संकेत है। इस पहल का मूल संदेश स्पष्ट है-बुजुर्गों की सेवा सद्भावना का विषय अवश्य है, लेकिन उनकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य दायित्व भी है। इस विधेयक की सबसे संवेदनशील अवधारणा है-‘एजिंग इन प्लेस’, अर्थात बुजुर्गों को यथासंभव उनके अपने घर और परिचित परिवेश में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना। वृद्धाश्रमों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन माता-पिता के लिए घर का एक कमरा भी तब अधिक मूल्यवान होता है, जब उसमें अपनत्व की गर्माहट हो। बुजुर्गों को केवल भोजन, दवा और बिस्तर नहीं चाहिए, उन्हें बातचीत करने वाला साथी, उनकी बात सुनने वाला कान, उनके अनुभवों को समझने वाला मन और उनके अस्तित्व को स्वीकार करने वाला परिवार चाहिए। उम्र के इस पड़ाव पर कई बार आर्थिक अभाव से अधिक भावनात्मक अभाव पीड़ा देता है। जिस घर में बुजुर्गों की आवाज अनसुनी हो जाती है, वहाँ दीवारें तो रहती हैं, लेकिन परिवार की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
आज संयुक्त परिवारों का विघटन, महानगरों की भागदौड़, विदेशों की ओर पलायन और बढ़ती व्यक्तिवादी प्रवृत्ति ने बुजुर्गों के जीवन को कठिन बनाया है। कभी दादा-दादी और नाना-नानी परिवार की जीवंत पाठशाला होते थे, उनकी कहानियों में इतिहास, अनुभवों में विवेक और आशीर्वाद में जीवन की पूँजी मिलती थी। आज उसी अनुभव-संपदा को कई बार अनुपयोगी समझ लिया जाता है। संपत्ति के लिए माता-पिता पर दबाव डालना, उनकी जमा-पूँजी पर अनुचित अधिकार जमाना, बीमारी में उन्हें अकेला छोड़ देना अथवा उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। यह कैसी विडंबना है कि जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, उन्हीं हाथों को बुढ़ापे में सहारे के लिए तरसना पड़े! केरल का विधेयक इस समस्या के समाधान की दिशा में व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसमें वरिष्ठ नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार और उन्हें बेसहारा छोड़ने पर तीन वर्ष तक के कारावास तथा 50 हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। देखभाल केंद्रों के पंजीकरण, देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण, शिकायतों के निवारण और साइबर धोखाधड़ी से सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ भी प्रस्तावित हैं। साथ ही, वरिष्ठ नागरिकों के चिकित्सा संबंधी पूर्वनिर्धारित निर्णयों, कानूनी सहायता और डिजिटल सेवाओं तक पहुँच को महत्त्व दिया गया है। उल्लेखनीय है कि विधानसभा ने यह विधेयक 26 अक्टूबर 2026 को सर्वसम्मति से पारित किया है, इसे कानून के रूप में लागू होने के लिए राज्यपाल की स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इस पहल का एक दूरदर्शी पक्ष ‘सिल्वर इकोनॉमी’ की अवधारणा भी है। बुजुर्गों को केवल सहायता प्राप्त करने वाले नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि समाज के सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुभव, ज्ञान, कौशल और जीवन-दृष्टि का उपयोग शिक्षा, परामर्श, सामाजिक सेवा, उद्यमिता और सामुदायिक विकास में किया जा सकता है। सेवानिवृत्ति का अर्थ प्रतिभा की समाप्ति नहीं, बल्कि जीवन की दूसरी पारी का आरंभ भी हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज उन्हें बोझ नहीं, अपनी अमूल्य पूँजी माने। पेड़ जब पुराना होता है, तब भी उसकी छाया कम मूल्यवान नहीं हो जाती। इसी तरह अनुभव की परिपक्वता किसी भी राष्ट्र की विकास-यात्रा को दिशा दे सकती है। अब समय है कि केंद्र सरकार के साथ दूसरे राज्य भी केरल की इस पहल से प्रेरणा लें। केंद्र के माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा हो तथा आवश्यकतानुसार उसे और सशक्त बनाया जाए। राज्यों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए समर्पित संरक्षण इकाइयाँ, सुलभ शिकायत व्यवस्था, निःशुल्क कानूनी सहायता, घर पर स्वास्थ्य सेवाएँ और सुरक्षित सामुदायिक केंद्र विकसित किए जाएँ। पुलिस, अस्पतालों, बैंकों और स्थानीय निकायों में बुजुर्गों की समस्याओं के त्वरित समाधान की व्यवस्था हो। साथ ही, विद्यालयों और महाविद्यालयों में पीढ़ियों के बीच संवाद तथा परिवारों में संवेदनशीलता विकसित करने के अभियान चलाए जाएँ। कानून अपराध होने के बाद दंड दे सकता है, लेकिन संस्कार अपराध की नौबत आने से पहले ही रोक सकते हैं।
अंततः बुजुर्गों की सुरक्षा का प्रश्न केवल एक आयु-वर्ग के कल्याण का विषय नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा का निर्धारक है। आज जो युवा हैं, वे कल वरिष्ठ नागरिक होंगे। इसलिए बुजुर्गों के लिए बनाई गई संवेदनशील व्यवस्था वास्तव में हमारे अपने भविष्य की सुरक्षा है। विकसित भारत और विश्वगुरु भारत का स्वप्न तभी सार्थक होगा, जब आर्थिक समृद्धि के साथ मानवीय संवेदना, तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक चेतना और आधुनिक जीवन के साथ पारिवारिक आत्मीयता भी विकसित होगी। केरल की पहल एक नई रोशनी का संकेत है, लेकिन इस रोशनी को देश के प्रत्येक घर तक पहुँचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें ऐसा भारत बनाना है, जहाँ वृद्धावस्था विवशता नहीं, सम्मान का काल होय जहाँ बुजुर्गों को अपने ही घर में पराया न होना पड़ेय और जहाँ उनकी आँखें संतान की प्रतीक्षा में नहीं, उसके प्रेम और उपस्थिति में चमकें। आखिर जिस समाज की जड़ें अपने बुजुर्गों के अनुभवों से जुड़ी रहती हैं, उसकी विकास-यात्रा के तूफानों में भी स्थिर रहने की संभावना अधिक होती है। यही सच्चे अर्थों में संस्कारित, समृद्ध और विकसित भारत की पहचान होगी।