लालू की अवसरवादी राजनीति


सुरेश हिन्दुस्थानी
बिहार की सत्ता से बेदखल किए गए राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की वर्तमान राजनीति खेलेंगे नहीं तो खेल जरूर बिगाड़ देंगे, वाली उक्ति को चरितार्थ करती हुई दिखाई दे रही है। चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खा चुके लालू प्रसाद यादव सरकार से अलग होने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर 26 वर्ष पहले हुए हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगा रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो लालू के इस कदम पर यही कहा जा सकता है कि वे सरकार में शामिल रहते तो संभवत: आरोप लगाने की राजनीति नहीं कर रहे होते। वर्तमान में जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके लिए अपराधी बन गए हैं, वही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके गठबंधन में रहने तक ठीक थे। कहा जाए तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की यह राजनीति अवसरवाद का साक्षात्कार कराती हुई दिखाई देती है। जिसमें उनका मतलब सिद्ध हो रहा था तब तक नीतीश कुमार दूध के धुले दिखाई दे रहे थे, जब मतलब सिद्ध होता नहीं दिख रहा तब नीतीश कुमार पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं। वास्तव में इस प्रकार की अवसरवादिता वाली राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए कुठाराघात का काम कर रही है। ऐसे अवसरवाद बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में यदाकदा देखने को मिले हैं, जिसमें पहले कांगे्रस को रोकने के लिए राजनीतिक चिंतन और मंथन होता हुआ दिखता था, आज भाजपा को रोकने के लिए यह सब हो रहा है। इस प्रकार की सोच रखने वाले राजनीतिक दल केवल अपने स्वार्थ सिद्ध होने के लिए ही राजनीति करते हैं। लालू प्रसाद यादव के बारे में एक बहुत बड़ा सच यह है कि वे स्वयं भ्रष्टाचार के विरोध में कोई सवाल खड़ा नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करते समय उनकी तरफ अनेक सवाल खड़े हो जाएंगे। इन्हीं सवालों से उन्होंने कई बार बचने का असफल प्रयास भी किया, लेकिन सवालों की गुफा इतनी गहरी निकली कि उससे निकलने का कोई मार्ग ही नहीं सूझा। वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोध में 1991 के सीताराम हत्याकांड के मामले को हवा दी है, लेकिन इन हवाओं के झोंके अब उनको ही झकझोरने लगे हैं। लालू प्रसाद यादव सवाल उठा रहे हैं, तो सवाल उनकी तरफ भी हैं। यहां सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि नीतीश कुमार वास्तव में ही दोषी हैं तो फिर लालू प्रसाद सबसे बड़े दोषी बन जाएंगे। क्योंकि उन्होंने एक हत्या के आरोपी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन कराया, जो लोकतंत्र की दृष्टि से एक गंभीर अपराध है। लालू प्रसाद यादव जिस प्रकार के आरोपों की राजनीति कर रहे हैं, वह उनकी बौखलाहट को ही प्रदर्शित करता दिखाई दे रहा है। यह बात सही है और कई अवसरों पर प्रमाणित भी हो गया है कि लालू प्रसाद यादव अवसरवादी हैं, उनकी बौखलाहट उनकी असवरवादिता का प्रमाणीकरण कहा जा सकता है। आज बिहार का गठबंधन परिवर्तित नहीं होता तो लालू को नीतीश पर आरोप लगाने का कोई अवसर ही नहीं मिलता। जब सत्ता में थे, तब कोई आरोप नहीं, लेकिन जब सत्ता से बाहर हुए तो आरोप लगाने का अवसर मिल गया। यही तो अवसरवादिता है।
वर्तमान में देश की जनता राजनीतिक दलों से जिस प्रकार की शुचिता और स्वच्छ राजनीति की कल्पना करती है, अनेक राजनीतिक दलों के नेता उस पर खरे नहीं उतर रहे। राजद के लालू प्रसाद यादव ने भी ऐसी ही खरे नहीं उतरने वाली राजनीति का अहसास कराया है। सच यही है कि लालू ही नहीं किसी को भी इस प्रकार की अवसरवादी राजनीति नहीं करनी चाहिए। हमारे देश की यह सबसे बड़ी विसंगति कही जाएगी कि राजनेता सच्चे लोकतंत्र को मटियामेट करने पर उतारु हैं। लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच यह है कि इसमें नेता कुछ भी नहीं हैं, वे तो मात्र जनता के प्रतिनिधि हैं। भारत की असली सरकार तो जनता है, लेकिन हमारे नेता आज खुद को ही सरकार मानकर व्यवहार कर रहे हैं। जो लोकतंत्र के लिए घातक ही नहीं, बल्कि विनाशकारी भी है।
आज राजनीतिक शुचिता लाने के लिए सबसे पहले यही जरुरी माना जा रहा है कि राजनीति को अपराध से दूर रखा जाए और स्वस्थ राजनीति करने वालों को देश की कमान सौंपी जाए। जो कम से कम अपने स्वार्थ से हटकर देश का भी ध्यान रखे और देश की जनता का भी ध्यान रखे, लेकिन आज ऐसा क्यों नहीं हो रहा। इसके पीछे एक ही कारण माना जा सकता है कि कहीं न कहीं राजनीति में भी अपराध की दखल हा गई है। कौन नहीं जानता कि जो लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं, वह भी सक्रिय राजनीति करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इतना ही आज तो उनके पूरे परिवार पर आरोप लगे हैं। ऐसे में सवाल यही आता है कि जब ऐसे लोग राजनीति करेंगे तो फिर लोकतंत्र की रक्षा कौन करेगा।
वास्तव में बिहार की राजनीति में बहुत कुछ नहीं बदला, पहले भी नीतीश की सरकार थी, आज भी है। बदला है तो केवल लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक हस्तखेप। जब लालू प्रसाद यादव राजनीतिक रुप से शक्तिशाली रहे, तब तक सरकार ठीक थी, लेकिन अब खराब हो गई। यह सब उस जनता के सामने हो रहा है, जिसने गठबंधन को सत्ता दिलाई। वे भूल गए हैं कि लोकतंत्र में संख्या बल ही सब कुछ होता है। नीतीश कुमार आज भी बहुमत सिद्ध करने वाले मुख्यमंत्री हैं। लोकतांत्रिक तरीके से अध्ययन किया जाए तो भी यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नीतीश कुमार ने विधिवत तरीके से राज्य की सत्ता का आरोहण किया किया है। इसके सबके बाद वर्तमान में लालू प्रसाद यादव की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उनका पूरा परिवार भ्रष्टाचार के आरोपों की गिरफ्त में है। इसी के कारण लालू प्रसाद यादव की बौखलाहट बढ़ती जा रही है। वास्तव में लालू प्रसाद अपने और परिवार के ऊपर लगे आरोपों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो उन्हें फिर से जन सेवा की राजनीति की ओर अपने कदम बढ़ाना होंगे, केवल आरोप लगाने मात्र से वह निष्कलंक साबित नहीं हो सकते। बिहार में अब सभी दलों को केवल बिहार के विकास के मामले को लेकर ही राजनीति करनी चाहिए। जो सभी दलों के हित में तो है ही, साथ राज्य की जनता के हित में भी है।

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