बोझ क्यों बन जाते हैं
माँ-बाप अपनी संतान पर,
जिन्होंने उम्र लगा दी
उसकी एक मुस्कान पर।
कभी गोद में उठाया था,
कभी उंगली पकड़ चलाया था,
अपने हिस्से के सपने छोड़कर,
उसका संसार सजाया था।
किन्तु चाहिए आजादी संतान को,
एक उम्र गुज़र जाने के बाद,
चुभती है रोक-टोक उनकी,
जिन्होंने जान लगाई परवरिश में ।
आजादी चाहिए किससे—
माँ-बाप की निगाहों से?
या उस ममता से
जो बंधी है दुआओं से?
संस्कारों के वो किस्से,
अब पुराने लगते हैं,
जिन माँ-बाप के चरणों में
कभी मंदिर बसते थे।
माँ-बाप तो बस चाहते हैं,
सुखी रहे उनकी संतान,
बच्चा हँस दे एक पल,
खिल उठता है उनका जहान।
बात समझ आती है अक्सर,
बहुत देर गुजर जाने पर,
जब हाथ रह जाते हैं खाली,
और तस्वीर बस दीवार पर।
सूनी तस्वीर, गले में माला,
सूखे फूलों पर धूल,
पूछती है हर आने-जाने वाले से—
क्या हमारी परवरिश थी भूल?
कैसा हुआ मानस आज का
ये सवाल दिल मे रह गया,
औलाद को अपना समझने वाला
शायद खुद ही गलत रह गया।
तब पछता कर पूछेगा—
क्या मिला इतनी आजादी से?
जिसे अपना होना था,
क्यों हार गए इस रिश्ते से?
दोष किसका होगा आखिर,
परवरिश का या समय का?
या उस औलाद का,
जो कदर भूल गई माँ-बाप की?
याद रखना—माँ-बाप को
बोझ कभी मत समझना,
जिस दिन छूट जाए हाथ,
उस दिन उम्र भर तरसना।
माँ-बाप फिर नहीं मिलते,
ये बात दिल में रखना,
जीते जी उनका दिल रख लेना,
बाद में तस्वीर से क्या कहना?
मुनीष भाटिया