कुमार कृष्णन
स्वतंत्रता दिवस केवल उस तारीख को याद करने का अवसर नहीं है, जब भारत ने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई। यह उन संघर्षों और बलिदानों को स्मरण करने का दिन भी है, जिन्होंने आजादी की जमीन तैयार की। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला व्यापक स्वतंत्रता संग्राम सामान्यतः 1857 को माना जाता है, लेकिन अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का बिगुल उससे बहुत पहले बज चुका था। बिहार के राजमहल और संथाल परगना की पहाड़ियों में अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में तिलका मांझी की अगुवाई में हुआ संघर्ष इसी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
1857 से लगभग सात दशक पहले अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले तिलका मांझी इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि उनका संघर्ष केवल विदेशी शासन के खिलाफ नहीं था, बल्कि जमीन, जंगल और जीवन पर समुदाय के अधिकार का संघर्ष भी था। उनके प्रतिरोध में अपनी धरती, अपनी आजीविका और अपनी सामाजिक व्यवस्था को बचाने की बेचैनी स्पष्ट दिखाई देती है।
अंग्रेजी सत्ता के आगमन से पहले राजमहल की पहाड़ियों और जंगल-तराई का जीवन अपनी विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर टिका था। पहाड़िया आदिवासी मुख्यतः आखेट, खाद्य-संग्रह, झूम खेती और जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर थे। लकड़ी, फल-फूल, पत्ते और जड़ी-बूटियां उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं। जंगल उनके लिए कोई बाजारू संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का आधार था।
मैदानी भागों के जमींदारों और पहाड़िया सरदारों के बीच भी एक पारंपरिक संबंध कायम था। इसके तहत पहाड़िया सरदारों को नजराना और व्यापारियों से चुंगी मिलती थी तथा बदले में वे सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते थे। यह व्यवस्था स्थानीय सामाजिक संतुलन का हिस्सा थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार ने इस संतुलन को तोड़ दिया। राजस्व वसूली, भू-बंदोबस्त और जमीन पर मालिकाना अधिकार की नई व्यवस्था ने आदिवासी समाज के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया। कंपनी ने जंगलों और पहाड़ी इलाकों को अपने प्रशासनिक तथा राजस्व नियंत्रण में लाने की कोशिश शुरू की। झूम खेती को रोककर स्थायी खेती को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई। जमींदार, साहूकार और महाजन इस नई व्यवस्था के सहयोगी बने। 1769-70 के अकाल ने पहले से मौजूद संकट को और गहरा कर दिया। जमीन, जंगल और जीविका पर बढ़ते दबाव ने टकराव को अपरिहार्य बना दिया।
कंपनी ने प्रतिरोध को दबाने के लिए केवल सैन्य शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया। उसने लालच, पुरस्कार और प्रशासनिक चालों का सहारा भी लिया। वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 में कप्तान रॉबर्ट ब्रुक के नेतृत्व में सैनिक बल गठित किया। राजमहल, खड़गपुर और भागलपुर को मिलाकर सैन्य प्रशासन मजबूत किया गया। पहाड़िया सरदारों को अंग्रेजी शिविरों में बुलाकर उपहार, नगद, अनाज और सम्मान दिया जाने लगा। उनसे अंग्रेजी हुकूमत के प्रति वफादारी के मुचलके भरवाए गए।
कंपनी ने पहाड़िया सरदारों के उत्तराधिकारियों को मान्यता देने और उनके क्षेत्रों में हाट लगाने जैसी सुविधाएं भी दीं। दूसरी ओर गैर-पहाड़िया लोगों को मैदानी क्षेत्रों में बसाने और कंपनी से जुड़े लोगों को ‘इनवैलिड जागीर’ के नाम पर जमीन देने की नीति अपनाई गई। इस तरह औपनिवेशिक सत्ता ने एक ओर प्रतिरोध को कुचलने और दूसरी ओर उसकी सामाजिक जमीन कमजोर करने की कोशिश की।
1779 में ऑगस्टस क्लीवलैंड को भागलपुर का मजिस्ट्रेट और कलेक्टर बनाकर भेजा गया। क्लीवलैंड ने पहाड़िया समाज को अपने प्रभाव में लेने के लिए पुरस्कार और सम्मान की नीति अपनाई। साथ ही उनकी युद्धक क्षमता का उपयोग अंग्रेजी सत्ता के हित में करने का प्रयास किया गया। इसी क्रम में हिल रेंजर्स जैसी अनियमित सैन्य व्यवस्था विकसित हुई। अंग्रेजों को उम्मीद थी कि पहाड़िया समाज के भीतर से ही ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कंपनी की सत्ता के विस्तार में मदद करेंगे। लेकिन पहाड़ों का भूगोल, छापामार युद्ध की परंपरा और अपनी जमीन के प्रति समुदाय की प्रतिबद्धता अंग्रेजों के लिए लगातार चुनौती बनी रही।
इसी पृष्ठभूमि में तिलका मांझी का उलगुलान सामने आता है। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता की उस बुनियादी नीति को चुनौती दी, जिसमें आदिवासी भूभाग को राजस्व और प्रशासन की वस्तु मान लिया गया था। तिलका मांझी के लिए संघर्ष केवल किसी अंग्रेज अधिकारी के खिलाफ लड़ाई नहीं था। यह उस व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध था, जो उनकी धरती, जंगल और आजीविका पर बाहरी अधिकार कायम करना चाहती थी।
उन्होंने अपने लोगों को संगठित किया। लोकस्मृति में शाल की छाल में गांठ बांधकर गांव-गांव संघर्ष का संदेश भेजने का उल्लेख मिलता है। उस समय संचार के सीमित साधनों के बीच यह समुदाय को एक सूत्र में जोड़ने का अपना तरीका था।
1780 से 1785 के बीच अंग्रेजी सत्ता पर लगातार हमले हुए। रामगढ़, भागलपुर और राजमहल क्षेत्र में अंग्रेजी ठिकानों और राजस्व व्यवस्था को चुनौती दी गई। मारगो दर्रा, तेलियागढ़ी और कहलगांव जैसे क्षेत्रों में अंग्रेजी खजानों को निशाना बनाए जाने की स्मृतियां मिलती हैं। लूटी गई सामग्री को आदिवासियों के बीच बांटने की बात भी लोकपरंपरा में आती है। अंग्रेजी सत्ता के साथ-साथ उसके सहयोगी जमींदारों, साहूकारों और महाजनों के खिलाफ भी प्रतिरोध जारी रहा।
तिलका मांझी ने पहाड़िया सरदारों और अन्य समुदायों को जोड़ने की कोशिश की। यही बात इस संघर्ष को महज एक स्थानीय बगावत से आगे ले जाती है। यह उस समय की सामुदायिक चेतना और औपनिवेशिक हस्तक्षेप के खिलाफ व्यापक असंतोष का प्रतीक बन गया।
तिलका मांझी के जीवन और पहचान को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। अनेक स्रोतों और लोकपरंपराओं में उन्हें जबरा पहाड़िया, जौराह पहाड़िया आदि नामों से भी जोड़ा गया है। पहाड़िया समाज में ‘मांझी’ ग्राम प्रधान के लिए प्रयुक्त होता था। तिलका मांझी की पहचान और उनके जीवन से जुड़े विभिन्न विवरणों ने इतिहासकारों और साहित्यकारों के बीच अलग-अलग व्याख्याओं को जन्म दिया है।
महाश्वेता देवी ने अपने साहित्य में तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह को स्थान दिया। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भी अपनी पुस्तक ‘तिलका मांझी’ में उनके व्यक्तित्व और संघर्ष को विस्तार से प्रस्तुत किया है। रतनलाल जोशी सहित अन्य लेखकों ने भी तिलका मांझी के जीवन और उलगुलान को अपनी पुस्तकों में दर्ज किया है। इस तरह इतिहास के दस्तावेजों के साथ साहित्य और लोकस्मृति ने भी तिलका मांझी की स्मृति को जीवित रखा है।
13 जनवरी 1784 को भागलपुर में अंग्रेजी प्रशासन और तिलका मांझी के संघर्ष का वह प्रसंग सामने आया, जो उनकी वीरगाथा का सबसे चर्चित हिस्सा है। लोकपरंपरा के अनुसार तिलका मांझी ने अपने तीर से कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड को घायल किया। क्लीवलैंड की मृत्यु और उसके बाद की घटनाओं को लेकर विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए इस प्रसंग को इतिहास और लोकस्मृति—दोनों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
फिर भी यह घटना अंग्रेजी प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती के प्रतीक के रूप में याद की जाती है। इसके बाद दमन और तेज हुआ। आदिवासी गांवों को निशाना बनाया गया और तिलका मांझी तथा उनके साथियों को पकड़ने के लिए सैन्य अभियान चलाए गए।
1784-85 में अंग्रेजी सेना ने पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक कार्रवाई की। फूट डालो और राज करो की नीति के तहत मुखबिरी और लालच का सहारा लिया गया। तिलका मांझी को पकड़ने के लिए उनके ठिकानों की घेराबंदी की गई। लोकस्मृति के अनुसार उन्होंने सुल्तानगंज की पहाड़ियों में शरण ली। अंग्रेजी सेना ने रसद और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
लोकपरंपरा में यह भी वर्णित है कि उन्हें घोड़ों से बांधकर भागलपुर तक घसीटते हुए लाया गया और 1785 में एक बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई। इस कथा को आज भी भागलपुर और आसपास के इलाके में तिलका मांझी की शहादत की स्मृति के रूप में याद किया जाता है। भागलपुर का तिलकामांझी क्षेत्र भी इसी ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक है।
तिलका मांझी की शहादत के साथ प्रतिरोध की मशाल बुझी नहीं। पहाड़िया समाज और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष जारी रहा। 1788 में वीरभूम में पहाड़िया आदिवासियों ने अंग्रेजी कचहरियों और कोठियों के साथ महाजनों, व्यापारियों और जमींदारों को निशाना बनाया। 1789 में बांकुड़ा क्षेत्र में जमींदारों के बाजारों और अनाज के गोदामों पर हमले हुए। यह प्रतिरोध 1791 तक कमजोर जरूर पड़ा, लेकिन उसकी चेतना समाप्त नहीं हुई।
आगे चलकर भूमिज, चेर, मुंडा, कोल और संथाल विद्रोहों ने औपनिवेशिक व्यवस्था को चुनौती दी। 1855 का संथाल हूल और 1895-1900 का बिरसा मुंडा आंदोलन इसी लंबी प्रतिरोध परंपरा के महत्वपूर्ण पड़ाव थे।
इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को केवल 1857 से शुरू करना अधूरा है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में उससे पहले ही औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ अनेक प्रतिरोध खड़े हो चुके थे। आदिवासी समाज के इन संघर्षों में राष्ट्रवाद की आधुनिक राजनीतिक शब्दावली भले नहीं थी, लेकिन स्वतंत्रता की मूल आकांक्षा स्पष्ट थी—अपनी जमीन पर अधिकार, अपने संसाधनों पर नियंत्रण और बाहरी सत्ता के हस्तक्षेप से मुक्ति।
तिलका मांझी इसी स्वाधीन चेतना के आरंभिक और सशक्त प्रतीक हैं।
उनकी लड़ाई में आज के लोकतांत्रिक भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण सवाल छिपा है। आजादी के बाद भी जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासी समाज के संघर्ष खत्म नहीं हुए। विकास की परियोजनाओं, विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार के सवाल लगातार सामने आते रहे हैं। प्रश्न वही है—विकास का निर्णय कौन करेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
लगभग ढाई सौ वर्ष पहले तिलका मांझी ने जिस सवाल को हथियार उठाकर सामने रखा था, वह आज भी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है।
स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। वह मनुष्य को अपने जीवन, अपनी गरिमा और अपने संसाधनों पर अधिकार देने की सतत प्रक्रिया भी है। तिलका मांझी की सबसे बड़ी विरासत इसी अर्थ में है। उन्होंने उस सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया, जो उनकी धरती और जीवन पर अपना अधिकार थोपना चाहती थी।
उनके संघर्ष की स्मृति बताती है कि भारत की आजादी की कहानी केवल राजधानियों, राजनीतिक नेताओं और बड़े आंदोलनों की कहानी नहीं है। इसमें जंगलों की पगडंडियां, पहाड़ों की आवाजें और उन समुदायों का प्रतिरोध भी शामिल है, जिन्होंने अपनी धरती को अपनी अस्मिता से अलग नहीं माना।
इस स्वतंत्रता दिवस पर तिलका मांझी को याद करना इसलिए जरूरी है कि हम आजादी के इतिहास को उसकी पूरी बहुधारा में देख सकें। शहरों के साथ जंगल भी इस इतिहास के साक्षी हैं, दस्तावेजों के साथ लोकगीत भी गवाही देते हैं और स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है।
तिलका मांझी की पहली पुकार इसी व्यापक स्वतंत्रता की पुकार थी—और इतिहास की लंबी यात्रा में वह पुकार आज भी अनसुनी नहीं हुई है।
कुमार कृष्णन