लेख

अयोध्या शाकद्वीपी राजाओं के पूर्वजों की जीवन यात्रा  

          आचार्य डा.राधे श्याम द्विवेदी 

वैसे अयोध्या के मुख्य राजवंश परिवार का इतिहास भगवान श्रीराम के पूर्वजों से जुड़ा माना जाता है। ऋषि कश्यप, सूर्य ,मनु, इच्छवाकु  ,रघु ,दशरथ और भगवान राम की वंश परम्परा को प्रायः हर कोई भारतवासी जनता है।

       अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं के पूर्वज मूल रूप से शाकद्वीप (ईरान/मध्य एशिया क्षेत्र) से आए थे, जो बाद में भारत के विभिन्न स्थानों में बस गए और अयोध्या में भी अपना राज्य स्थापित किए; इनके वंशज, जैसे कि राजा मान सिंह और राजा प्रताप नारायण सिंह ददुआ साहब गर्ग गोत्र के थे और उन्हें मुग़ल तथा ब्रिटिश शासकों से सम्मान व जागीरें मिलीं थीं, जिससे वे अयोध्या के महत्वपूर्ण शासक बने। और इनके पूर्वज राजा धृष्टकेतु से जुड़े बताए जाते हैं। 

      लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन की अनुमति से शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार भी यहां के राजा महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राजपरिवार का मूल स्रोत बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर – गोरखपुर, नन्दनगर – अमोढा -बस्ती, पलिया माफी – शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्याधाम से जुड़ा हुआ है। मुगलकाल , नवाबीकाल और ब्रिटिश शासन के दौरान यह राज परिवार अयोध्या के सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यों में हमेशा अग्रणी रहा। स्वतंत्रता के बाद जब रियासतें खत्म हुईं, तब भी यह परिवार सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए रखा है।

पूर्वज बिलासू गांव के निवासी :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण (मग ब्राह्मण) द्वापर युग में शाकद्वीप से भारत आए और उन्हें 18 ‘पुरों’ (ग्रामों) में बसे थे। इनमें से एक बिनसैयापुर (बिलासू) था। यह गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील का क्षेत्र है। जो गाजीपुर शहर के करीब ही स्थित है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे चेदि वंश के राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में ब्राह्मणों को दिए हुए थे। राजा धृष्टकेतु महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाकद्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है। इसी कारण अयोध्या के शाक वंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।

सदासुख पाठक प्रथम चौधरी:- 

19 वीं शताब्दी की शुरुआत में एक श्री सदासुख पाठक को दिल्ली के बादशाह द्वारा मझवारी के चौधरी के रूप में नियुक्त किया गया था। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी प्रदान किये थे और उनको चौधरी की उपाधि देकर सम्मानित किया था।  दिल्ली सल्तनत’ के द्वारा ‘चौधरी’ ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों , नवाबों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी” संस्कृत के ‘चतुर्धारी’ (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह उपाधि किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती रही है।

     शाकद्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

     मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक  गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालक को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे और यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।

नरहरपुर गोरखपुर भी पड़ाव :- 

महाराज मानसिंह के प्रपितामह संभवतः सदासुख पाठक अपना देश छोड़ कर गोरखपुर के जिले में बिडहल के पास नरहर गाँव में जाकर बस गए थे। यह ऐतिहासिक केंद्र,तहसील गोला गोरखपुर उ० प्र० के ग्राम पंचायत बरहज के राजस्व ग्राम नरहन मुस्तक़िल एवं चडीहार में  26°19′ उत्तरी अक्षांश एवं 83°24′ पूर्वी देशान्तर पर घाघरा नदी के बाएं तट पर स्थिति है। नरहर घाघरा नदी के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण  कालीन पुरातत्व स्थल है, जहाँ खुदाई में पांच स्तरीय संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। यह स्थल मुख्य रूप से कृषि-आधारित प्रारंभिक जीवन, विशिष्ट काले-लाल मिट्टी के बर्तनों और तांबे की वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है, जो दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में फला-फूला।उत्खनन से पाँच क्रमिक संस्कृतियों का पता चला है, जो लगभग 1300-1200 ईसा पूर्व (Period I) से लेकर 6ठी-7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक का प्रतिनिधित्व करती हैं । 1984-89 के बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग के प्रो० पुरुषोत्तम सिंह जी द्वारा नरहन में उत्खनन कराया गया था।उत्खनन में ताम्र पाषाणकाल 1300 ई० पु० से गुप्त काल तक की 5 संस्कृतिक कालो की जानकारी मिली है :-

1. नरहन संस्कृति (कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति) 

2. कृष्ण लोहित मृदभांड

3. उत्तरी काली चमकीली मृदभांड संस्कृति

4. शुंग-कुषाण कालीन संस्कृति

5. गुप्त कालीन संस्कृति

नरहन पुरातत्व में दो टीले थे जिसमें प्रथम टीले का दो तिहाई भाग घाघरा नदी ने बहा दिया था तथा एक तिहाई भाग में वर्तमान गांव है। इसका जमाव लगभग 1.6 मीटर है यह 1.6 मीटर जमाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अन्य कृष्ण लोहित मृदभांड संस्कृति का औसत जमाव केवल 30-50 सेमी मोटा है। नरहर एक प्राकृतिक छटा वाला गांव है और यहां एक नदी की घाटी और पुराना किला भी है । यह हिंदू गांव है और इसके निवासी बहुत ईमानदार और शक्तिशाली होते रहे हैं। 2011 ई .में यहां की आबादी 1560 थी। यह 72.52 हेक्टेयर में फैला है।

नन्दनगर आमोढा बस्ती भी पड़ाव:- 

शाकद्वीपीय  राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। जब बंगाल के नवाब मीरकासिम अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर लाया तो उसने उक्त ब्राह्मण प्रमुख को उनके जमींदारी को हटा दिया गया । संभवतः यह सदासुख पाठक  रहा होगा। सदासुख पाठक अपने पुत्र गोपाल राम के साथ बस्ती जिले के आमोढा की नंदनगर पोस्ट बलरामपुर में बस गए। नन्दनगर चौरी बाजार मसकनवा रोड पर स्थित है। यह मखौड़ा धाम से पश्चिम छपिया गोंडा की सीमा पर का गांव है।वर्तमान समय में यह बस्ती जिले केपरशुराम पुर ब्लाक में बस्ती से 55 किमी तथा परशुराम पुर से 8 किमी की पश्चिम दूरी पर नन्द नगर गांव स्थित है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।

अयोध्या का पलिया गाँव मुख्य केंद्र :- 

सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे।

‘ओरी’ को ‘ बख्तावर सिंह’ ‘राजा’ की पदवी, और पलिया- मेंहदौना की जागीर :- 

अयोध्या राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के’शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के एक वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक  की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और सौ सवारों का अफसर बनाया था। वर्तमान में इसे राजा का पलिया भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलियामाफी है जो तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में है। पास ही में शाहगंज बाजार है और महादौना के राजाओं द्वारा यहां विशाल हवेली जीर्ण – शीर्ण अवस्था में आज भी देखा जा सकता है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

      पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है. यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 – 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है।

2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

शाहगंज राजवंश का कोट और महल 

अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में ‘राजा का किला’ या ‘राजा की हवेली’ स्थानीय रूप से एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। यह खासकर राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह हैरिंग्टनगंज   विकास खंड में पड़ता है।  जो खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

        यह कोई बड़ा किला नहीं बल्कि एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है। 

      शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है , इस वंश की स्थापना राजा दर्शन पाठक जी द्वारा किया गया था जिसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 30 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज हवेली जोकि 70 बीघे में दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।

       शाहगंज हवेली की कनेक्टिवटी ठीक नहीं 

अयोध्या जिले के ग्राम्य अंचल में स्थित राजा शाहगंज की हवेली को जाने वाला मुख्य मार्ग कीचड़ो में तब्दील हो गया है आने जाने वाले लोगों को अच्छी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

मेहदौना खास एक रियासत थी:- 

यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्की पुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है ।

मेहदौना 

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या  के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण केन्द्र है। यह जिला मुख्यालय से 32 किमी पश्चिम में अवस्थित है ।