नन्ही-नन्ही आँख में,
सपनों का संसार।
टैब संग सीख रहा,
उज्ज्वल हो व्यवहार॥
मन लगाकर देखता,
नई-नई हर बात।
खेल-खेल में सीखता,
जीवन की सौगात॥
जिज्ञासा की रोशनी,
चमके उसके नैन।
ज्ञान-सुमन से महकता,
कोमल उसका चैन॥
उँगली रखकर स्क्रीन पर,
खोजे नई उड़ान।
नन्हा मन विज्ञान से,
रचता नव पहचान॥
माँ-बाबा का स्नेह ही,
सबसे बड़ा उपहार।
संस्कारों की छाँव में,
खिलता उसका प्यार॥
फोन-टैब साधन सभी,
इनका रखे विवेक।
खेल, किताबें, मित्र भी,
जीवन के आधार अनेक॥
हँसता-गाता बाल मन,
निर्मल जैसे धाम।
कल का भारत गढ़ रहा,
लेकर शुभ अविराम॥
नन्हे हाथों में छिपा,
उजले कल का मान।
सीख, सृजन, संस्कार से,
बढ़े देश की शान॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ