समाज सार्थक पहल

कंक्रीट के जंगलों में प्रकृति की वापसी का प्रयास “रिवाइल्डिंग”

विवेक रंजन श्रीवास्तव

इन दिनों लंदन में       

कंक्रीट, डामर और गगनचुंबी इमारतों के बीच सिमटते जा रहे हमारे आधुनिक शहरों में अक्सर पर्यावरण सुधार के नाम पर हम पार्कों और उद्यानों का निर्माण करते हैं। गमलों में सजे विदेशी पौधे और करीने से काटी गई हरी घास की मखमली चादरें देखने में तो बहुत आकर्षक लगती हैं लेकिन वे प्रकृति के उस वास्तविक, उन्मुक्त और धड़कते हुए स्वरूप का विकल्प कभी नहीं हो सकतीं जिसे हमारी पृथ्वी सदियों से जानती है।

यहीं से जन्म लेती है ‘री-वाइल्डिंग’ की अभिनव अवधारणा, जिसे बेहद सरल शब्दों में कहें तो इंसानी दखल से बेदम हो चुकी जमीन को वापस उसके अपने मूल, जंगली और स्वाभाविक स्वरूप में लौटने की आजादी देना है। यह केवल पारंपरिक रूप से कुछ पौधे रोप देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि प्रकृति को इस बात की पूरी छूट देना है कि वह अपना प्रबंधन, अपनी मरम्मत और अपना विस्तार खुद तय कर सके।

आज जब हमारे शहर कंक्रीट के बड़े-बड़े टापुओं में तब्दील हो चुके हैं, तब री-वाइल्डिंग हमारे प्राकृतिक जीवन को बचाने का एक बेहद संजीदा और व्यावहारिक रास्ता बनती दिख रही है। जब हम किसी क्षेत्र को री-वाइल्ड करते हैं, तो हम केवल पेड़ लगाने के साथ ही एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र या ईको-सिस्टम पुनर्जीवित कर रहे होते हैं।

वैश्विक पटल पर यदि दृष्टि डालें, तो इस अवधारणा ने कागजी बहसों से निकलकर जमीन पर चमत्कारी परिणाम दिखाए हैं। इसका सबसे अनुपम और ऐतिहासिक उदाहरण अमेरिका का ‘येलोस्टोन नेशनल पार्क’ (Yellowstone National Park)है। नब्बे के दशक में वहां पारिस्थितिकी संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था। वैज्ञानिकों ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए वहां ‘भेड़ियों’ (Grey Wolves) को वापस प्राकृतिक रूप से छोड़ा। इस एक री-वाइल्डिंग प्रयोग ने वहां की नदियों के बहाव से लेकर जंगलों के घनत्व और वन्यजीवों की पूरी खाद्य श्रृंखला को पुनर्जीवित कर दिया।

इसी तरह यूरोप के नीदरलैंड में ‘ओस्टवाडर्सप्लासेन’ (Oostvaardersplassen) रिजर्व का प्रयोग प्रकृति की स्वनिर्भरता का अनूठा उदाहरण है। इंसानों द्वारा छोड़े गए इस दलदली और बंजर भूभाग पर जब लाल हिरण और जंगली घोड़ों को उन्मुक्त विचरण के लिए छोड़ा गया, तो बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के वहां की वनस्पतियां और पक्षियों का संसार खुद ब खुद लौट आया। 

आज संपूर्ण यूरोप में ‘री-वाइल्डिंग यूरोप’ जैसी बड़ी संस्थाएं लुप्तप्राय प्रजातियों और बंजर भूमियों को उनका पुराना गौरव लौटाने में जुटी हैं।

यह बदलाव केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। हमारे अपने देश भारत में भी इसके अत्यंत सफल और प्रेरणादायी प्रयोग आकार ले चुके हैं। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले में स्थित शक्ति ‘सतपुड़ा टाइगर रिजर्व’ के भीतर से जब दर्जनों गांवों को उनके बेहतर पुनर्वास के साथ बाहर स्थानांतरित किया गया तो वह पूरी भूमि री-वाइल्डिंग का जीवंत उदाहरण बन गई। इंसानी दखल खत्म होते ही गांवों के पुराने खेतों ने प्राकृतिक घास के मैदानों का रूप ले लिया, जलस्रोत पुनर्जीवित हो गए और आज वहां बाघों और बारहसिंगों का कुनबा अपनी पूरी प्राकृतिक भव्यता के साथ फल-फूल रहा है।

इसी प्रकार दिल्ली जैसे महानगरीय कंक्रीट के जंगल के बीचोबीच यमुना नदी के किनारे विकसित किया गया ‘यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क’ (Yamuna Biodiversity Park) शहरी री-वाइल्डिंग का एक अद्भुत और अनुकरणीय मॉडल है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के अनथक प्रयासों से इस कभी बंजर और खारी रही जमीन पर आज दिल्ली की मूल स्थानीय वनस्पतियां लहलहा रही हैं, और प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट ने कंक्रीट के शोर को पीछे धकेल दिया है।

शहरों के भीतर खाली पड़ी जमीनों, पुरानी मिलों के खंडहरों या अनछुए कोनों में यदि स्थानीय प्रजातियों के पेड़ों, झाड़ियों और लताओं को बिना किसी इंसानी काट-छांट के पनपने दिया जाए तो प्रकृति वहां ऐसी ही चमत्कारी वापसी करती है। कुछ ही समय में वहां स्थानीय कीट-पतंगे, रंग-बिरंगी तितलियां, मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले सूक्ष्म जीव और बचपन की स्मृतियों में खो चुकीं गौरैया जैसे पक्षी अपने आप लौटने लगते हैं।

जापान के विख्यात वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी की इस पद्धति ने  दुनिया को यही सिखाया है कि बहुत कम जगह में भी स्थानीय पौधों की सघनता से एक आत्मनिर्भर और घना प्राकृतिक पर्यावरण कैसे खड़ा किया जा सकता है जो शहरों के फेफड़ों की तरह काम करे।

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे सुंदर और वैज्ञानिक पक्ष इसका पूरी तरह से आत्मनिर्भर होना है। आम बागवानी में हमें लगातार खाद, पानी, कीटनाशकों और इंसानी देखरेख की जरूरत होती है, जो अपने आप में एक कृत्रिम व्यवस्था है। री-वाइल्डिंग प्रकृति की अपनी बुद्धिमत्ता पर भरोसा करती है। स्थानीय पेड़-पौधे उस क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु के अनुकूल होते हैं, इसलिए उन्हें पनपने के लिए किसी बाहरी रसायन या अत्यधिक पानी की बैसाखी की जरूरत नहीं होती। वे खुद को मौसम के अनुसार ढालते हैं, अपनी पत्तों की खाद बनाते हैं और भूजल स्तर को सुधारने में मदद करते हैं।

वैश्विक स्तर पर हो रहे शोध बताते हैं कि ये छोटे-छोटे शहरी जंगल शहरों के बढ़ते तापमान को कम करने, दूषित हवा को सोखने और मूसलाधार बारिश के दौरान बाढ़ जैसी स्थितियों को रोकने में बड़े-बड़े कृत्रिम पार्कों की तुलना करें तो कई गुना अधिक सक्षम और असरदार साबित होते हैं।

वैचारिक दृष्टि से देखें तो री-वाइल्डिंग मनुष्य के उस अहंकार को भी एक चुनौती है जिसके तहत वह हर प्राकृतिक चीज को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। घास की एक-एक पत्ती को सलीके से काटने और पौधों को इंसानी पसंद के आकार में ढालने की जिद के बीच हम यह भूल जाते हैं कि असली सौंदर्य प्रकृति के खुलेपन और उसकी विविधता में है।

अपने महानगरीय जीवन में थोड़ा सा स्थान इस अनियंत्रित, उन्मुक्त प्रकृति को देकर हम पर्यावरण का संकट कम कर रहे हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया सौंपने की जमीन तैयार कर रहे हैं जहां वे किताबों से अलग, साक्षात प्रकृति को धड़कते और पनपते हुए देख सकें। यह प्रयास पृथ्वी को इंसानों की बनाई कंक्रीट की कैद से मुक्त कराकर उसे वापस उसकी अपनी मर्जी से जीने का अधिकार देने की एक बेहद मानवीय और संवेदनशील पहल है।