कस्तूरी दिनेश
देखिये हुजूर हम तो विपक्ष हैं तो हमारा एजेंडा विरोध ही होगा न…! अगर हम सत्ता-पक्ष का समर्थन करने लगे तो फिर गई पार्टी तेल लेने ! सत्ता पक्ष के प्रस्ताव का विरोध ही हमारे प्राणों का च्यवनप्राश है | अगर सत्ता-पक्ष कहे कि देश का विकास हो रहा है | हम अब हाईड्रोजन-ट्रेन चला रहे हैं तो हम कहेंगे काहे का विकास रे लंगूरे, गैस से ट्रेन चलाने में क्या बड़ी बात है ? हमारा राज आयेगा तो हम जींद से सोनीपत तक पानी से चला के दिखाएँगे ! वो कहेंगे—“सूरज पूरब से निकलता है |” तो हम कहेंगे, काहे को पूरब से निकलता है…? अरे काले कौंवों,हमको कुर्सी मिलने दो हम पश्चिम से निकालकर दिखाएँगे !
लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही विरोध है | पाकिस्तान से युद्ध में बांग्ला-देश बनाते समय अटल जी ने इंदिरा जी का समर्थन करके विपक्ष के विरोध के अधिकार का जो हनन किया, उसकी हम आज भी घोर निंदा करते हैं | ऎसी दरियादिली किस काम की ? विपक्ष होकर कोई सत्ता-पक्ष का समर्थन करेगा क्या ? विपक्ष को विपक्ष की तरह रहना चाहिए, यदि आप पक्ष के पाले में कूद गये तो गई भैंस ठंडे पानी में ! सत्ता–पक्ष सही काम कर रहा हो तो भी विपक्ष को चाहिए कि उसके विरोध में धरना-प्रदर्शन,सड़क-जाम,आगजनी- तोड़फोड़,आमरण-अनशन करे भले ही रात को अँधेरे में चुपके से पेट भर बिरियानी भकोसकर,गिलास दो गिलास संतरे का जूस गटकता रहे ! इस महान प्रक्रिया में कुछ लोग शहीद हो जाएँ,सार्वजनिक सम्पत्ति स्वाहा हो जाए तो कोई चिंता की बात नहीं ! लोकतंत्र में यह सब तो चलता ही रहता है !
दिल्ली का तख़्त हो कि प्रदेशों का,ये ऐसे ही थोड़ी मिलता है,विरोध का निरंतर हवन करना पड़ता है | इतना कि उसके धुएं से कुर्सी में आनन्द से पैर फैलाकर माल चेंपते सत्ता-पक्ष के ब्रह्म-भोजिओं की आँखों से कडुवाहट के मारे आंसू निकल आये! पुलिस के लाठी-डंडे की चिंता मत करो,जिसने पीठ पर आठ-दस लट्ठ नहीं खाए, वह क्या विपक्ष ! निरंतर तगड़ा विरोध ही अवरोध को हटाकर विपक्ष को सत्ता-सिंहासन तक पहुंचाता है!
कभी किसी विपक्ष को स्वीजरलैंड,इंगलैंड या अमेरिका में अपनी गर्ल-फ्रेंड के साथ पिकनिक मनाते हुए सत्ता-सिंहासन पर जम्प मारते देखा है क्या ? विपक्ष को विरोध के लिए मौक़ा तलाशना पड़ता है ! जहां जब भी मौक़ा दिखे तो उस मौके के सरकंडे और खर-पतवार भरे झील में आँख मूंदकर छलांग लगा देनी पड़ती है | किनारे बैठे रहने से कुछ नहीं मिलता ! कबीर दास जी ने विपक्ष को विरोध का महत्व बताते हुए सैकड़ों साल पहले ही कह दिया है न “जिन बूढ़न तिन पाईयां,गहरे पानी पैठि,मैं बपुरा बूढ़न डरा रहा किनारे बैठि …!” तो जमूरे,तुम सच्चे मन से बस विरोध करो,सही और गलत को भगवान पर छोड़ दो. यही कल्याण का मार्ग है !
कस्तूरी दिनेश