लेखक परिचय

आकाश कुमार राय

आकाश कुमार राय

उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर वाराणसी में जन्मा और वहीँ से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त की। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक किया। समसामयिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों के साथ खेल विषय पर लेखन। चंडीगढ़ और दिल्ली में ''हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी'' में चार वर्षों से अधिक समय तक बतौर संवाददाता कार्यरत रहा। कुछ वर्ष ईटीवी न्यूज चैनल जुड़कर काम करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की पत्रिका 'राष्ट्रीय छात्रशक्ति' में सह संपादक की भूमिका निभाई। फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर पत्रकारिता से जुड़े हैं... संपर्क न.: 9899108256

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वी आर ऑन नेशनल ड्यूटी… ये वो शब्द हैं जिसने भारतीय क्रिकेट के स्तर को नए आयाम तक पहुंचाने में महति भूमिका निभाई। एक समय भारतीय क्रिकेट के स्थायी स्तम्भ रहे त्रिमूर्ति (सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली) के बाद भारत में क्रिकेट के भविष्य को लेकर कोई कल्पना नहीं की जाती थी। मगर समय के बदलते चक्र में सौरव गांगुली टीम से बाहर हो गए और राहुल द्रविड़ ने कप्तानी छोड़ दी.. ऐसे में धोनी ने आगे बढ़कर जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठाया। फिर शुरू हुआ चुनौतियों से लड़ने के लिए लश्कर तैयार करने का काम। इसी बीच, कप्तान धोनी ने कड़े शब्दों में खेल के गौरवशाली व्यक्तित्व (सचिन-गांगुली-द्रविड़-लक्ष्मण) के इतर देश के लिए सेवा भाव को सर्वप्रथम बताया और युवाओं को मौका दिए जाने का पक्ष रखा। इस फैसले से जहां धोनी की आलोचना हुई, वहीं आज उस फैसले का अगला कदम भी सबके सामने है। ‘वी आर ऑन नेशनल ड्यूटी…’ वाले जुमले को फिर से बिना लोगों के सामने रखे, खुद में मंथन के बाद धोनी ने कप्तानी से इस्तीफा देने का फैसला किया। इस तरह जहां उन्होंने सीनियरों को किनारे लगाने के मामले पर आलोचकों को जवाब दिया, वहीं बताया कि उनकी सोच सिर्फ व्यक्ति या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि देश और खेल के प्रति सच्ची भावना से निहित है।

कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तानी के अपने कार्यकाल के दौरान सही समय पर सही निर्णय करने की क्षमता का अद्भुत उदाहरण भी पेश किया। सीमित ओवरों के खेल में कप्तानी से हटने का उनका फैसला एक बार फिर उनकी इसी विशेषता को दर्शाता है। इस तरह अचानक कप्तानी से रिटायर होने का फैसला लेकर विकेटकीपर/बल्लेबाज धोनी ने हर किसी को ‘स्टम्प’ कर दिया। धोनी का यह फैसला कुछ हद तक अंग्रेजी की एक कविता ‘इनविक्टस’ के शब्दों को बरबस ही याद दिलाता है। कविता के बोल थे.. ‘मैं अपने भाग्य का मालिक हूं, मैं अपनी आत्मा का कप्तान हूं..’ जो पूरी तरह से धोनी पर फिट बैठते हैं। भले ही कविता की उक्त पंक्तियों का औचित्य और भाव भारतीय क्रिकेट के यथास्थित से भिन्न हो, लेकिन कहीं न कहीं धोनी से जुड़ता जरूर है। हो सकता है धोनी ने जब कप्तानी से इस्तीफा देने का फैसला सार्वजनिक किया तो उनके मन में ऐसे भाव रहे हों।

भारतीय क्रिकेट के संस्मरण में सुनील गावस्कर के बाद यह दूसरा मौका है जब किसी क्रिकेटर ने इस तरह की शिष्टता और दूरदर्शिता का परिचय दिया हो। गावस्कर ने कप्तानी से हटने का फैसला 1985 में बेंसन एंड हेजेस विश्व चैंपियनशिप जीतने पर लिया था। गावस्कर ने चिन्नास्वामी स्टेडियम में 1987 में खेले अपने आखिरी मैच में 96 रन की जानदार पारी खेली थी। ये वो दौर था जब लोग उनसे और खेलने की उम्मीद कर रहे थे। ऐसा ही कुछ हाल वर्तमान में भी है जब लोग धोनी को मैदान पर नेतृत्वकर्ता के तौर पर देखना चाहते हैं। मगर अपने फैसले से धोनी ने सभी को चौंका दिया.. पर वह अब भी मैदान पर उतरेंगे और विकेट के पीछे कमाल करते दिखेंगे।

खिलाड़ियों को अमूमन यह कहते सुना जा सकता है कि वो रिकॉर्ड के लिए नहीं खेलते लेकिन कितने इस पर अमल करते हैं, यह बात किसी से छुपी नहीं है। मगर धोनी इस मामले में भी औरों से काफी अलग हैं और उन्होंने इसे साबित भी किया है। इंग्लैंड के खिलाफ 15 जनवरी (2017) को पुणे में होने वाला पहला वनडे मैच बतौर कप्तान उनका 200 वां मैच होता, लेकिन उन्होंने रिकॉर्ड दुरुस्त रखने पर ध्यान नहीं दिया। इसी तरह, टेस्ट क्रिकेट में सौवें टेस्ट का आंकड़ा छूने का ख्याल धोनी ने नहीं किया और दस मैच पहले ही कप्तानी छोड़ दी। अपने संन्यास का फैसला लेते समय धोनी यह बात जानते थे कि विराट कोहली पद संभालने के लिए तैयार हैं और फैसला लेना का यही सही समय है। महेंद्र सिंह धोनी ने टी-20 और वनडे की कप्तानी छोड़ कर फिर साबित किया कि वह एक ऐसे संजीदा खिलाड़ी हैं, जो अपने लिए नहीं देश के लिए खेलते हैं और टीम के हित में कोई भी फैसला कर सकते हैं। खेल हो या कोई भी क्षेत्र, असल लीडर वह है जो अपने से भी बेहतर नेतृत्वकर्ता को पहचान सके। धोनी समझ चुके हैं कि आने वाला समय उनका नहीं, विराट कोहली का है। वर्तमान समय में धोनी भारतीय क्रिकेट के बदलते स्वरूप और एक हद तक उसके जनतांत्रिकीकरण के प्रतीक हैं। कपिल देव में इसकी एक झलक मिली थी, लेकिन इसे मुकम्मल रूप धोनी ने ही दिया है।

माही की कप्तानी या फिर उनके सहज व्यक्तित्व का ही कमाल है कि भारतीय क्रिकेट एलीट दायरे से बाहर निकलकर आम जन का खेल बना। इसी तरह उन्होंने क्रिकेट को तकनीकी नफासत से बाहर निकाला और इसे जोश, जज्बे और मस्ती का खेल बना दिया। वे आक्रामक बल्लेबाज के तौर पर चुने गए और शुरुआती मैचों में ही असाधारण बल्लेबाजी कर लोगों का दिल जीत लिया। वर्ष 2007 में जब राहुल द्रविड़ ने कप्तानी छोड़ी और सचिन व सौरव जैसे दिग्गजों ने टी-20 का वर्ल्ड कप खेलने से इनकार कर दिया, तो धोनी को युवा ब्रिगेड की कमान सौंपी गई और उन्होंने इस निर्णय को सही साबित किया। टीम इंडिया रोमांचक फाइनल मैच में पाकिस्तान को हराकर टी-20 की पहली वर्ल्ड चैंपियन बनी। उसके बाद टीम ने कई और बड़े टूर्नामेंटों में जीत हासिल की। लेकिन 2011 का वर्ल्ड कप इस सिलसिले का चरम बिंदु था। टीम इंडिया ने धोनी के नेतृत्व में चमत्कारिक प्रदर्शन किया और विश्वविजेता बनी। धोनी का टीम इंडिया में चुना जाना और एक शानदार मुकाम पर पहुंचना समाज की एक परिघटना के रूप में याद किया जाएगा। मौजूदा समय में धोनी भारत के सबसे सफल स्पोर्ट्स ब्रांड हैं।

कैप्टन कूल धोनी के इस औचक फैसले को जहां बेहतर भविष्य की दिशा में सार्थक सोच के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, भारतीय टीम से एक बेहतरीन और जुझारू कप्तान छीनने के आरोपों के बीच कई सवाल भी खड़े हो गए हैं। मसलन, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त लोढ़ा समिति के सुझाए सुधारों को लागू नहीं करने के पर बीसीसीआइ अध्यक्ष पद से अनुराग ठाकुर के हटने के तुरंत बाद धोनी का फैसला कुछ और ही इशारा करता है। जबकि क्रिकेट जगत के दिग्गज माही के फैसले को 2019 विश्व कप के लिहाज से एक मजबूत टीम तैयार करने में नए कप्तान को अनुकूल अवसर मुहैया कराने से जोड़कर देख रहे हैं। खैर, इन सबके बावजूद धोनी की कप्तानी को भुलाना आसान नहीं है। उनके कार्यकाल में भारत ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों में ऊंचाइयों को छुआ है। विश्व कप के बाद टी-20 विश्व कप और चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को विजयी बनाने वाले एकमात्र कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का व्यक्तिगत करियर शानदार रहा है।

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