शख्सियत

महाराणा प्रताप :  स्वाभिमान और संघर्ष की जीवित प्रेरणा

अर्पित शर्मा

माई ऐडा पूत जण जैडा राणा प्रताप

अकबर सोतो उज के, जाण सिराणे साँप”

9 मई 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। भारत के इतिहास में अनेक वीर योद्धा हुए, मातृभूमि की रक्षा के लिए असंख्य लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए लेकिन महाराणा प्रताप में कुछ ऐसा विशेष था कि पाँच सौ वर्षों बाद भी वे केवल इतिहास की पुस्तक का एक पात्र नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस और राष्ट्रभक्ति की जीवित प्रेरणा के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

कहने को तो भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) के बाद की, लेकिन भारतीय इतिहास की पहचान और चेतना उससे बहुत पहले आकार ले चुकी थी। भारत ने गुप्तकाल का वह स्वर्णिम युग देखा था, जब ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य और संस्कृति अपने उत्कर्ष पर थे। उसी काल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया और उसने यहाँ की समृद्धि, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक वैभव का विस्तृत वर्णन किया। इसके बाद हूणों के आक्रमण हुए और धीरे-धीरे भारत विदेशी आक्रमणों तथा सत्ता संघर्षों के लंबे दौर में प्रवेश करता गया। महमूद गजनवी के आक्रमणों से लेकर मोहम्मद गौरी तक, और फिर ममलुक, खिलजी, तुगलक, सैय्यद तथा लोदी वंशों का शासन भारत के लगभग पाँच सौ वर्षों के संघर्ष, अस्थिरता और राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया। इतिहास में हमें महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध की कथा तो पढ़ाई जाती है। हमें बाबर, हुमायूँ, अकबर और जहाँगीर के बारे में भी विस्तार से बताया जाता है लेकिन क्या हम उतनी ही गंभीरता से राणा सांगा, उदयसिंह द्वितीय, राणा रायमल और राणा कुम्भा को जानते हैं? क्या हमें उनके संघर्ष, त्याग, राज्य व्यवस्था, संस्कृति संरक्षण और स्थापत्य कला के योगदान उतनी गहराई से बताए गए जितनी मुगल दरबारों की कहानियाँ, प्रेम प्रसंग और महलों की भव्यता?

एक युवा के रूप में आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास के उन अनछुए और उपेक्षित पक्षों को भी पढ़ें और समझें, जिन्हें समय के साथ सीमित रूप में प्रस्तुत किया गया या भुला दिया गया। महाराणा प्रताप इसलिए महान नहीं हैं कि उन्होंने केवल युद्ध लड़ा। वे इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष और स्वाभिमान का मार्ग चुना। “जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार जो इण धर्म रो पालन करे, वो हे मेवाड़ी सरदार।” यह वह समय था जब पानीपत के युद्धों में तोपों, गोलों और बारूद आधारित आधुनिक हथियारों का उपयोग हो रहा था जबकि भारत के अनेक पारंपरिक राजवंश अब भी तलवार, ढाल, भाले और हाथियों पर आधारित युद्ध पद्धति से संघर्ष कर रहे थे। लगभग पाँच से छह सौ वर्षों का वह कालखंड केवल सत्ता परिवर्तन का दौर नहीं था बल्कि अस्तित्व, स्वाभिमान और सभ्यता को बचाने का संघर्ष भी था। इसलिए उस समय के संघर्षों को केवल हार और जीत के आधार पर नहीं आँका जा सकता।

कई इतिहासकार महाराणा प्रताप को भारत के प्रारंभिक स्वाधीनता सेनानियों में मानते हैं। उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए साहस, नेतृत्व, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रेरक उदाहरण है। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने आत्मसमर्पण स्वीकार नहीं किया। जंगलों में रहना, अभाव में जीवन बिताना और निरंतर संघर्ष करना उन्होंने चुना, लेकिन अपने सम्मान और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। उन्होंने अपने लोगों और सेना को बाहरी सहायता पर निर्भर किए बिना संगठित रखने का प्रयास किया, इसलिए उनका जीवन आज के “आत्मनिर्भर भारत” के विचार से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने भील समुदाय के सहयोग से पहाड़ी क्षेत्रों में गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाई और बड़ी सेना के सामने संघर्ष जारी रखा। यह दर्शाता है कि सही रणनीति, स्थानीय सहयोग और दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।

महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं था बल्कि मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए था। उनकी सेना केवल राजपूतों तक सीमित नहीं थी; उसमें राणा पूंजा भील के नेतृत्व में भील योद्धा और हकीम खान सूरी के नेतृत्व में अफगान सैनिक भी शामिल थे। यह भारत की विविधता में एकता और समावेशी नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। युद्ध के समय भी उन्होंने नैतिक मूल्यों और महिलाओं के सम्मान को सर्वोपरि रखा। जब उनके पुत्र अमर सिंह प्रथम ने एक मुगल सेनापति के परिवार को बंदी बनाया, तब महाराणा प्रताप ने उन्हें सम्मानपूर्वक वापस भेजने का आदेश दिया। यह दर्शाता है कि उनके लिए युद्ध भी मर्यादा और नैतिकता से ऊपर नहीं था। दिवेर के युद्ध के बारे में जनश्रुतियों में प्रसिद्ध है कि उन्होंने मुगल सेनापति बहलोल खान और उसके घोड़े को एक ही वार में दो भागों में विभाजित कर दिया जबकि अमर सिंह के प्रहार से सुल्तान खान घोड़े सहित मारा गया। ये घटनाएँ उनके अदम्य साहस और युद्ध कौशल का प्रतीक मानी जाती हैं। हल्दीघाटी का युद्ध के बाद भी उन्होंने संघर्ष नहीं छोड़ा और गुरिल्ला युद्ध जारी रखते हुए मेवाड़ के बड़े हिस्से को पुनः प्राप्त किया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि असफलता अंत नहीं होती बल्कि नए संघर्ष और पुनर्निर्माण की शुरुआत होती है।


यह युवाओं को सिखाता है कि असफलता अंत नहीं होती बल्कि नए संघर्ष की शुरुआत होती है। आज जब युवा पीढ़ी त्वरित सफलता, सुविधाओं और भौतिक उपलब्धियों के दौर में जी रही है, तब महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सत्ता या संपत्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, त्याग, स्वाभिमान और संघर्ष से होता है। महाराणा प्रताप का जीवन केवल मेवाड़ का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उस भारत की चेतना है जिसने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सम्मान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना नहीं छोड़ा। इसीलिए वे केवल एक राजा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान के अमर प्रतीक हैं।

हुँ भूख़ मरुँ ,हुँ प्यास मरुँ, मेवाड धरा आजाद रहे
हुँ भोर उजाला मे भट्कुं ,पण मन मै माँ री याद रहे
हुँ रजपुतण रो जायो हुं , रजपुती करज चुकावुंला
ओ शीष पडै , पण पाग़ नही ,पीढी रो मान हुंकावूं ला

जय महाराणा प्रताप

अर्पित शर्मा