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शक्ति -पृथक्करण के सिद्धांत के जनक महर्षि मनु , भाग 18

आजकल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों के माध्यम से शासन चलाया जाता है। इन्हीं के माध्यम से विधि का निर्माण होता है,शासन की नीतियों और बनाये गये कानून को लागू किया जाता है तथा लोगों को न्याय दिया जाता है। विधायिका विधान बनाती है ,कार्यपालिका कानून को लागू करती है और न्यायपालिका कानून के अनुसार न्याय करती है। इसी को आजकल संवैधानिक शब्दावली में शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत कहते हैं।
भारत की बौद्धिक क्षमताओं को नीचा दिखाने के लिए शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का जनक फ्रांसीसी दार्शनिक मोंटेस्क्यू को दिखाया जाता है। इस फ्रांसीसी विद्वान ने 1748 में “द स्पिरिट ऑफ द लॉज” नामक पुस्तक लिखी। अपनी इसी पुस्तक में उसने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लेख किया। जिससे राजनीतिशास्त्रियों में उसकी दर्शनिकता का डंका बज गया। जिस प्रकार सारा विश्व उनकी दर्शनिकता के गीत गा रहा है, उसी प्रकार हम भारतवासी भी उसी के सामने नतमस्तक हैं और यह मान रहे हैं कि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का जनक मोंटस्क्यू ही है। इस प्रकार की भ्रामक मान्यता को स्वीकृति प्रदान कर हमने महर्षि मनु के साथ बहुत भारी अन्याय किया है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के जनक महर्षि मनु ही हैं।
जब अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त नहीं की जाती है और जब किसी देश के नागरिक अपनी शिक्षा व्यवस्था को उपेक्षा के दृष्टिकोण से देखने के अभ्यासी हो जाते हैं, जब लोग अपने ही पूर्वजों को अपशब्द बोलने लगते हैं, उनकी ओर से पीठ फेर कर खड़े हो जाते हैं, उनकी शिक्षाओं को मानने से इनकार कर देते हैं,उनके परिश्रम और पुरुषार्थ पर पानी फेर देते हैं और उनकी दी गई नैतिक व्यवस्था को मानने से इनकार कर देते हैं -तब इस प्रकार की स्थिति आ ही जाया करती है कि वे अपने पूर्वजों के द्वारा किए गए महान कार्यों से पर्दे में रह जाते हैं। वे नहीं समझ पाते कि हमसे पहले हमारे पूर्वजों ने किन-किन क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित किए थे और आज के परिवेश में हमें उनके कीर्तिमानों का किस प्रकार ऋणी होना चाहिए ? महर्षि मनु के साथ उपेक्षा का व्यवहार कर हमने बहुत बड़ा अन्याय विश्व के इस महामानव के साथ किया है।

महर्षि मनु की देन

आज जिस प्रकार हमें प्रशासनिक शब्दावली मिलती है और शासन प्रशासन के स्तर पर कार्य का विभाजन मिलता है उसकी सारी व्यवस्था महर्षि मनु की देन है। मुगल काल में भारत की प्रशासनिक शब्दावली को परिवर्तित कर अरबी और फारसी के शब्दों का प्रयोग आरंभ हुआ। अरबी ,फारसी के साथ-साथ कुछ भारतीय भाषाओं के शब्दों को लेकर एक नई भाषा का गठन काल्पनिक आधार पर किया गया, जिसे उर्दू या हिंदुस्तानी भाषा के नाम से मान्यता मिली। मुगलों ने एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत भारत को भाषाई स्तर पर मारने का प्रयास किया। उन्हीं का अनुकरण करते हुए कालांतर में अंग्रेजों ने भी इस व्यवस्था को इसी प्रकार जारी रखा। यह अलग बात है कि मुगलों के भाषाई अत्याचारों को उपेक्षित कर उन्हें भारत के प्रति बहुत अधिक समर्पित दिखाते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे लेखकों ने यह प्रयास किया है कि उन्होंने भारत को सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान की और एक समृद्ध भाषा हमको प्रदान की।

शिवाजी महाराज का अनुकरणीय कार्य

मुगलों की भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति इस प्रकार की सोच का सबसे तीखा और पहला विरोध छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया था। उन्होंने भारत और भारतीयता के प्रति समर्पित होकर कार्य किया। इसलिए मुगलों के द्वारा भारतीय भाषा संस्कृत पर जिस प्रकार का अत्याचार किया जा रहा था, उसके सामने सीना तानकर खड़े हो गए। मुगलों की नीति का विरोध करते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज ने संस्कृत की प्रशासनिक शब्दावली पर एक पुस्तक लिखवाई और अपने मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के नाम शुद्ध संस्कृत में रखने का सराहनीय कार्य किया। शिवाजी महाराज ने मनु महाराज की मनुस्मृति को पढ़ा था, इसलिए उन्होंने यह क्रांतिकारी निर्णय लिया।

महर्षि मनु का शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत

महर्षि मनु ने जिस राज्यसभा का उल्लेख किया है वह राज्य संचालन का कार्य करती थी। मनु महाराज ने सातवें अध्याय में हमें बताया है कि राज्य संचालन के लिए राजा के पास 7- 8 ( या आवश्यकता के अनुसार उससे अधिक भी ) मंत्री होने चाहिए। इन मंत्रियों की योग्यता उसी प्रकार की होगी जिस प्रकार की योग्यता का उल्लेख हम पूर्व में राजा या सभासदों के विषय में कर आए हैं। ( संबंधित श्लोक संख्या- अध्याय -7, 54 -57, 60-61)
सातवें अध्याय के श्लोक संख्या 120 और 121 में महर्षि मनु ने अवर सचिव/नगराधीश के बारे में बताया है। इन्हीं को आजकल हम महापौर या नगरपालिकाध्यक्ष आदि के नाम से पुकारते हैं। इसी अध्याय के श्लोक संख्या 62,63 और 68 में सहयोगी/अधिकारी एवं दूताधिकारी का उल्लेख किया गया है। श्लोक संख्या 81 में विभागों के अध्यक्ष के विषय में स्पष्ट किया गया है। सहस्रग्रामाधीश, शतग्रामाधीश बीसग्रामाधीश , दशग्रामाधीश , एकग्रामाधीश का भी उल्लेख इसी अध्याय में किया गया है। इस प्रकार की शब्दावली से स्पष्ट है कि जिला, जिले के अंतर्गत तहसील आदि की व्यवस्था उस समय भी थी। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होता था। इसके प्रधान को एक ग्रामाधीश कहा जाता था। इसी से मुखिया प्रमुख जैसे शब्दों का प्रचलन हुआ। जिन्हें गांव में लोग आज भी प्रयोग करते हैं।
मनु महाराज द्वारा प्रतिपादित इस प्रकार की व्यवस्था को देखकर निश्चय ही आनंद की अनुभूति होती है। पश्चिम के तथाकथित विचारकों ने इस विषय पर चाहे जितनी भी माथापच्ची की हो, परंतु वे महर्षि मनु से बढ़कर कोई आदर्श और सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं दे पाए। महर्षि मनु की इस व्यवस्था का अनुकरण उन्होंने अवश्य किया है और इसी प्रकार की व्यवस्था देकर अपने लिए तालियां बटोर ली हैं।
सातवें अध्याय के श्लोक संख्या 81, 120,122 और 125 में महर्षि मनु ने कर्मचारीगण का उल्लेख किया है। जिनके विषय में उन्होंने बताया है कि ये सभी एक प्रमुख मंत्री के अधीन होंगे और प्रत्येक प्रमुख मंत्री अपने-अपने विभागों तथा कर्मचारियों का निरीक्षण करता रहेगा। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसी दुष्प्रवृत्ति को प्रशासन में प्रवेश पाने से रोकने के लिए इस प्रकार का निरीक्षण आवश्यक होगा।
हम देखते हैं कि आज भी बड़े अधिकारी अथवा मंत्री अपने विभाग में इस प्रकार के निरीक्षण की कार्यवाही करते रहते हैं। यद्यपि आज की परिस्थितियों में भारी परिवर्तन आ गया है। अब तो इस प्रकार का निरीक्षणऔपचारिकता मात्र रह गया है । क्योंकि निरीक्षण की कार्यवाही में भी भ्रष्टाचार चलता है, परंतु जिस समय की हम बात कर रहे हैं उस समय ऐसा नहीं था। उस समय एक व्यवस्था दी जा रही थी, जिससे कि व्यवस्था व्यवस्था के रूप में चलती रहे। ध्यान रहे कि जब हम कोई भवन बनाते हैं और उसे सजा कर तैयार करते हैं तो उसकी चमक अलग होती है, परंतु धीरे-धीरे जब वह भवन पुराना पड़ता है तो चाहे उस पर और भी सुंदर रंग करने का प्रयास कर लें , परंतु वह चमक नहीं आती जो उसके प्रारंभिक चरण में थी। यही हमारे शरीर के रूप सौंदर्य का हाल है जो सुंदरता बचपन और यौवन में होती है, वह बुढ़ापे में नहीं होती। बुढ़ापा सुंदरता और रूप दोनों का ही हरण कर लेता है। यही बात किसी व्यवस्था , तन्त्र या सरकार पर भी लागू होती है। मनु की व्यवस्था की चमक आज की व्यवस्था में दिखाई नहीं देती, क्योंकि यह मनु की व्यवस्था की टूटी-फूटी अवस्था है।

ब्रह्मसभा या न्यायसभा

ब्रह्म सभा अथवा न्याय सभा के बारे में महर्षि मनु ने अध्याय 8 के श्लोक संख्या 1,11 और 26 में प्रावधान किया है। इसमें राज्य का एक मुख्य न्यायाधीश होना बताया गया है अर्थात महर्षि मनु के धर्मशास्त्र की इन धाराओं में देश के सर्वोच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बारे में स्पष्ट उल्लेख किया गया है। देश के मुख्य न्यायाधीश को राजा का अधिकृत विद्वान भी कहा जाता था।’ ब्रह्मसभा’ शब्द से ही स्पष्ट हो जाता है कि इस सभा का सभाधीश बहुत ही विद्वान व्यक्ति होता था। ब्रह्म के समान जिसका चिंतन हो और ब्रह्म के समान जो न्याय करने में पारंगत हो, उसी व्यक्ति को ब्रह्म सभा का न्यायाधीश होने का अधिकार प्राप्त होता था।
इसी प्रकार वेदविद्याओं के ज्ञाता तीन विद्वान् (मुकद्दमों के अनुसार उस-उस विषय के परामर्शदाता ( अध्याय 8 श्लोक संख्या 1, आवश्यकता के अनुसार ) की नियुक्ति का भी विधान किया गया है। इस प्रकार न्यायिक प्रशासन न्याय के लिए ही काम करता हुआ दिखाई देता था। इसमें किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होता था । विद्वान और न्याय के प्रति आस्थावान लोगों को ही न्याय करने का अधिकार दिया जाता था। इसका उद्देश्य होता था- धर्मशास्त्र के अनुसार निर्णय देना अर्थात प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्णतया पालन करना। जो जिसका है उसे उसी को दे देना और जो अनाधिकार चेष्टा कर रहा है उसे अनाधिकार चेष्टा से रोक देना ही प्राकृतिक न्याय है। इसका उद्देश्य होता है – सत्य की पूरी समीक्षा करना और सत्य के अनुकूल ही न्याय प्रदान करना।

धर्मनिर्णय सभा या विधानपरिषद्

किन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर धर्म संशय उत्पन्न हो गया है अर्थात ऐसी जटिल स्थिति पैदा हो गई है कि यदि निर्णय इस पक्ष में दिया जाए तो कहीं न्याय और धर्म का उल्लंघन तो नहीं हो जाएगा अथवा निर्णय दूसरे पक्ष में दिया जाए तो कहीं न्याय और धर्म की प्रतिकूलता तो आड़े नहीं आ जाएगी ? – ऐसी जटिल स्थिति को सुलझाने के लिए धर्म निर्णय सभा या विधान परिषद का गठन किया जाता था।
जिसमें एक से बढ़कर एक वैदिक विद्वान स्थान पाता था। इसमें भी कहीं किसी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं था, कहीं किसी प्रकार की कोई जाति-व्यवस्था नहीं थी। कहीं किसी प्रकार से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति, ओबीसी वर्ग, पिछड़ा वर्ग आदि का झगड़ा भी नहीं था। धर्मनिर्णय सभा के वैदिक विद्वानों पर समाज के प्रत्येक वर्ण का विश्वास होता था । वह जो भी निर्णय देते थे ,उसे सभी सहर्ष अपनी सहमति प्रदान करते थे। भारत के प्राचीन साहित्य में कहीं एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जहां किसी व्यक्ति ने इस प्रकार की धर्म निर्णय सभा का विरोध किया हो या इसके अन्याय का कहीं वर्णन किया हो ? इसका तात्पर्य है कि धर्म निर्णय सभा सही ढंग से अपना कार्य करती रही थी। इस सभा के निर्माण के लिए महर्षि मनु ने अध्याय 12 में श्लोक संख्या 108, 110 और 112 का विधान किया है।

(क) दश सदस्यों की परिषद् व उसके सदस्य

महर्षि मनु के समय में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, ओबीसी वर्ग, पिछड़ा वर्ग आदि का झगड़ा भी नहीं था। धर्मनिर्णय सभा के वैदिक विद्वानों पर समाज के प्रत्येक वर्ण का विश्वास होता था । वह जो भी निर्णय देते थे ,उसे सभी सहर्ष अपनी सहमति प्रदान करते थे। इस सभा के निर्माण के लिए महर्षि मनु ने अध्याय 12 में श्लोक संख्या 108, 110 और 112 का विधान किया है। इसी सभा के अधीन एक अन्य सभा भी होती थी , जिसे 10 सदस्यों की परिषद कहा जाता था।
दश सदस्यों की इस परिषद् का गठन भी वैदिक विद्वानों के माध्यम से होता था। जिसमें एक ऋकविद्या का ज्ञाता, ( अध्याय 12 का श्लोक संख्या 111 ) एक यजुर्विद्या का ज्ञाता ,एक सामविद्या का ज्ञाता, एक कारण-अकारण का ज्ञाता विद्वान्-हेतुक, एक निरुक्त शास्त्र का ज्ञाता, एक धर्मशास्त्र का ज्ञाता ,एक ब्रह्मचर्याश्रम का प्रतिनिधि विद्वान्,
एक गृहस्थाश्रम का प्रतिनिधि विद्वान् , एक वानप्रस्थ आश्रम का प्रतिनिधि विद्वान् , एक न्यायशास्त्र का ज्ञाता, तर्क करने वाला विद्वान् स्थान प्राप्त करता था।
महर्षि मनु की इस व्यवस्था पर विचार कीजिए- इसकी उत्कृष्टता पर विचार कीजिए और इसकी पवित्रता पर भी विचार कीजिए। आज हमारे देश में अधिकांश जनप्रतिनिधि और मंत्री ऐसे होते हैं जो विद्वान नहीं होते। न्यायालय में जाकर न्यायाधीश के पद पर बैठने वाले लोग भी वेदों के ज्ञाता नहीं होते, न्याय शास्त्र के ज्ञाता नहीं होते, धर्म की परिभाषा तक नहीं जानते। अपने विषय अथवा मंत्रालय के विशेषज्ञ नहीं होते। अधिकांश मंत्री ऐसे होते हैं जो अपने विभाग के बारे में भी तात्विक जानकारी नहीं रखते। इसीलिए वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों या कर्मचारियों पर निर्भर रहते हैं। परंपरा तो यही होनी चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधि और मंत्री या मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री विद्वान होने चाहिए, परंतु उनकी नियुक्ति के लिए वैदिक विद्वान होने की कोई अनिवार्यता हमारे देश के संविधान में नहीं मानी गई है, इसलिए कई बार मूर्ख लोग भी मंत्री या और कोई बड़ा पद प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। विद्वान लोगों की सूक्ष्म बुद्धि जिस प्रकार अपने पद के साथ न्याय कर सकती है, उतना न्याय कम बुद्धि वाले व्यक्ति की बुद्धि अपने पद के साथ नहीं कर सकती। इसीलिए महर्षि मनु ने बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता को महत्व दिया है।

तीन सदस्यों की परिषद्

इस परिषद के लिए भी महर्षि मनु ने विशेष विधान करते हुए लिखा है कि इसमें एक ऋकविद्या का ज्ञाता ,( अध्याय 12 ,श्लोक संख्या 112 ) एक यजुर्विद्या का ज्ञाता, एक सामविद्या का ज्ञाता होना चाहिए। वैदिक ऋषियों की मान्यता है कि ज्ञान ,कर्म और उपासना – ये तीन प्रकार का ज्ञान होता है। ज्ञान, कर्म और उपासना के प्रतीक तीनों विद्वान जब किसी भी कार्य की समीक्षा करेंगे, या किसी भी विषय पर अपना परामर्श देंगे तो उनसे किसी भी प्रकार की चूक की कोई संभावना नहीं होगी। इसके विपरीत उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह जो कुछ भी करेंगे वह न्याय संगत ही होगा।

स्वामी दयानंद जी का मत

स्वामी दयानंद जी महाराज मनु द्वारा प्रतिपादित शक्ति पृथक्करण के इस सिद्धांत पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं ” क्योंकि विशेष सहाय के बिना जो सुगम कर्म है वह भी एक के करने में कठिन हो जाता है। जब ऐसा है तो महान राज्य कर्म एक से कैसे हो सकता है ? इसलिए एक को राजा और एक की बुद्धि पर राज्य के कार्य को निर्भर रखना बहुत ही बुरा काम है।” ( सत्यार्थ प्रकाश 146 )
स्पष्ट है कि जिन-जिन देशों में जिन-जिन कालों में सारी शक्तियों का केंद्र एक हाथों में रहा है, तब-तब वहां पर सृष्टि नियमों और महर्षि मनु की व्यवस्था के विरुद्ध कार्य हुआ है।
संसार में जितने भर भी मुस्लिम बादशाह हुए हैं ,उनमें से अधिकांश ऐसे रहे हैं जिन्हें न्यायशास्त्र का कोई प्रारंभिक ज्ञान भी नहीं था। इसी प्रकार क्रिश्चियन बादशाहों का भी हाल रहा है। जब इस प्रकार की व्यवस्था को तोड़कर शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को लागू किया गया तो उस समय के लिए हमको मानना चाहिए कि तब हमने महर्षि मनु के सिद्धांत को ही लागू किया था।
मुस्लिम और क्रिश्चियन सम्राट या बादशाह यदि संसार पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए रक्तपात करते रहे तो यह प्राचीन भारतीय सम्राटों की वह परंपरा थी, जिसमें वह संपूर्ण भूमंडल पर अपना साम्राज्य चक्रवर्ती सम्राट बनकर स्थापित किया करते थे। परंतु उनका चिंतन जहां पूर्णतया सात्विक होता था, वहीं मुस्लिम और क्रिश्चियन सम्राटों या बादशाहों का चिंतन पूर्णतया तामसिक होता था । जिसमें रक्तपात के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था।

वर्तमान विद्वानों का मत

वर्तमान शासन प्रणाली के विषय में विद्वानों का मत है कि लोकतंत्र शासन प्रणाली प्रायः ( शासन ) क्षमता से शून्य होती है। प्रसिद्ध लेखक ट्रीटस्के ने एक आलंकारिक चित्र का उल्लेख किया है । जिसमें कि लोकतंत्र शासन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो चीखती चिल्लाती भीड़ से घिरा हुआ है। जब राज्यशक्ति अशिक्षित और गैर जिम्मेदार लोगों के हाथ में दे दी जाती है तो उसमें क्षमता आ ही कैसे सकती है ? जैसे एक कुशल गडरिया सैकड़ों भेड़ों को अपनी इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही लोकतंत्र राज्यों में कतिपय राजनीतिक नेता जनता को अपनी इच्छानुसार हांकने में सफल हो जाते हैं। सांसद तथा राज्यों की विधानसभाओं के लिए जो सदस्य निर्वाचित होते हैं वे न केवल अयोग्य होते हैं अपितु जिन लोगों के हाथों में शासन की बागडोर होती है, वह भी अपना काम भलीभांति नहीं कर सकते। उन्हें सदा भय बना रहता है कि राजनीतिक नेता उनकी किसी बात से असंतुष्ट न हो जाएं।”
उपरोक्त शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत की समीक्षा करने पर पता चलता है कि प्रत्येक ऐसा अधिकारी जो निचले स्तर पर नियुक्त होता था, वह अपने से ऊपर के अधिकारी या शासन के व्यक्ति को प्रतिदिन के समाचार प्रेषित करता था। जिससे शीघ्रातिशीघ्र उपरोक्त समाचार राजा तक पहुंच जाते थे।

आज के सूचना विभाग के जनक- महर्षि मनु

आज के डाक विभाग का शुभारंभ महर्षि मनु के समय से ही हुआ। इसे समझने के लिए उस समय के सूचना तंत्र को समझने की आवश्यकता है। प्रशासनिक लोग नीचे से ऊपर तक यथाशीघ्र समाचार प्रेषित करने में कुशल होते थे। इसके लिए घोड़े आदि का प्रयोग किया जाता था। यदि किसी प्रकार का हमला कहीं से होता था या देश विरोधी शक्तियां कहीं पर उपद्रव कर रही होती थीं तो उनकी सूचना भी बहुत शीघ्रता से राजा तक पहुंच जाती थी। इसलिए इस प्रकार की भ्रांति पाल लेना कि आज का डाक विभाग या सूचना तंत्र किसी मुस्लिम शासक या अंग्रेजी शासन की देन है, हमारी अज्ञानता का परिचायक है।
मनु महाराज जी की व्यवस्था के अंतर्गत देश की राजधानी को केंद्रीय कार्यालय कहा जाता था, कभी-कभी इसे राजा का किला भी बोलते थे। प्रत्येक नगर में एक सचिवालय की स्थापना की जाती थी जिसे आजकल नगर पालिका कार्यालय कहा जाता है। 1000 गांवों पर सहस्राधीश का कार्यालय -सौ गांवों पर एक शताधीश का कार्यालय, बीस गांवों पर एक विंशति-अधीश का कार्यालय, दश गांवों पर एक दशाधीश का कार्यालय, पांच गांवों पर एक पंचाधीश का कार्यालय,दो और तीन गांवों पर एक मुखिया का कार्यालय , गांव पर गांव के मुखिया का कार्यालय होता था। मनुस्मृति के सातवें अध्याय के श्लोक संख्या 115- 117 में यह व्यवस्था की गई है कि इन राज्य कार्यालयों के प्रभारी अपने से ऊपर के राज्य कार्यालय को प्रतिदिन की गतिविधियों से सूचित करें। इन सारी सूचनाओं को जिस संबंधित मंत्री के पास भेजा जाता था, वह इन पर बहुत ध्यानपूर्वक चिंतन करता था । आलस्यरहित होकर इन पर मनन करता था और साथ ही यथोचित समाधान भी देता था।

राजा का प्रतिनिधि कौन हो सकता था ?

यदि राजा रुग्ण – अवस्था में है या किसी भी कारण से अशक्त हो गया है तो ऐसी स्थिति में उसके स्थान पर कार्य करने की शक्ति किसकी होगी ? वर्तमान संविधान में देश के राष्ट्रपति के लिए स्पष्ट किया गया है कि यदि राष्ट्रपति ने पद त्याग कर दिया है या किसी कारण से उसे देश से बाहर जाना पड़ गया है या उस पर महाभियोग आ गया है या किसी दूसरे कारण से वह अपने पदीय दायित्वों का निर्वाह करने में सक्षम नहीं है तो ऐसी स्थिति में देश के उपराष्ट्रपति को उसका कार्यभार तात्कालिक आधार पर सौंप दिया जाता है और यदि किन्हीं कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नहीं है तो देश के सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वाह करेगा।
यदि ध्यान से देखा जाए तो भारत सहित किसी भी देश के संविधान में की गई ऐसी व्यवस्था के लिए भी हमें महर्षि मनु के आदि संविधान का ऋणी होना पड़ेगा। जहां पर राजधर्म संबंधी व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजा के कार्यों की देखभाल करने में रुग्णता आदि के कारण अशक्त होने पर उसे अपने आसन पर न्यायकारी धर्मज्ञ तथा बुद्धिमान जितेंद्रिय ,कुलीन सबसे प्रधान अमात्य अर्थात मंत्री को बिठा देवे अर्थात रुग्णावस्था में प्रधान अमात्य को अपने स्थान पर राज्य कार्य संपादन के लिए नियुक्त करे।
हम देखते हैं कि यदि हमारे देश का प्रधानमंत्री राजधानी से बाहर है या देश से भी बाहर है और उनकी अनुपस्थिति में मंत्रिमंडल की बैठक आहूत करनी पड़ जाए तो उस बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठतम कैबिनेट मंत्री ही करता है। यह व्यवस्था हमें मनु महाराज द्वारा ही प्रदत्त की गई है।
राजा होकर न्याय करे, न्यायाधीश होकर भी न्याय करे और पंच या मध्यस्थ होकर भी न्याय करे, पिता होकर भी न्याय करे, गुरु होकर भी न्याय करे, घर का वरिष्ठ सदस्य होकर कनिष्ठ सदस्यों के साथ न्याय करे, बड़ा भाई होकर छोटे भाई के साथ न्याय करे – ये सारी की सारी व्यवस्थाएं हमको मनु महाराज की देन हैं। ये सारी परंपराएं किसी न किसी रूप में आज तक भी जीवित हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि मनु के संविधान ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में कितना महत्वपूर्ण योगदान दिया है ? राजनीति का जो भी शुभ लक्षण या शुभ पक्ष हमें आज भी यथावत धर्मानुकूल कार्य करता हुआ दिखाई देता है या कहिए कि राजनीति में जितनी भी धर्मानुकूल व्यवस्थाएं और परंपराएं हैं, वे सब भी मनुस्मृति की ही देन हैं । उससे अलग कोई व्यवस्था हो ही नहीं सकती।

मनु की विदेश नीति

मनु महाराज ने विदेश नीति के संदर्भ में भी बहुत सुंदर व्यवस्था की है। उनका कहना है कि ” अपने राज्य के समीपवर्ती राजा को और शत्रु राजा की सेवा सहायता करने वाले राजा को शत्रु ही समझना चाहिए। शत्रु से भिन्न अर्थात शत्रु से विपरीत आचरण करने वाले अर्थात सेवा सहायता करने वाले राजा को और शत्रु राजा की सीमा से लगे अगले राजा को मित्र और इन दोनों से भिन्न प्रवृत्ति वाले राजा को जो न सहायता करे न विरोध करे, उसे उदासीन अर्थात ( अर्थात तटस्थ= न्यूट्रल ) राजा समझना चाहिए।”
मनु के इस सिद्धांत को आज के राजनीतिशास्त्री यथावत मानते हैं। हम सभी लोग व्यवहार की भाषा में भी कहते हैं कि शत्रु का शत्रु अपना मित्र होता है। अब तनिक विचार कीजिए कि यह सिद्धांत कब से चला आ रहा है ? इस संबंध में हमने अपनी पुस्तक ” मनु और भारत की राज्यव्यवस्था ” के अध्याय 16 में ‘ मनु की विदेश नीति ‘ शीर्षक के अंतर्गत विस्तार से चर्चा की है। इस संबंध में वहां से आप अधिक जानकारी ले सकते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य