लेखक- पवन शुक्ला
मन की बात का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत जैसे विशाल,विविध और जीवंत लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच की दूरी को पाटना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है।आज़ादी के बाद से ही सरकारों और नागरिकों के बीच संवाद के पारंपरिक माध्यम या तो नौकरशाही से बंधे थे या फिर राजनीतिक भाषणों तक सीमित थे।इस संवादहीनता के घेरे को तोड़ने और देश के आम जनमानस से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए 3 अक्टूबर 2014 (विजयादशमी के पावन अवसर पर) एक ऐसी अनूठी पहल की शुरुआत हुई, जिसने भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। यह पहल थी देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का मासिक रेडियो कार्यक्रम—’मन की बात’।
चूंकि आधुनिक युग में टेलीविजन और सोशल मीडिया का बोलबाला था,ऐसे समय में रेडियो को संवाद का माध्यम चुनना अपने आप में एक साहसिक और दूरदर्शी कदम था। प्रधानमंत्री मोदी ने यह समझा कि रेडियो आज भी भारत के सबसे दूर-दराज के गांवों, ढाणियों और हर वर्ग के लोगों तक पहुंचने का सबसे प्रभावी और सशक्त जरिया है। ‘मन की बात’ केवल एक सरकारी प्रसारण या भाषण नहीं है,बल्कि यह एक ऐसा मंच है जहां भारत की आत्मा बसती है, जहां देश के कोने-कोने से आम नागरिकों की सफलता की कहानियां गूंजती हैं।
एकतरफा संवाद से इतर जन-भागीदारी की अनूठी संस्कृति
’मन की बात’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एकतरफा प्रवचन या मन की बात थोपने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह देशवासियों के विचारों,सुझावों और सपनों का एक खुला आसमान है। हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम से पहले देश भर के नागरिक माईगव (MyGov) ऐप,नमो ऐप,टोल-फ्री नंबर और पत्रों के माध्यम से अपने विचार,सुझाव और समस्याएं प्रधानमंत्री तक पहुंचाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी इनमें से चुनिंदा संदेशों और विचारों को अपने संबोधन में शामिल करते हैं। इस प्रक्रिया ने भारत के आम नागरिक को यह अहसास कराया कि देश की नीति और संस्कृति के निर्माण में उनकी आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी बड़े राजनेता या विशेषज्ञ की। यह कार्यक्रम जनता और सरकार के बीच एक सेतु का काम करता है,जहां हर व्यक्ति खुद को प्रधानमंत्री के सीधे संपर्क में पाता है।जब देश का प्रधानमंत्री किसी सुदूर गांव के एक साधारण किसान, एक छोटे कारीगर या एक युवा उद्यमी का नाम लेकर उसकी सराहना करता है, तो वह केवल उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सम्मान होता है।
गुमनाम नायकों और ‘जन-आन्दोलनों’ का मंच
भारतीय समाज में अनगिनत ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ, प्रसिद्धि की चाह या राजकीय सम्मान के समाज सेवा, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा या कला के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले इन ‘गुमनाम नायकों’ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का ऐतिहासिक कार्य ‘मन की बात’ ने किया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच के माध्यम से देश के उन कोने-कोने के हीरों को सामने लाया, जिन्होंने अपनी मेहनत से समाज की तस्वीर बदल दी। चाहे वह केरल के एक बुजुर्ग हों जो अपनी पेंशन के पैसों से पौधे लगाते हैं, या कोई आदिवासी महिला जो अपने गांव में पारंपरिक शिल्प को पुनर्जीवित कर रही है, ‘मन की बात’ ने इन्हें देश का प्रेरणास्त्रोत बना दिया।
इसके साथ ही,इस कार्यक्रम ने कई बड़े अभियानों को ‘जन-आंदोलन’ का रूप दिया है। उदाहरण के लिए, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान को जमीनी स्तर पर पहुंचाने में इस कार्यक्रम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अलावा, स्वच्छता ही सेवा का संकल्प, सिंगल-प्लास्टिक का त्याग, खादी का समर्थन,और वोकल फॉर लोकल (Vocal for Local) जैसे विषयों को घर-घर तक पहुंचाने का कार्य इसी मंच से किया गया, जिससे जनता ने इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया।
युवा पीढ़ी,खेल और शिक्षा से जुड़ाव
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है,और प्रधानमंत्री मोदी भली-भांति जानते हैं कि देश का भविष्य युवाओं की ऊर्जा और दिशा पर निर्भर करता है। ‘मन की बात’ में युवाओं से जुड़े मुद्दों पर खुलकर चर्चा होती है। बोर्ड परीक्षाओं के तनाव से जूझ रहे छात्रों के लिए प्रधानमंत्री का ‘परीक्षा पे चर्चा’ का विचार और उनके साथ संवाद इसी कार्यक्रम की देन है, जिसने लाखों छात्रों और अभिभावकों का मार्गदर्शन किया है।
खेल और खिलाड़ियों के प्रति देश के दृष्टिकोण को बदलने में भी इस कार्यक्रम ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार खेलो इंडिया जैसे अभियानों और ओलंपिक, पैरालंपिक या अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले खिलाड़ियों के संघर्षों और सफलताओं का उल्लेख किया है। जब देश का सर्वोच्च नेता किसी खिलाड़ी की पीठ थपथपाता है, तो न केवल उस खिलाड़ी का मनोबल बढ़ता है, बल्कि देश के करोड़ों युवा खेलों को करियर और राष्ट्र-गौरव के रूप में देखने के लिए प्रेरित होते हैं।
सांस्कृतिक धरोहर, इतिहास और राष्ट्रभक्ति का पुनर्जागरण
आधुनिकता की दौड़ में कई बार समाज अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को पीछे छोड़ने लगता है। ‘मन की बात’ ने भारत की प्राचीन संस्कृति, गौरवशाली इतिहास,लोक कलाओं और पारंपरिक ज्ञान को पुनर्जीवित करने का एक सशक्त माध्यम प्रदान किया है। प्रधानमंत्री मोदी इस कार्यक्रम के माध्यम से देश के उन महान स्वतंत्रता सेनानियों और वीर योद्धाओं को याद करते हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों में उचित स्थान नहीं मिल पाया था।
चाहे वह भारतीय त्योहारों का वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व हो, हमारे प्राचीन ग्रंथों की प्रासंगिकता हो,या भारत के विभिन्न राज्यों की लोक-संस्कृति और खान-पान हो—इन सभी विषयों पर प्रधानमंत्री की अनूठी शैली में चर्चा होती है।’एक भारत,श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने में इस कार्यक्रम का बहुत बड़ा योगदान है, क्योंकि यह देशवासियों को एक-दूसरे की संस्कृति,भाषा और परंपराओं से परिचित कराता है।जब कोई उत्तर भारत का व्यक्ति दक्षिण की किसी परंपरा के बारे में या पूर्वोत्तर के राज्यों के विकास के बारे में सुनता है,तो राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना स्वतः प्रगाढ़ हो जाती है।
पर्यावरण संरक्षण और जल सुरक्षा:भविष्य की चिंताएं
आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का क्षरण है। ‘मन की बात’ में पर्यावरण संरक्षण और स्थिरता (Sustainability) पर विशेष जोर दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच के माध्यम से जल संरक्षण, वर्षा जल संचय,और पेड़ लगाने के महत्व को बार-बार रेखांकित किया है।
’कैच द रेन’ जैसे अभियानों को जन-जन तक पहुंचाने में इस कार्यक्रम की बड़ी भूमिका रही है। इसके साथ ही, पारंपरिक जीवन शैली की ओर लौटने का आह्वान करते हुए पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) जीवन अपनाने की प्रेरणा दी गई है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित करते हुए,
प्रधानमंत्री ने ‘मिशन लाइफ’ (LiFE – Lifestyle for Environment) की
अवधारणा को भी ‘मन की बात’ के जरिए देश के कोने-कोने तक पहुंचाया, ताकि हर नागरिक यह समझे कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारों की नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है।
आपदाओं और संकट के समय संबल और प्रेरणा
जब भी देश पर कोई आपदा या संकट आया, ‘मन की बात’ ने एक मार्गदर्शक और ढांढस बंधाने वालेकवच की तरह काम किया। कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश भय और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था, तब प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार्यक्रम के माध्यम से देशवासियों का हौसला बढ़ाया, डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मचारियों और कोरोना योद्धाओं के योगदान को नमन किया और संयम व अनुशासन का संदेश दिया।
संकट के समय जनता को एकजुट करने, अफवाहों से बचने और एक-दूसरे की मदद करने की प्रेरणा देने में इस रेडियो संवाद ने एक मनोवैज्ञानिक संबल प्रदान किया। यह दिखाता है कि ‘मन की बात’ केवल सफलता की कहानियों का बखान करने वाला मंच नहीं है, बल्कि यह देश के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला एक सच्चा साथी है।
वैश्विक पटल पर ‘मन की बात’ की स्वीकार्यता और प्रभाव
’मन की बात’ की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगी है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी इस कार्यक्रम के विशेष प्रसारण और इसके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा हो चुकी है। दुनिया भर के नीति-निर्देशक और समाजशास्त्री इस बात से अचंभित हैं कि कैसे एक लोकतांत्रिक देश का शीर्ष नेता बिना किसी औपचारिक माध्यम के रेडियो के जरिए सीधे करोड़ों नागरिकों से एक आध्यात्मिक और भावनात्मक जुड़ाव बना सकता है।
इस कार्यक्रम के 100 एपिसोड पूरे होने पर देश-विदेश में इसका उत्सव मनाया गया,जो इस बात का प्रमाण है कि यह केवल एक रेडियो प्रसारण नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है। विभिन्न भाषाओं और बोलियों में इसका अनुवाद होने के कारण यह देश के हर नागरिक की भाषा में उसकी अपनी बात बन गया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘मन की बात’ कार्यक्रम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह है। इसने यह साबित कर दिया है कि यदि नीयत साफ हो और संवाद का माध्यम सीधा और सच्चा हो,तो जनता और नेतृत्व के बीच की सभी दूरियां मिट जाती हैं। यह कार्यक्रम हमें याद दिलाता है कि एक देश केवल ईंट-पत्थर और सीमाओं से नहीं बनता,बल्कि वहां रहने वाले नागरिकों के सपनों, उनके पुरुषार्थ, उनकी देशभक्ति और उनके आपसी प्रेम से बनता है।
’मन की बात’ ने आम आदमी को यह विश्वास दिलाया है कि उसका हर छोटा प्रयास भी राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण है। यह संवाद की एक ऐसी अनूठी श्रृंखला है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और भारत को एक सशक्त, आत्मनिर्भर और ‘श्रेष्ठ भारत’ बनाने के मार्ग पर निरंतर आगे ले जाती रहेगी। यह वास्तव में 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक मन की आवाज है, जो प्रतिध्वनि बनकर पूरे विश्व में गूंज रही है।