राजनीति

देश तय कर चुका है-“मोदी कहीं नहीं जाएगा”

पवन शुक्ला

​जब देश का कोई आम नागरिक,किसी दूर-दराज के गांव की धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए,अपनी उम्मीदों की पोटली को थामे आगे बढ़ता है, तो उसके भीतर एक अजीब सा विश्वास हिलोरे मारता है। यह विश्वास रातों-रात नहीं बनता, इसके पीछे दशकों का संघर्ष, पसीने की हर एक बूंद और एक अटूट राष्ट्र-समर्पण की कहानी छिपी होती है। आज भारत के कोने-कोने में, चाहे वह हिमालय की ठंडी वादियों में बैठा कोई वृद्ध हो या दक्षिण के छोर पर समुद्र की लहरों के बीच मेहनत करता कोई मछुआरा, सबकी जुबान पर और सबके दिलों की धड़कनों में एक ही बात गूंज रही है – “देश तय कर चुका है – मोदी कहीं नहीं जाएगा।” यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि एक सौ तीस करोड़ से अधिक भारतीयों के सामूहिक अंतःकरण की वह आवाज है, जिसे किसी भी शोर या प्रपंच से दबाया नहीं जा सकता।

​विश्वास और जन-आकांक्षाओं का अनूठा सेतु

​राजनीति के गलियारों में अक्सर सत्ता के समीकरण गढ़े जाते हैं, आंकड़ों की बाजीगरी होती है और भविष्य की भविष्यवाणियां की जाती हैं। लेकिन जब जन-समर्थन किसी व्यक्ति से आगे बढ़कर एक जीवंत विचार बन जाता है, तो सारे समीकरण धरे के धरे रह जाते हैं। नरेंद्र मोदी का इस देश की जनता के साथ संबंध किसी पारंपरिक शासक और प्रजा का नहीं, बल्कि एक परिवार के मुखिया और उसके अपनों का है। वह व्यक्ति, जिसने अपना पूरा जीवन देश के नाम समर्पित कर दिया, जिसने अपनी हर सांस में भारत माता की सेवा को ही अपना एकमात्र धर्म माना, आज वह हर उस गरीब के घर का चराग बन चुका है जिसके यहां कभी अंधेरा हुआ करता था। जब एक मां को धुएं से मुक्ति मिलती है, जब एक गरीब के घर में पहली बार नल से जल पहुंचता है, और जब किसी झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को डिजिटल भारत की ताकत मिलती है, तो वह सिर्फ एक योजना का लाभ नहीं होता, वह उस भरोसे की जीत होती है जो प्रधानमंत्री ने जनता को दिया था।

​संघर्ष और अटूट संकल्प की मार्मिक दास्तान

​हर बड़ी उपलब्धि के पीछे अनगिनत कांटे होते हैं, और नरेंद्र मोदी का सफर कभी भी फूलों की सेज नहीं रहा है। हर कदम पर आलोचनाओं के तीर, साजिशों के जाल और विरोधियों के प्रहार हुए, लेकिन इस शख्स की रीढ़ की हड्डी को कोई झुका नहीं पाया। क्यों? क्योंकि जब इरादे चट्टान जैसे मजबूत हों और लक्ष्य में व्यक्तिगत स्वार्थ के बजाय ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना हो, तो हर बाधा अपने आप रास्ता बदल लेती है। हमने देखा है कि कैसे कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान, जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही थीं, तब इस देश का नेतृत्व करने वाला यह इंसान दिन-रात एक करके खड़ा रहा। जनता ने देखा कि प्रधानमंत्री ने अपने आराम, अपनी सेहत और अपनी हर व्यक्तिगत इच्छा को ताक पर रखकर केवल एक ही काम किया – भारत के प्रत्येक नागरिक की जान और उसकी गरिमा की रक्षा करना। वह मार्मिक दृश्य जब करोड़ों लोगों ने देश के लिए एकजुटता दिखाई, वह सिर्फ एक सांकेतिक समर्थन नहीं था, बल्कि इस बात की मुहर थी कि देश अपने नायक के साथ चट्टान की तरह खड़ा है।

​सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिकता का संगम

​भारत केवल भूभाग का टुकड़ा नहीं है, यह एक जीवंत सभ्यता है, जिसकी आत्मा सदियों से अपनी पहचान और सम्मान के लिए तरसती रही है। दशकों तक इस देश के सांस्कृतिक गौरव को हीन भावना से देखने की जो प्रवृत्ति चलाई गई थी, मोदी ने उस मानसिकता को हमेशा के लिए बदल दिया। आज जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होती है, जब काशी और महाकाल का नया स्वरूप पूरी भव्यता के साथ दुनिया के सामने आता है, तो एक साधारण भारतीय के सीने में गर्व की जो लहर उठती है, उसे शब्दों में बयान करना कठिन है। यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान केवल अतीत की यादों को ताजा करना नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत की नींव को मजबूत करना है। साथ ही, जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनता है,जब डिजिटल ट्रांजैक्शन में हम दुनिया का नेतृत्व करते हैं, और जब स्पेस की गहराइयों तक हमारा चंद्रयान तिरंगा लहराता है,तो परंपरा और आधुनिकता का यह अद्भुत संगम हर नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि इस देश की सही दिशा और दशा का सच्चा पहरेदार कौन है।

​गांव,गरीब, और वंचित की अंतिम उम्मीद

​इस देश की असली आत्मा इसके गांवों और झोपड़ियों में बसती है। सदियों तक उपेक्षित रहे वे वर्ग, जिन्हें कभी वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा गया, आज शासन के और विकास के केंद्र में हैं। जब कोई दलित, शोषित,पीड़ित या आदिवासी यह देखता है कि देश का सर्वोच्च पद एक आदिवासी महिला के पास है, और उनके जीवनस्तर को ऊपर उठाने के लिए हर रोज जमीन पर काम हो रहा है, तो उनका विश्वास कई गुना बढ़ जाता है। मोदी ने वंचितों को केवल योजनाएं नहीं दीं, बल्कि उन्हें समाज में सिर उठाकर जीने का अधिकार दिया है। यही कारण है कि जब कोई विरोधी दल या तथाकथित राजनीतिक सत्ता के गलियारों में बैठकर यह सोचते हैं कि वे इस जन-आंदोलन को रोक लेंगे,तो वे भूल जाते हैं कि उनका मुकाबला हवा के झोंके से नहीं, बल्कि हिमालय जैसी अडिग जन-आस्था से है। जनता जानती है कि जिसने उनके आंसुओं को पोंछा है, जिसने उनके बच्चों के भविष्य को सुरक्षित किया है, उसे वे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।

​एक अटूट भविष्य का मार्ग

​राजनीति में हार-जीत आती-जाती रहती है,सरकारें बनती और बिगड़ती हैं,लेकिन कुछ रिश्ते समय और काल की सीमाओं से परे होते हैं। नरेंद्र मोदी और भारत की जनता का रिश्ता कुछ ऐसा ही है। यह विश्वास का वह धागा है जो तमाम आलोचनाओं और प्रपंचों के बीच और अधिक मजबूत होता गया है। आज जब देश एक नए, विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तो इस महायज्ञ का सारथी कौन होगा, इस पर अब कोई संशय शेष नहीं रहा है। भारत की माताएं, बहनें, युवा, किसान और देश का हर एक सच्चा सपूत यह मन बना चुका है कि जिस यज्ञ की शुरुआत देश को शिखर पर ले जाने के लिए हुई है, उसे अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता। विरोधी चाहे जितनी साजिशें रच लें, भ्रम का जाल फैला लें, लेकिन भारत की माटी का यह कण-कण और देश का जन-जन आज एक ही स्वर में कह रहा है –

​”देश तय कर चुका है – मोदी कहीं नहीं जाएगा।”