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संसार के अन्य देशों पर मनु का प्रभाव : अध्याय – 19

भारतीय महापुरुषों में मनु भारतीय सांस्कृतिक वांग्मय के चमकते हीरे हैं। एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके समक्ष संसार का अन्य महापुरुष फीका पड़ जाता है। उनका व्यक्तित्व वंदनीय है, उनका कृतित्व अनुकरणीय है और उनकी मेधाशक्ति नमनीय है। उनके राजपुरुष का वैभव भारत की गौरवशाली धरोहर है, उनका धर्मशास्त्र संपूर्ण वसुधा की शोभा है, उनका राजनीतिक चिंतन आज के राजनीतिशास्त्रियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है, उनका धर्म चिंतन प्रत्येक उस मठाधीश के लिए विचारणीय है जो अपने आप को धर्माधीश मानकर सर्वोच्च दिखाने का प्रयास करता है, उनका आध्यात्मिक दर्शन भारत की दर्शन परंपरा को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है, उनका समाज चिंतन समाज के लिए आज भी समरसता का संदेश देता है, उनकी आर्थिक मान्यताएं विश्व के सारे झंझटों को समाप्त करने की क्षमता रखती हैं, उनका न्यायदर्शन आज की न्याय प्रणाली के लिए सर्वोच्च आदर्श होने की क्षमता रखता है और उनका अध्यात्म दर्शन आज के प्रत्येक अध्यात्मवादी के लिए अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था अर्थात मुक्ति की पगडंडी दिखाने की क्षमता रखता है।

महर्षि मनु का विधान और आतंकवाद

उनकी महानता इससे ही सर्वोपरि सिद्ध हो जाती है कि जो कुछ उन्होंने लिखा है या जो कुछ उन्होंने अपने धर्मशास्त्र मनुस्मृति में विधान किया है, उस विधान का जहां-जहां जितने- जितने अनुपात में प्रभाव है उतने -उतने अनुपात में ही वहां आज भी व्यवस्था काम करती दिखाई दे रही है। वहां पर नीति, न्याय और धर्म अपनी धुरी पर कार्य करते हुए लोक को धारण कर रहे हैं। जहां नीति, न्याय और धर्म की नाभि टहल जाती है, वहां पर उपद्रव, उत्पात और अराजकता के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। आज आतंकवाद जिस प्रकार एक वैश्विक समस्या बन चुका है, वह विश्व की नाभि टहल जाने का संकेत है। जो लोग इस आतंकवाद के समर्थन में आकर नारे लगाते हैं या इसका समर्थन करते हैं वे इस रोग को और भी अधिक उग्र करने का काम कर रहे हैं। इन सबका उपचार केवल मनुस्मृति के दिए गए विधान के आधार पर ही किया जाना संभव है। जिस दिन महर्षि मनु के विधान के अनुसार इन आतंकवादियों को परिपंथी अथवा दस्यु मानकर सारा विश्व निपटने का संकल्प ले लेगा, उस दिन पलक झपकते आतंकवाद समाप्त हो जाएगा।
हमारी राजनीतिक और सामाजिक ही नहीं व्यक्तिगत व्यवस्था में भी मनु प्रतिपादित नियम ही काम करते हुए देखे जा सकते हैं। आज मनु, मनुवाद और मनुवादी व्यवस्था को अपमानित करने वाले अनेक लोग हैं, इसके उपरांत भी मनु के अप्रतिम तेज के सामने उनके सारे कुतर्क असफल हो जाते हैं। मनु महाराज को प्रथम प्रजापति के रूप में मान्यता प्राप्त है। उनके लिए यह शब्द कोई उपाधि मात्र नहीं था, जिसे प्राप्त करके वह सम्मानित होते अपितु उन्होंने अपने आप को प्रजापति के रूप में सिद्ध और स्थापित भी किया। इसीलिए उन्होंने प्रजाहितचिंतन करते हुए उसके कल्याण के लिए ‘ मनुस्मृति’ का विधान किया। उनकी ‘ मनुस्मृति’ में मिलावटखोरों की मिलावटखोरी को यदि अलग रख दिया जाए तो उन ऐसा दिव्यता बिखेरने वाला व्यक्ति संसार के इतिहास में मिलना दुर्लभ है।

जन गण मन के प्रतिनिधि मनु

उन्होंने प्रजाहित संवर्धन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और उसी के अनुसार जीवन जीने का सफल और सार्थक प्रयास किया। उन्होंने अपने आप को मानवता का प्रतिनिधि बनाया, धर्म का प्रतिनिधि बनाया, न्याय और नीति का प्रतिनिधि बनाया, जन गण मन का ‘ प्रतिनिधि ‘ बनाया। उन्होंने प्रत्येक प्रकार के अधिनायकत्व को मिटाने का विधान दिया, मानव मन की प्रत्येक प्रकार की उस हिंसक प्रवृत्ति को मिटाने का विधान दिया जो मानवता के विकास में कभी भी बाधक हो सकती है, प्रत्येक प्रकार के उस तानाशाही दृष्टिकोण का विरोध करने और उसका सफल उपचार करने का विधान दिया जो मानव के समग्र विकास पर किसी भी कालखंड में किसी भी रूप में प्रतिबंध लगा सकने में कभी सफल हो सकता है।
संसार की कीचड़ में रहकर भी उन्होंने अपने आप को कमल की भांति कीचड़ के विकारों से निरपेक्ष रहने का अभ्यासी बनाया। उनके द्वारा प्रशस्त किया गया मार्ग आज भी हम सबके लिए अनुकरणीय है। भारत का राजपथ आज भी उनकी प्रतीक्षा कर रहा है कि वह आएं और इस राजपथ पर अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की दिव्य आभा बिखेर दें।
महर्षि मनु की दिव्यता भारत का गौरव है। उनका व्यक्तित्व भारत की धरोहर है । उनका कृतित्व भारत का सम्मान है। उनका चिंतन भारत का अभिमान है और उनका जीवन मानवता का मान है। ऐसे महापुरुष के द्वारा प्रतिपादित धर्म की व्यवस्था का पालन करना मानव मात्र का परम कर्तव्य है। भारत ( जो कि उनकी वैचारिक पूंजी का सबसे प्रबल दावेदार है अथवा उत्तराधिकारी है ) के लिए तो यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह धर्म की व्यवस्था का पालन करते हुए मानव मात्र को धर्म के वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराए।
महर्षि मनु पर आरोप लगता है कि उन्होंने शूद्र वर्ग की उपेक्षा के लिए लोगों को प्रेरित किया। जबकि यथार्थ इसके विपरीत है। मनु ने अपने विधान में कहीं पर भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं दी जिससे शूद्र का शोषण हो सके। उन्होंने तो दंपति के लिए यह व्यवस्था की है कि वह अपने सेवादारों अथवा शूद्र वर्ग के लोगों को भोजन कराकर ही भोजन करें।

भुक्तवत्सु अथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि।
भुन्जीयातां तत: पश्चात् अवशिष्ट तु दम्पति।। (3.116)

मनु की स्पष्ट व्यवस्था है कि ” प्रत्येक दंपति के लिए यह आवश्यक है कि वह सर्वप्रथम घर में आए हुए विद्वान् अतिथियों को भोजन कराए । उसके पश्चात अपने भृत्यों अर्थात् घर में सेवादार के रूप में काम करने वाले शूद्र वर्ग के लोगों को भोजन कराकर तत्पश्चात् शेष भोजन को स्वयं किया करें।’

इसी प्रकार मनु का नारी के प्रति भी असीम सम्मान का भाव था। यद्यपि नारी को लेकर भी उन पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने समाज को नारी उत्पीड़न के लिए शिक्षा दी। इस संबंध में उनका यह श्लोक दृष्टव्य है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। (3.56)

महर्षि मनु कह रहे हैं कि जहां पर नारियों का सम्मान अर्थात आदर सत्कार किया जाता है, वहां पर देवता निवास करते हैं अर्थात जहां नारियों का सम्मान होता है, उस स्थान पर दिव्यता अपने आप बिखर जाती है। मनु महाराज आगे कहते हैं कि जहां पर नारियों का सम्मान नहीं होता, वहां की गई समस्त क्रियाएं (कर्म) निष्फल हो जाती हैं।

विश्व के विद्वानों की दृष्टि में मनु

आज भी विश्व के कई देशों में महर्षि मनु के प्रति लोगों में श्रद्धा भावना मिलती है। पी.वी. काणे जी के अनुसार दक्षिणी वियतनाम में कुछ ऐसे अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनमें मनुस्मृति के श्लोक लिखे मिले हैं। ‘धम्मथट्’ अथवा ‘मनुसार’
से पता चलता है कि इंद्र वर्मा प्रथम 1799 ई के अभिलेखों में राजधानी का वर्णन करते हुए लिखा है कि वहां निरुपद्रव वर्णाश्रम स्थिति थी। बुद्धघोष ने सोलहवीं शाताब्दी में उसका पाली अनुवाद ‘मनुसार’ के नाम से किया था।

कंबोडिया और मनुस्मृति

कंबोडिया के लोग आज भी अपने आपको मनुवंशी कहकर प्रसन्नता की अनुभूति करते हैं। वे अपने आपको मनु के साथ जोड़कर देखने में तनिक भी लज्जा नहीं करते। जैसा कि भारतवर्ष में कुछ लोग मनु की बात करने तक से बचने का प्रयास करते हैं। कंबोडिया की शासन व्यवस्था और यहां तक कि उसका संविधान भी मनु के अनुसार अर्थात मनु की व्यवस्था के अनुसार चलता रहा। राजा उदयवीर वर्मा के अभिलेख में वहां के संविधान को ‘ मानव नीतिसार ‘ के नाम से जाना गया है बताया गया है। वहां के लोगों में मनुस्मृति के विषय में किसी प्रकार की भ्रांति नहीं है। क्योंकि वे जानते हैं कि मनु संसार के आदि व्यवस्थापक हैं। आदि राजा हैं। आदि संविधान निर्माता हैं। यही कारण है कि वह मनु और मनुस्मृति पर गौरव की अनुभूति करते हैं और अपने आपको मनु के साथ जोड़कर देखने में उन्हें एक अलग ही प्रकार का आनन्द अनुभव होता है।

जय वर्मा प्रथम के अभिलेख से हमको जानकारी मिलती है कि कंबोडिया के लोग आज भी ‘मनुसंहिता ‘ को बहुत ही सम्मान देते हैं और बहुत ही आदर के साथ उसका अध्ययन करते हैं। यदि कंबोडिया के लोगों के भीतर आज भी मनुस्मृति को लेकर सम्मान का भाव है तो इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वहां के राजवंशों में भी मनु के प्रति आदर का भाव निरंतर बना रहा। क्योंकि जब राजाओं के भीतर किसी महापुरुष के प्रति सम्मान का भाव होता है तभी प्रजा में भी वैसी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
668 ई. में कंबोडिया पर जय वर्मा पंचम का शासन था। उन्होंने एक अभिलेख में यह घोषणा की है कि उसने वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना दृढ़ता से की। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि इस राजा के शासनकाल तक आते-आते कंबोडिया में वर्णाश्रम व्यवस्था कमजोर पड़ गई होगी, जिसे फिर से स्थापित कर राजा ने उसकी दुर्बलताओं को दूर करने का प्रयास किया होगा अर्थात देश के नागरिकों को उसकी आवश्यकता और उसके वैज्ञानिक स्वरूप को समझने के लिए क्रांतिकारी निर्णय लेकर प्रेरित किया होगा। यह बहुत ही हर्ष का विषय है कि कंबोडिया जैसे देश में 668 ई तक भी महर्षि मनु की मनुस्मृति के आधार पर शासन और समाज की व्यवस्था को चलाने का प्रयास राजा के माध्यम से किया जा रहा था। वहां राजा ही समाज सुधारक हो गया। जिसने इस बात को बड़ी गहराई से समझा कि देश के लोगों को मनु की आवश्यकता है अर्थात मनु की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक व्यवस्था की आवश्यकता है। जिसके लिए काम करने की आवश्यकता है। यदि राजा इस प्रकार से कार्य कर रहा था तो राजा की योग्यता भी कैसी रही होगी ? – इसका भी इस उदाहरण से सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
यशोवर्मा के “प्रसम कोमनप” नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में मनुस्मृति का 2.136 श्लोक उध्दृत है। जिसमें समान व्यवस्था अर्थात सामाजिक समरसता के मानदंडों को स्थान दिया गया है।

फिलीपींस और मनुस्मृति

यदि बात फिलीपींस की करें तो उसका समर्पण तो मनु महाराज के प्रति दो कदम और आगे जाकर है। उसने आदि संविधान निर्माता महर्षि मनु को आज तक भी अपना ही नहीं, मानवता का भी सबसे महान पूर्वज मानने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया है। फिलिपींस की संसद के मुख्य द्वार पर महर्षि मनु की प्रतिमा स्थापित कर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को महत्वपूर्ण सम्मान देकर सारे संसार के संविधानविदों को भी यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि उन्हें मनुस्मृति के रूप में संसार को पहला संविधान देने वाले इस महापुरुष के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन करना चाहिए। क्योंकि यही वह महापुरुष है जो हमें आज तक भी बौद्धिक नेतृत्व प्रदान कर रहा है और राजनीति के साथ-साथ समाज के बारे में भी हमारा मार्गदर्शन कर रहा है।

इंडोनेशिया और महर्षि मनु

इंडोनेशिया जिसे कि ‘ हिंदेशिया ‘ भी कहा जाता रहा है, आज भी अपने आप को हिंदू , हिंदी, हिंदुस्तान अर्थात आर्य, आर्यभाषा और आर्यावर्त के प्रति समर्पित किए हुए है। वह आज भी भारत के उन महान ऋषियों के द्वारा प्रतिपादित अथवा लिखित साहित्य को पढ़ने में गौरव की अनुभूति करता है, जिन्हें भारत के छद्म-धर्मनिरपेक्षतावादियों ने उपेक्षित करने में ही रुचि दिखाई है। क्योंकि भारत के इन धर्मनिरपेक्षतावादियों को मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए उनकी वोट प्राप्त करनी होती हैं। जबकि इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल देश होने के उपरांत भी किसी प्रकार के तुष्टीकरण में विश्वास नहीं रखता और उसे अपने महान पूर्वजों के सनातनी हिंदू होने पर आज भी गर्व होता है। उसे उन परंपराओं को निभाने अथवा अपनाने में तनिक भी संकोच नहीं होता जो भारतवर्ष में हिंदुत्व की परंपराएं कहलाती हैं।
यही कारण है कि इंडोनेशिया के बालिद्वीप में आज भी मनु प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य कर रही है। कहने का अभिप्राय है कि इस मुस्लिम देश ने मनु महाराज की और सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था को आज भी त्यागा नहीं है। उसकी स्पष्ट मान्यता है कि मजहब परिवर्तित हो सकता है, परंतु पूर्वज परिवर्तित नहीं हो सकते। इसीलिए इंडोनेशिया अपने वैदिक अतीत पर प्रसन्नता की खुलकर अभिव्यक्ति करता है। वहां पर आज भी तथाकथित ऊंची जातियों को लोग ‘ द्विज ‘ के नाम से पुकारते हैं, जो कि हमारे यहां पर कभी विद्वानों के लिए संबोधन दिया जाता था। इसी प्रकार वहां शूद्रों को ‘ एकजाति’ कहा जाता है। इसी प्रकार की व्यवस्था महर्षि मनु भीदेते हैं।
मनु महाराज मनुस्मृति के दसवें अध्याय के चौथे श्लोक में कहते हैं कि सनातन समाज में ब्राह्मण ,क्षत्रिय, वैश्य – ये तीन वर्ण विद्याध्ययनरूपी दूसरा जन्म प्राप्त करने वाले हैं। इनका विद्याध्ययन करने से दूसरा जन्म होता है। अतः द्विज कहलाते हैं। चतुर्थ ‘ एकजाति’ शूद्र अर्थात विद्याध्ययनरूपी जन्म न होने के कारण एकजाति अर्थात् एक जन्म वाला ( ऐसे व्यक्ति जिन्हें माता के गर्भ से एक बार ही जन्म मिलता है और उसके बाद उन्हें गुरु के गर्भ अर्थात गुरुकुल से दूसरा जन्म नहीं मिलता) अर्थात विद्याध्ययन रूपी ब्रह्म जन्म से रहित शूद्र वर्ण है। पांचवा कोई वर्ण नहीं है।
यहां पर यह बात भी स्पष्ट करनी आवश्यक है कि जो व्यक्ति इन चार वर्णों में से कोई से भी वर्ण का नहीं होता , वह दस्यु कहलाता है, जो कि समाज के लिए बहुत ही घातक होता है।
इंडोनेशिया ने महर्षि मनु की इस मान्यता को स्वीकार करते हुए समाज में ऊंच -नीच, भेदभाव, छुआछूत आदि को स्थान नहीं दिया है। यही कारण है कि वहां पर आज भी जाति भेद के आधार पर मनुष्य मनुष्य के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है।

डॉ भीमराव अंबेडकर और मनुस्मृति

इसे भारत का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी जब मनुस्मृति पर लिखा तो उन्होंने अपने लेखन में मनुस्मृति की उन व्यवस्थाओं को जो मानवता की विरोधी थीं, अपने लेखन का आधार बनाया। उन्होंने ‘मनुस्मृति’ को शूद्र वर्ग की विरोधी सिद्ध करने के लिए उन प्रक्षिप्त श्लोकों को ही अपने लेखन का आधार बनाया जो कि ‘ मनुस्मृति’ में कभी रहे ही नहीं थे और जिन्हें कालांतर में कुछ स्वार्थी लोगों ने जानबूझकर ‘ मनुस्मृति ‘ में स्थापित कर दिया था । डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपने लेखन में ऐसे 1471 प्रक्षिप्त श्लोकों में से 88% श्लोक लेकर लोगों में नई भ्रांतियों को स्थापित किया। जबकि होना यह चाहिए था कि मनु महाराज की उन बौद्धिक क्षमताओं को प्रकाश में लाया जाता जो उन्होंने मनुस्मृति के 1214 मूल श्लोकों में अभिव्यक्त की थी।

ब्रिटेन के न्याय शास्त्री सर विलियम जोन्स

ब्रिटेन के भाषाविद एवं न्यायशास्त्री सर विलियम जोंस द्वारा सन् 1776-1779 में भारत की संस्कृत भाषा पर विशेष कार्य किया गया, जिसने मनुस्मृति को भारतीय कानून का विधि शास्त्र स्वीकार किया। भारत के लोगों का विश्वास जीतने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सत्ताधारियों ने मनुस्मृति को भारत के लिए कानून बनाने में मनुस्मृति का सहारा लेने के लिए भी भारत के लोगों को आश्वस्त किया।
महात्मा गांधी चाहते थे कि मनुस्मृति पर विशेष अनुसंधान का कार्य होना चाहिए। इसके जो प्रावधान सत्य और अहिंसा के विपरीत हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए और जो सत्य और अहिंसा के अनुकूल हैं अर्थात मानवता को लाभान्वित करने वाले हैं, उन्हें आज भी स्वीकार करना चाहिए। थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष श्रीमती एनी बीसेंट मनुस्मृति की प्रशंसा किया करती थीं। उन्होंने उसका जैसे-जैसे इसका अध्ययन किया वैसे – वैसे ही उसकी प्रशंसक बनती चली गईं। जर्मनी के महान दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा था, ” बाइबल को बन्द करो और मनुस्मृति को खोलो। इसमें जीवन की सकारात्मक प्रस्तुति हुई है।,”

अमेरिका और मनु का धर्मशास्त्र

‘ एनसाइक्लोपीडिया ‘ में भी मनुस्मृति को सम्मानित धर्मशास्त्र के रूप में स्थान दिया गया है। इस महान धर्मशास्त्र को प्राचीन भारत का सबसे प्रभावशाली, आधिकारिक परंतु साथ ही विवादास्पद ,( जिन श्लोकों को मनुस्मृति में अवैज्ञानिक ढंग से बाद में डाल दिया गया, उनके आधार पर ) सामाजिक और विधिक धर्मशास्त्र के रूप में स्थान दिया गया है। इसे वहां पर मानव धर्मशास्त्र के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
‘ एनसाइक्लोपीडिया ‘ में इस प्रकार की शब्दावली से स्पष्ट होता है कि ‘ एनसाइक्लोपीडिया ‘ भी मनुस्मृति के मानवता के प्रति किए गए महान कार्यों को सम्मान की दृष्टि से देखता है। ‘ एनसाइक्लोपीडिया ‘ ने मनु महाराज की बौद्धिक शक्ति का यथार्थ अवलोकन और चित्रण किया है।
वास्तव में ‘ मनुस्मृति ‘ मानव की बौद्धिक चेतना का वह प्रकाश स्तंभ है जो अपने आप में अप्रतिम और अद्वितीय है। बौद्धिक चेतना के इस महान प्रकाश स्तंभ की ओर देखना तक हर किसी के लिए संभव नहीं है। यह प्रकाश स्तंभ सृष्टि के आदि में खड़ा हुआ दिखाई देता है, जो सृष्टि के अंत तक ज्ञान और प्रकाश के अक्षय ऊर्जा स्रोत के रूप में काम करता रहेगा। मानवता के पास ऐसे बहुत कम प्रकाश स्तंभ हैं जो इतनी दूर पहले स्थापित किए गए और आज तक जिनकी ऊर्जा यथावत कार्य कर रही है।

मनु को नीचे लाना संभव नहीं

जिस ऊंचाई की चेतना के साथ इस प्रकाश स्तंभ का निर्माण अथवा सृजन एक धर्मशास्त्र के रूप में किया गया है, उसके पार जाना (अर्थात इसकी ऊंचाई से और भी ऊंचाई पर जाना) किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए चाहे मनु को कितना ही क्यों न बदनाम कर लिया गया हो ? इसके उपरांत भी उनकी बौद्धिक चेतना को लांघने का साहस किसी के भीतर हुआ नहीं है। चाहे लोगों ने उन्हें अपने लिए कितना ही क्यों न प्रयोग कर लिया हो अर्थात उनके धर्मशास्त्र में कितनी ही मिलावट क्यों न कर ली हो और कितने ही लोगों ने उनकी आलोचना करते हुए कितने ही ग्रन्थ क्यों न लिख लिए हों, इसके उपरांत भी मनु अपनी बौद्धिक चेतना की जिस ऊंचाई पर खड़े हैं, उन्हें उससे नीचे खींचना किसी के लिए संभव नहीं है।
अमेरिका में मनु महाराज को आदिकालीन न्यायशास्त्री और मानवजाति के आदि पुरुष के रूप में मान्यता दी गई है।वैवस्वत मनु के समय में घटी जलप्रलय की घटना को संसार भर के प्राचीन साहित्य में स्थान दिया गया है। उस घटना को लोगों ने अपने-अपने ढंग से सारे संसार में अपने-अपने साहित्य में उल्लेखित किया है। यह तभी संभव हो सकता है जब हम सब का मूल एक रहा हो और साथ ही हम सभी एक ही सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना के अंग रहे हों ? जब हम सबने एक ही बौद्धिक नेतृत्व से चलना सीखा हो और उसी के नेतृत्व में काम करने में आनन्द अनुभव किया हो। यह सर्वमान्य सत्य है कि प्राचीन काल में संपूर्ण विश्व ने भारत को अपना बौद्धिक नायक स्वीकार किया था। इसलिए यह घटना भारतीय साहित्य और भारतीय धर्म के प्रचारकों के माध्यम से संसार में सर्वत्र फैली और जिस- जिस प्रकार से भारत के विद्वानों ने इसे अपने साहित्य में स्थान दिया था, लगभग उसी कहानी को सारे विश्व के साहित्यकारों ने थोड़े से परिवर्तन के साथ यथावत दोहराने का प्रयास किया। पुरुषोत्तम नागेश ओक जैसे महान विद्वानों की मान्यता है कि बाइबिल और कुरान में हम जिस ‘ नूह ‘ के बारे में पढ़ते हैं, वह कोई और नहीं अपितु मनु का ही विकृत नाम है। इसी प्रकार जिसको हम ‘ बाबा आदम ‘ कहते हैं, वह ‘आदिम ब्रह्मा ‘ के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस प्रकार सारा संसार और सारे संसार के साहित्यकार भारत की ही आरती उतारते दिखाई देते हैं।

‘ जबरिया कानून ‘ नहीं था मनुस्मृति

मनु महाराज ने अपने जीवन काल में संपूर्ण मानवता को प्रभावित किया। सारे संसार पर उन्होंने अपनी व्यवस्था लागू की। यह एक ऐसी व्यवस्था थी- जिसके अंतर्गत लोगों ने तनिक सी भी असुविधा अनुभव नहीं की अर्थात इस व्यवस्था को किसी ‘जबरिया कानून ‘ के रूप में मनु जी के द्वारा किसी पर लादा नहीं गया था, यह किसी मजहब का पर्सनल लॉ भी नहीं था, जो दूसरों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव करता हो, यह मानवता के मूल्यों को समर्पित एक धर्मशास्त्र था जो सबके भले के लिए अर्थात लोक कल्याण के लिए बनाया गया था। इसे बनाकर सबके भले के लिए लागू किया गया था।
नूह और जल प्रलय की घटना को प्राचीन बबेरू और सुमेर देश के ग्रन्थों में स्थान दिया गया है। इसी प्रकार यह घटना ईसाई और मुस्लिम मजहबी किताबों में भी मिलती है। विद्वानों की मान्यता है कि क्रीट द्वीप के आदि सम्राट की मिनोस नाम की संज्ञा भी मनु की समानार्थक है। इसी प्रकार मिस्र देश में भी पहले राजा का नाम मेनीज था । यह भी मनु की परंपरा से ही लिया गया शब्द है।

महाकवि कालिदास ने लिखा है कि-

वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥

अर्थात् मनीषियों में माननीय वैवस्वत मनु का सब राजाओं में ऐसे ही प्रथम स्थान है अर्थात मनु इस प्रकार सम्मान के पात्र हैं जिस प्रकार वेदों में प्रणव को सम्मान दिया गया है, अर्थात जिस प्रकार प्रणव रहस्य से भरी हई त्रयी विद्या का प्रतीक है, उसी प्रकार सब राजाओं की शासन-नीति के प्रतीक मनु हैं।
जिस प्रकार प्रणव जप से मानव जीवन उन्नति को प्राप्त कर सकता है, उसकी आध्यात्मिक उन्नति संभव है और सारे भवबंधनों का कट जाना संभव है, उसी प्रकार राजनीति के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में यदि मनु की व्यवस्थाओं का जप किया जाए अर्थात उनको अक्षरश: माना जाए तो मानव समाज का भी कल्याण संभव है।
वासुदेव शरण अग्रवाल जी अपने एक लेख में कालिदास जी को उद्धृत करते हुए लिखते हैं :- ” समुद्र-पर्यन्त पृथिवी के एकराट जन्म से मृत्यु पर्यन्त संस्कारों के द्वारा शुद्ध रहनेवाले, आयु के प्रथम भाग में विद्या का अभ्यास करनेवाले, यौवन में यथान्याय विषयों का उपभोग करनेवाले, वृद्धावस्था में मुनियों की वृत्ति धारण करनेवाले और अन्त में योग के द्वारा शरीर छोड़नेवाले, इस प्रकार के सुव्यवस्थित आश्रम-जीवन के अनुयायी सूर्यवंशी राजा थे! वे लोग यश के लिए जीतनेवाले, सत्य के लिए मितभाषी, दान के लिए अर्थसञ्चयी और सन्तति के लिए गृहमेधी बनते थे। विधि के अनुसार अग्निहोत्र करना, समय के अनुसार याचकों को दान देना ये उनकी विशेषताएँ थीं। इन स्फुट रेखाओं से मानव-जीवन का जो स्वरूप हमारे सामने आता है, वही संक्षेप में मानव-धर्म है। हमारे आदर्शों के चिरपरिचित रघु और दिलीप के ही स्वरूप हमारे सामने आता है, उसमें कवि के शालप्रांश, वृषस्कन्ध, पूर्वज मनु थे। उदात्त क्षात्र धर्म के उत्कृष्ट प्रतिनिधि इन राजर्षिवयों का जो व्यूढ़ोरस्क और महाबाहु ये विशेषण अक्षरशः चरितार्थ होते हैं। राजर्षि मनु के भौतिक स्वरूप की कल्पना भी कुछ-कुछ इसी रूप में हमारे सामने आती है।”
इस प्रकार मनु महाराज का जीवन आज भी हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके जीवन को आधार बनाकर हम आज भी वैश्विक व्यवस्था को सही दिशा दे सकते हैं।
( वासुदेव शरण अग्रवाल जी के लेख पर आधारित )

डॉ राकेश कुमार आर्य