लेखक परिचय

अनिल सौमित्र

अनिल सौमित्र

मीडिया एक्टिविस्‍ट व सामाजिक कार्यकर्ता अनिलजी का जन्‍म मुजफ्फरपुर के एक गांव में जन्माष्टमी के दिन हुआ। दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्तर डिग्री हासिल कीं। भोपाल में एक एनजीओ में काम किया। इसके पश्‍चात् रायपुर में एक सरकारी संस्थान में निःशक्तजनों की सेवा करने में जुट गए। भोपाल में राष्‍ट्रवादी साप्‍ताहिक समाचार-पत्र 'पांचजन्‍य' के विशेष संवाददाता। अनेक पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जालों पर नियमित लेखन।

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कलमबंदी और हथियारबंदी का ताना-बाना

आउटलुक पत्रिका के ताजे अंक में अरुंधती रॉय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है। कुछ ही दिनों पूर्व पश्चिम बंगाल में उन्होंने एक साक्षात्कार भी दिया। लगे हाथों एक टीवी चैनल ने भी उनका साक्षात्कार प्रसारित किया। जाहिर है अरुंधती का लिखा-कहा काफी पढ़ा और सुना जाता है। वर्तमान मीडिया में क्या लिखा गया, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है किसके द्वारा लिखा गया। अरुंधती के पाठक और दर्शक-श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग भी है। जाहिर है सबका अपना नजरिया होगा। अरुंधती का लिखा – ‘भूमकालः कॉमरेडों के साथ-साथ’ पढ़ने वाले एक मित्र ने कहा – इस आलेख में जबर्दस्त माओवादी अपील है, जैसे शोभा-डे के लिखे में सेक्स अपील होता है। पाठक ने स्मरण दिलाया- हजार चैरासी की मां’ फिल्म में भी ऐसा ही माओवादी अपील था। पाठक ने बताया अरुंधती को पढ़कर माओवादी बन जाने का मन करता है। विकास, आदिवासी और जंगल की बात करने का मन करता है। माओवादियों-नक्सलियों की तरह हत्या, लूट, डाका, वसूली, बलात्कार और अत्याचार करने का जी करता है। ऐसी प्रेरणा तो पहले कभी नहीं मिली, पहले राष्ट्रवादियों से लेकर समाजवादियों तक को पढ़ा।

अरुंधती के पास कौन-सा स्वप्न है! क्या उनका स्वप्न आदिवासियों या आम लोगों का दुःस्वप्न है? विकास के नाम पर विनाश और हिंसा को जायज ठहराने वाले ये भी तो बतायें कि आखिर माओवादी किसका विकास कर रहे हैं? भले ही माओवादी-नक्सली विकास की आड़ लेकर विनाश का तांडव कर रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक सरकारी कार्यवाई की निंदा यह कह कर कर रहे हैं कि माओवाद-नक्सलवाद पिछड़ेपन, विषमता और गरीबी के कारण पैदा हुआ है। बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट और आंध््राप्रदेश तक माओवादियों के मार्फत किसका विकास हुआ है, किसका विकास रुका है? ये विनाश का कॉरीडोर किसके लिए बन रहा है यह भी देखा और पूछा जाना चाहिए। दंतेवाड़ा में इंद्रावती नदी के पार माओवादियों के नियंत्रित इलाके में सन्नाटा पसरा है। जिन बच्चों को स्कूल में किताब-कॉपियों और कलम-पेंसिल के साथ होना चाहिए था, वे माओवादियों के शिविरों में गोली-बारुद और इंसास-एके 47-56 का प्रशिक्षण लेकर विनाशक दस्ते बन रहे हैंं। स्कूलों में भय के कारण पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों ही नदारद हैं।

निश्चित तौर पर खनिज और वन संसाधनों से भरपूर वन-प्रांतर में संघर्षरत पुलिस बल और माओवादी-नक्सली हर लिहाज से परस्पर भिन्न और असमान हैं। एक तरफ माओवादियों की पैशाचिक वृत्ति, मानवाधिकारों से बेपरवाह, देशी लूट और विदेशी अनुदान से संकलित असलहे, मीडिया का दृश्य-अद्श्य तंत्र, भय पैदा करने के हरसंभव हथकंडों से लैस तथा छल-बल से अर्जित निर्दोष-निरीह आदिवासियों का समर्थन प्राप्त, अत्यन्त सुसंगठित व दुर्दांत प्रेरणा से भरा हुआ माओवादी लडाकू छापामार बल। वहीं दूसरी ओर निर्दोंषों पर बल प्रयोग न करने की नैतिक जिम्मेदारी लिए, संसाधनों और सुविधाओं की कमी झेल रहे, राजनैतिक नेतृत्व की उहापोह से ग्रस्त, नौकरशाही के जंजाल से ग्रस्त, मानवाधिकार संगठनों के दुराग्रहों से लांछित, राज्य और केन्द्र की नीति-अनीति का शिकार, वन-प्रांतरों की भौगोलिक, सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक ढांचे से अंजान या बेहद कम जानकार सरकार के अद्र्ध-सैनिक बल। बेहतर जिंदगी की लालसा दोनों को है। एक परिवार की देश-समाज की बेहतरी चाहता है दूसरा माओवादियों का जत्था है जो किसकी बेहतरी और सुरक्षा के लिए मार-काट मचा रहा है उसे खुद नहीं मालूम। बस हत्या अभियान में मारे गए शवों और लूटे गए हथियारों की गिनती ही उन्हें करनी है। माक्र्स, लेनिन और माओ को कौन जानता है उन सुदूर वनवासी क्षेत्रों में, जानते हैं तो बस उनके नाम से चलाए जाने वाले भय को। जो वनवासी योद्धा अंग्रेजों से दो-दो हाथ कर रहा था, उसकी तुलना इन माओवादियों से नहीं की जा सकती जिनका स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व में कोई विश्वास नहीं।

माओवादी लेखक और बुद्धिजीवी माओवादी-नक्सलियों को आदिवासियों और शोषितों का प्रतिनिधि बताते थकते नहीं। लेकिन कोई उनसे यह क्यों नहीं पूछता कि चारू मजूमदार और कानू सान्याल से लेकर गणपति, कोटेश्वर राव, पापाराव, रामन्ना, हिदमा, तेलगू दीपक और कोबाद गांधी जैसे कथित क्रांतिकारियों की पृष्ठभूमि आदिवासी-किसान की है या उनके विरोधी की। ये माओवादी भले ही शोषितों की लड़ाई की बात करते हों लेकिन इनके भीतर भी जातीय श्रेष्ठता का दुराग्रह भरा हुआ है। माओवादी नेता कोटेश्वर राव के नजदीकी गुरुचरण किस्कू ने एक साक्षात्कार में कहा था कि बंगाल में किशनजी की अगुआई में जारी आंदोलन आदिवासी समर्थक नहीं, आदिवासी विरोधी है।

हत्या पसंद उन क्रूर और निर्मम माओवादियों द्वारा चुनावों को पाखंड और संसद को सुअड़बाड़ा कह देने से काम नहीं चल जाता। अरुंधती को उसके आगे भी पूछना चाहिए। आखिर उनका बूचड़खाना कोई विकल्प तो नहीं हो सकता। रॉय यह भी तो बताएं कि वे भारतीय राजतंत्र का समर्थन करती हैं कि माओवादियों की तरह खुल्लम-खुल्ला तख्ता पलट का इरादा रखती हैं। अपने इस इरादे पर उन्हें राजतंत्र के इरादे की परवाह है भी या नहीं! पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी अब माओवादी क्यों हो गए? आखिर वहां से नक्सलवादी क्यों चले गए थे, क्या नक्सलवादियों का स्वप्न पश्चिम बंगाल में पूरा हो गया था। ये कैसा स्वप्न है जो बार-बार दु :स्वप्न में बदल जाता है। बंगाल की माक्र्सवादी-कम्युनिस्ट सरकार तो नक्सलियों के स्वप्न साकार करने के लिए ही बनी थी। फिर 20-30 वर्षों के माक्र्सवादी राज में उनके स्वप्न दिवास्वप्न क्यों हो गए? अभागे नक्सली, माओवादी बनने पर क्यों मजबूर हुए। बंगाल में असफल नक्सली छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के सफल माओवादी कैसे हो सकते हैं?

बकौल अरुंधती मान लिया जाए कि भारतीय संसद द्वारा 1950 में लागू किया गया संविधान जन-जातियों और वनवासियों के लिए दुःख भरा है। संविधान ने उपनिवेशवादी नीति का अनुमोदन किया और राज्य को जन-जातियों की आवास-भूमि का संरक्षक बना दिया। रातों-रात उसने जन-जातीय आबादी को अपनी ही भूमि का अतिक्रमण करने वालों में तब्दील कर दिया। मतदान के अधिकार के बदले में संविधान ने उनसे आजीविका और सम्मान के अधिकर छीन लिए। संसद द्वारा अपनाए गए संविधान से जन-जातीय समाज ही नहीं अन्य बहुत लोगों को दुःख हो सकता है तो क्या लाखों-करोड़ों लोग माओवादियों की तरह हथियार उठा लें और लाखों-करोड़ों को अपना शत्रु बना लें? निश्चित तौर पर बड़े बांधों से विस्थापन होता है। सबसे अधिक प्रभावित वनवासी-आदिवासी ही होते हैं। लेकिन सिर्फ बांधों की उंचाई का विरोध निषेधात्मक काम है, अरुंधती या मेधा पाटकर विकल्प भी तो बतांए-कुछ करके भी दिखाएं। सरकार के कल्याणकारी बातों से सिर्फ चिंता करने से नहीं होगा। सरकार और आमलोगों को भी तब चिंता सताने लगती है जब अरुंधती वन-प्रांतर में माओवादियों से मिलने जाती हैं। आदिवासियों का विकास उद्योगपति-पूंजीपति समर्थक गृहमंत्री पी. चिदंबरम वैसे ही नहीं कर सकते जैसे माओवादी समर्थक अरुंधती राय नही कर सकती. एजेंट होने का आरोप दोनों पर लग सकता है। एक पूंजीपतियों का, दूसरा माओवादियों का। वर्षों से कब्जे की जद्दोजहद गरीब और संसाधन विपन्न क्षेत्रों में नहीं हो रही है, बल्कि गरीब और संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों में हो रही है। माओवादी वहीं हैं जहां खनिज संसाधनों की मलाई है। वे वहीं अपना पैर पसार रहे हैं जहां कंपनियां उत्खनन को बेताब हैं। क्योंकि उगाही और वसूली के लिए यही उर्वर क्षेत्र है। उड़ीसा के कालाहांडी में भी गरीबी है। वहां सरकार नहीं पहुची, तो क्यों नहीं माओवादी वहां भूखमरी समस्या खत्म कर देते। अपने बौद्धिक समर्थको के साथ रेड कोरीडोर की तरह क्यो नही कोइ विकास का कोरीडोर बना देते. दुर्भाग्य से इन सर्वहारा लडाकों के वे सभी वर्ग-मित्र हैं जो इन्हें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए असलहा, पूंजी और साधन उपलब्ध कराते हैंं। बाकी सब वर्ग शत्रु। उनके नियम में लिखा है – शत्रु को नष्ट कर ही दिया जाना चाहिए, उसके हथियार छीन लेने चाहिए और उसे अशक्त कर दिया जाना चाहिए…’’ तो इस संघर्ष में सिर्फ वहीं बचेंगे जो वर्ग मित्र बन सकेंगे, बाकी सब मिटा दिए जायेंगे।

अरुंधती को कॉमरेड कमला की बार-बार याद आती है। वे कई बार उसके बारे में सोचती हैं। वह सत्रह की है। कमर में देशी कट्टा बांधे रहती है। उस 17 वर्षीय कॉमरेड की मुस्कान पर वे फिदा हैं। होना भी चाहिए। लेकिन वह अगर पुलिस के हत्थे चढ़ गई तो वे उसे मार देंगे। हो सकता है कि वे पहले उसके साथ बलात्कार करें। अरुंधती को लगता है कि इस पर कोई सवाल नहीं पूछे जायेंगे। क्योंकि वह आंतरिक सुरक्षा को खतरा है। ऐसा तो सब प्रकार की असुरक्षा के प्रति कोई भी करेगा। क्या आंतरिक, क्या बाह्य असुरक्षा। केांई पुलिस की सिपाही सत्रह वर्षीय कमला होगी तो माओवादी क्या करेंगे? क्या वे उसे दुर्गारूपिणी मान उसकी पूजा करेंगे? बाद में वे ससम्मान उसे पुलिस मुख्यालय या उसके मां-बाप के पास पहुचा देंगे? अरुंधती उन माओवादी कॉमरेडों से पूछ लेती तो देश को पता चल जाता। अगर वो पुलिस की सिपाही कमला 17 वर्षीया आदिवासी भी होती तो हत्थे चढ़ने पर माओवादी निश्चित ही पहले बलात्कार करते और उसे उसके परिवार वालों के सामने जिंदा दफन कर देते। आदिवासी क्षेत्रों की कितनी ही कमलाएं माओवादियों के हत्थे चढ़कर बलात्कार और जिंदा दफन की शिकार हो चुकी हैं। डर के मारे आंकड़े भी संकलित नहीं होते। पुलिसिया हिंसा या आतंक के खिलाफ तो मानवाधिकार भी है और लेखक-बुद्धिजीवी भी, लेकिन माओवादी हिंसा और आतंक के खिलाफ कौन बोलेगा? बोलने वाले जाने कब एम्बुश के शिकार बना दिये जाये.

चाहे हथियारबंद माओवादी हों या कलमबंद माओवादी, देश की अनेक समस्याओं का वास्ता देकर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। माओवाद समर्थकों के दोगले चरित्र को समाज और सरकार को समझना ही होगा। आखिर किस बिना पर हथियारबंद माओवादी तख्ता पलट की योजना बना रहे हैंं। क्या ये कलमबंद समर्थक उनके इशारे पर चल रहे हैं? देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा कर, सत्ता को बंदूक की नली से प्राप्त करने की रणनीति का एक हिस्सा तो नहीं ये कलमबंद माओवादी? आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि बीच का कोई रास्ता नहीं दिखता। न तो सरकार के लिए और ना ही आम लोगों के लिए। फिर ये माओवादी बुद्धिजीवी विकास की कमी, मानवाधिकार, आदिवासी उत्पीड़न की बात लिख-कहकर देश के आमलोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं? आप अगर माओवादी हिंसा का खुलेआम विरोध नहीं करेंगे, उन्हें ग्लैमराइज करेंगे, उसके पक्ष में माहौल बनायेंगे, सरकार की नीतियों का विरोध करेंगे बिना कोई वैकल्पिक नीति बताये तो आप भी माओवादियों के संरक्षक, उनके समर्थक और उनके मददगार के रूप में क्यों न चिन्हित किए जाएं? आपके साथ भी माओवादी-नक्सलियों जैसा बर्ताव क्यों न किया जाए? जिस दिन दंतेवाड़ा में पुलिस बल और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हो रही थी उसी दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ बुद्धिजीवी माओवाद विरोधी अभियान का विरोध कर रहे थे। बाद में खबर आई कि देश की राजधानी नई दिल्ली में केन्द्र सरकार के नाक के नीचे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ कथित क्रांतिकारी छात्रों ने माओवादियों द्वारा देश के पुलिस जवानों की हत्या पर जश्न मनाया। कुछ छात्रों द्वारा विरोध करने पर झड़प की नौबत आ गई। क्या लोकतंत्र, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का यही मतलब है? क्या देश की जनता और सरकार विश्वविद्यालय को करोड़ों की सब्सिडी इसलिए देती है कि वहां से पढ़कर छात्र देश विरोधी कार्य करें। ऐसे छात्र, छात्र संगठनों और विश्वविद्यालय पर सरकार ने क्या कार्यवाई की, सरकार की क्या नीति है? देश का कानून माओवाद-नक्सलवाद समर्थकों और देश के सुरक्षा बल के विरोधियों के बारे में क्या कहता है, देश को जानने का हक है। क्या ये मीडिया के माओवादी है जो आतंक को, हिंसा को और भय को ग्लैमराइज कर रहे हैं और इसे स्वप्न में देखने लायक बना कर परोस रहे हैं। ये कलमबंद माओवादी जो हथियारबंद होने, राज्य के खिलाफ आंतंक और हिंसा का तांडव करने और समाज को क्षत-विक्षत कर देने की प्रेरणा दे रहे हैं इनके बारे में राज्य और समाज क्या सोचता है? यह कलमबंद और हथियारबंद माओ का कैसा ताना-बाना है।

-अनिल सौमित्र

19 Responses to “मीडिया में माओ”

  1. पंकज झा

    पंकज झा.

    ओम प्रकाश जी …जहां तक पूजीपतियों और सरकार की मिलीभगत का सवाल है तो इस पर काफी कुछ अपने द्वारा भी लिखा गया है. यहाँ पुनः उल्लेख करना दुहराने जैसा हो जाएगा. लेकिंन संविधान पर आपके विचार से मैं खुद को भी बहुत हद तक नत्थी करना चाहूँगा. बिलकुल सही बात कि यह कोई नहीं कह सकता है कि संविधान में सब कुछ ठीक-ठीक ही है. वास्तव में इसमें कई खामियां हैं लेकिन हम उस संविधान की भी बात कर रहे हैं जिसमे समयानुकूल सौएक संशोधन हो चुके हैं. तो इस साठ साल में काफी कुछ बदला है. यह संविधान वो पुराना वाला ही नहीं है. लेकिन फिर भी सुधार की काफी गुन्जाईश है. आपको ‘एम.एन. वेंकटचलैया’ आयोग याद होगा जिन्हें इन्ही विसंगतियों की समीक्षा करने को नियुक्त किया गया था. उनकी संस्तुति भी काबिलेगौर थी. लेकिन अफ़सोस वह भी राजनीति की भेंट चढ गया. मैं यह भरोसा दिलाना चाहते हूं कि अपने लेखन आ आधार केवल ‘अंतरात्मा की आवाज़’ है. किसी भी तरह के भय या पक्षपात के बिना अपन लिखते हैं. और यह बिलकुल अपनी सोच है जिसके गलत होने की भी सम्भावना पूरी है. मैं कोई कूद कर नतीज़े पर पहुचने का प्रयास नहीं करता. आप सब लोग अपने-अपने विचार रखने को स्वतंत्र हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता भी हमें संविधान से ही मिली है. और इसे हमें सबसे कम बुरा मान अंगीकार करना चाहिए….. धन्यवाद.

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  2. om prakash shukla

    pankaj ji ap kis samvidhan ki bat ker rahe hai jo british sasrkar ke adesh avm nirdesh per banaya gaya aur us samvidhan sabha dwara jo simit matadhikar se chuni samvidhan sabha dwara banaya gaya aur use swikriti bhi wahi se mili jise kabhi bhartiya sansad dwara pass nahi keaya gaya aur jo pujipatioke shubhchintko unke hito ki racha apna pratamik uddeshya raha.usi samvidhan dwara Indira Gandhi dwara tanashahi thopane ka kutsit prayas kiya gaya.aur aj kisano adivasio ki pushtani jamin kuosio ke mol adhigrahit ker apne deshi videshi akao ko suopa ja raha hai.aur jab ye log jamin dene se mana karte hai to balprayog ker unhe apna sab kuch prashasan dwara haspliya ja raha hai iska virodh karne per media dwara dushprachar ker maovasi bata ker goli mari ja rahi hai.akhir hum kitane gire hue dalal log hai jo ajmal kasav aur afjalguru jaise videshi atankvadio per salo mukadama chala ker fansi ki saja milane ke bad bhi karoda khtch ker jinda rakha ja raha hai aur ager apne desh ke kucj gumrah aur shoshad upecha se naraj log hathiyar uthate hai to aloktantric tarike se unake safaye ki bat ker rahe hai.Pankaj ji apke vicharo selag raha hai ki ap ek fasist vichardhara se sanchalit budhjivi hai jo kisiko khatam karne ke liye kisi had tak ja sakta hai.woh chahe samvadhani ho ya garsavudhanic.

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  3. Dixit

    Om Parkash Trehan (E.mail op.trehan@rediff.com)
    Are Hindus safe in this country? InTripura, Naga land, Mizoram Hindu’s
    institutions are under attack. Christians under the guise of Maoists are attacking Sanskrit schools. Open religious functions are not allowed. Media that always remain on focus in Gujarat, never goes there.
    Parallel Government by Anti National groups run there. They collect even tax openly and no body dare to defy them.
    From Pusupati to Tirupati, Naxilites attack on Hindus increasing day by day.
    In Kashmir Hindus are displaced in their home. Govt. funds Jamia, Aligarh Muslim University which bears Muslim character but Banaras Hindu University has been made totally secular. In education, anti-
    Hindu lessons are being taught to the students. In films, scenes portraying fun of Hindu are made. A famous Muslim Hero can proclaim that “My name is Khan and I not terrorist”. But no body makes
    “My name is Kaul and I am a displaced person in my country”.

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  4. Dixit

    aroopji, have alook
    Before partition, at least in few princely states, Hinduism received some patronage. But now in free India that patronage has been lost. Hinduism has come to be neglected after partition, particularly at the behest of post partition political leaders who continued the policy of colonial government the same way as that was handed over to them after partition. In addition mis-placed secularism coupled with selfish partisan interests motivated the politicians to indulge in minority appeasement.
    sergentmajor gandhi.jpg-Gmail Explore windo 7

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  5. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    प्रिय सम्पादक,
    एक लेखक के लिये बडी बात होती है कि उसे पढा जा रहा है. कितना पढा जा रहा और पढने वाला कौन है, मतलब पाठक संख्या और पाठक वर्ग भी काफी महत्वपूर्ण होता है. लेकिन लेखक को पाठको से मिलने वाली टिप्पणिया सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. मेरे आलेख पर अनेक पाठको की टिप्पणिया आइ है, सबके प्रति आभार और धन्यवाद!
    लेकिन लेखक के तौर पर एक गुजारिश भी करना चाहूंगा. इंटरनेट हमे कुछ भी लिखने-कहने की छुट देता है, इसका अर्थ ये तो नही कि हम कुछ भी लिखे-कहे. मेरा इशारा उन टिप्पणिकारो की ओर है जो पाठको और एक स्वस्थ्य बहस को विषयांतर करने की कुचेष्टा करते रहे. आलेख जब माओवादियो, उनके बौद्धिक मददगारो, सरकार की इनके प्रति अस्पष्ट नीति के बारे मे थी फिर संघ, गुजरात, मधु कोडा और संघ क्या करता है इसके बारे मे चर्चा करके एक स्वस्थ्य बहस को बन्द करने की कोशिश की गइ. आगे किसी भी लेखक और विषय के साथ ऎसा न हो तो लिखने, पढने और टिप्पणी करने वालो की सार्थकता होगी. पुन: साधुवाद!

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  6. Sanjeev Sharma

    छद्म मानवतावादी हमारे देश के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं। आपका लेख तथ्यपरक, सारगर्भित और सटीक है।

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  7. डॉ. महेश सिन्‍हा

    महेश सिन्हा

    माओवादी जो अत्याचार अपने साथ की महिलाओं पर करते हैं अरुंधति उसका भी स्वाद लेकर ऐसा ही बोल पाएगी क्या ?

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  8. h.c.pandey

    it is necessary to decide as to how the inclusve development in consultation with the tribals without their elite sympathisers, is implemented so that so lasting solution is achieved. no use of indulging in the blame-game as is being done in this debate presented here.

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  9. Jeet Bhargava

    भाई साहब इस अरुंधती ‘सुजैन’ राय ने काश्मीर पाकिस्तान को दे देने की वकालात की थी. आपको एक और बात पर भी ध्यान देना होगा की चर्च का धर्मांतरण और नक्सलवाद साथ-साथ चलते हैं. चाहे उड़ीसा में स्वामी कृष्णा नन्द की ह्त्या हो या बस्तर के आदिवासी इलाको में धर्मांतरण. इसके अलावा भारत में बहुत से बुद्धीजीवी (?) बाकायदा चर्च और पाकिस्तान के पे-रोल पे हैं. जो एनजीओ आदि के बहाने दौलत कूटते हैं. कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने विदेशी दान-Anudaan के baare में kaanoon banaane का prayaas kiyaa thaa to sabse jyaadaa virodh Arundhati और teestaa jaaved setalvaad ने hi kiyaa thaa.

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  10. Amar Jeet Singh

    If a person molests ones sister/daughter/mother, then what would as a man you would do? Most certainly the person needs to be punished suitably so that there is no repitition of the offence and other prospective molesters also have fear of consequences.I wonder when such situation occurs on National/Iinternational front i.e. one is not involves peronally then all the intellectual debate resulting in nothing but in quenching some mental itch. I feel all the crime perpetuated against humanity, society and innocent common persons need be viewed on personal levels. The core question involves should be if such acts are done against me, my family member, my friend, my fellow citizen and human being what would be my reaction? If this is the feeing then the next question comes what would be if the perpetuator of such actions is my family member, my friend, my fellow citizen and human being what would be my reaction?. If we can confront such situation in an impartial/ objective/rational manner then i feel all the issues related to human rights, crime and quantum of punishment etc can be resolved.

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  11. अनिल

    मेरी बात ध्यान से सुने । सोचे…। क्या आपको नही लगता की चर्च एवम माओवादीयो मे कोई कनेक्सन है ???

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  12. devashish mishra

    बात चाहे गुजरात के दंगों की हो या दंतेवाड़ा दोनों ही निंदा के पात्र हैं और उस पर घोर निराशा यह की हमारे देश के कथित बुध्दिजीवी अभी भी समस्याओं से तथा अपनी कमियों पर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए के एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। मनावाधिकार कि बात करने वालों को खुद पहले अपने अन्दर झाँक कर देखना चाहिए वो इसका कितना पालन कर रहे हैं खासतौर से उन JNU के छात्रों को जिन्होने अच्छे जीवन के लिए संघर्ष कर अपने परिवार वालों पेट भर रहे जवानों के शहीद होने पर खुशी मनाई इससे पता चलता है कि वे मनावाधिकार के लिए कितना संजीदा हैं (सिर्फ नक्सलियों के लिए)।

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  13. RAJ SINH

    अच्छा विश्लेषण अनिल जी .
    पर पंकज झा की टिप्पणी पर ध्यान दें . ‘ मानवाधिकार वादी ‘ तो देशद्रोहियों द्वारा प्रायोजित देश के ‘ शत्रु ‘ हैं और भाड़े के दलाल. दन्त ही नहीं इनका समूल नाश हो .

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  14. aroop

    संघ के कारिदों अगर दूसरों के कमेंट सुनने का दम नहीं है तो वेबसाइट चलाना बंद कर दो। विस्फोट को देखो। हर विचारधारा का कमेंट की जगह वहां मिलती है। कल हमने पंकज झा के कमेंट पर कमेंट दिया था। लेकिन तुम लोगों ने हटा दिया। सिर्फ संघियों के लिए वेबसाइट चलाते हो। फासीवाद का प्रचार कर रहे हो। तुममें और माओवादियों में अंतर क्या है। माओवादियों ने 76 निर्दोष जवानों का कत्ल किया तो तुमलोगों ने हजारों मुसलमानों का कत्ल कर दिया गुजरात में। अब वेबसाइट चलाकर दुनिया को राष्ट्रवाद पढ़ा रहे हो। शर्म करो। अगर दूसरों की विचारधारा नहीं सुननी तो तेरी वेबसाइट सिर्फ प्रदूषण फैलाने वालों की वेबसाइट रह जाएगी।

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  15. rastravadi

    पंकज जी झा। बिहार में मैथिल ब्राहमणों को नाग कहा जाता है। उधर अरुधंती राय नागिन है। फिर नाग और नागिन में क्या फर्क है। अरुणधती राय अगर राष्ट्रवादी विरोधी माओवादियों के साथ है तो आप फासीवादी संघियों के साथ है। दोनों देश को तोड़ने में लगे है। इसलिए दांत सिर्फ अरुणधती राय ही नहीं आपके भी तोड़े जाने चाहिए।

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  16. aroop

    संघी कितने ढोंगी होते है। हमारा कमेंट ही हटा दिया। संघ का पोल खोल दो तो कमेंट हटा देते है। संघ के कारिंदों के वेबसाइट पर कमेंट करने का कोई फायदा नहीं है। क्योंकि ये कारिंदे फासीवादी है। दूसरों की दांत तोड़ने की बात करते है और अगर कोई सच्चाई एहसान जाफरी के कत्ल का बता दे तो बौखला जाते है। तभी तो इस देश में हर जगह हार रहे है। फिर अगर साइट में दूसरे विचारधारा का कमेंट ही नहीं देने तो सिर्फ संघी ही इस साइट को पढ़ेंगे। आम भारतीय जनता को क्या लेना देना। राष्ट्रविरोधी काम में लगे संघ के लोगों की साइट को देखने से क्या फायदा।

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  17. aroop

    माननीय पंकज जी झा, फिर नागिन का दांत कब तोड़ रहे है।रमण सिंह को कह तुरंत नागिन का दांत तोड़वा दे। सिर्फ भाषण देने से काम नहीं चलेगा। आरएसएस के तीन काम, भोजन,चिंतन और विश्राम। एक और नारा है माननीय पंकज जी झा, बच्चा-बच्चा राम का, क्या प्रोग्राम है शाम का। बड़े फासीवादी हो यार। खुद हजारों मुसलमानों का कत्ल करवा दिए गुजरात में और अब राष्ट्रवाद का ढोंग करते हो। मुसलमानों की हत्या करना कैसा राष्ट्रवाद है। लगता है भाजपा के छतीसगढ़ शासन में कुछ खास हासिल कर चुके है आप है। हासिल क्या किया होगा यह तो आपको ही पता होगा। खैर नागिन की दांत तोड़े जाने का इंतजार करेंगे। आखिर एहसान जाफरी के कत्ल करने वालों के लिए दांत तोड़ना कौन सी बड़ी बात है।

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  18. पंकज झा

    पंकज झा.

    आप भी क्या रामायण पढ़ने लगे अनिल जी…..? आंतरिक सुरक्षा को खतरा जिस नागिन से हो उसके लिए थोडा कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए था…इस तरह के इमला या बौद्धिक जुगाली का क्या मतलब…..? राष्ट्र वृक्ष के लिए विष का काम करने वाले इस नागिन का दांत किस तरह तोड़ दिया जा सके हमें इस पर सोचना चाहिए. अभी केवल इस पर मुकदमा किये जाने की बात ही चल रही है कि प्रशांत भूषण जैसे चोट्टे अपनी नाटक मंडली ले कर पिल पड़े हैं….देश में “लोकतंत्र” सबसे प्रमुख मानवाधिकार है और इसको क्षति पहुचाने वाले किसी दलालिनी की ऐसी-तैसी कर देने का उपाय होना चाहिए…बस.

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