आरक्षण के लिए मराठा समाज में फिर उबाल

संदर्भःमहाराष्ट्र में मराठों को आरक्षण और कोपर्डी दुष्कर्मी को फांसी की मांग

महाराष्ट्र में मराठा समाज का गुस्सा फिर से उबाल पर है, लेकिन इस गुस्से की अहमियत इस बात में है कि इसमें शोर-शराबा, नारे-बाजी और तोड़-फोड़ नहीं है। इस दृष्टि से यह अहिंसक और मूक आंदोलन, आरक्षण आंदोलन से जुड़े उन लोगों के लिए एक मिसाल है, जिन्होंने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में न केवल हिंसा, आगजनी और तोड़-फोड़ का आलम रचा, बल्कि हरियाणा में तो सामूहिक बलात्कार की घटना को भी अंजाम दिया था। मराठा क्रांति मोर्चा के नेतृत्व में यही आंदोलन पिछले साल सितंबर-अक्टूबर में भी देखने में आया था। आंदोलन से मुंबई की रफ्तार थम गई है। नौकरी और शि क्शा में आरक्षण के साथ ही पिछले साल अहमदनगर के कोपर्डी में नाबालिग के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोपियों को फांसी की मांग भी शामिल है। मराठा समुदाय दलित उत्पीड़न रोकथाम कानून में बदलाव की मांग भी कर रहा है। जबकि यह मामला अदालत में लंबित है। दरअसल मराठों का दावा है कि इस कानून का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है।  भारत में आरक्षण राजनीतिक दलों के सियासी खेल का दांव बनकर लगातार उभरता रहा है। इस कड़ी में यह मांग महाराष्ट्र में मराठों को 16 फीसदी और मुस्लिमों को 5 प्रतिशत दिए गए आरक्षण   के पुराने फैसले से जुड़ी है। राज्य की तत्कालीन कांग्रेस और राकांपा गठबंधन सरकार ने शिक्शा और सरकारी व अर्द्ध-सरकारी नौकरियों में यह आरक्षण 2014 में सुनिश्चित किया था। किंतु आरक्षण का प्रतिशत 52 से बढ़कर 73 फीसदी हो जाने के कारण मुबंई उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी। यह व्यवस्था संविधान की उस बुनियादी अवधारणा के विरुद्ध थी, जिसके मुताबिक आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए ? इसी आधार पर पत्रकार केतन तिरोडकर ने मराठा आरक्षण को मुबंई उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हांलाकी यह आरक्षण एक अलग विशेष प्रवर्ग तैयार करके लागू किया गया था। किंतु इस प्रकृति के ज्यादातर मामलों में ये टोटके संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते ? क्योंकि संविधान में धर्म और उप-राष्ट्रीयताओं के आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 15 ;4द्ध के शैच्छेद 16 ;4,  के मुताबिक नौकरियों में महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण का यह प्रावधान किया था। दरअसल किसी भी समाज की व्यापक उपराष्ट्रीयता भाषा और कई जातीय समूहों की पहचान से जुड़ी होती है। भारत ही नहीं समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में उपराष्ट्रीयताएं अनंतकाल से वर्चस्व में हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत एक साथ सांस्कृतिक भाषाई और भौगोलिक विविधताओं वाला देश है। इसीलिए हमारे देश के साथ ‘अनेकता में एकता‘ का संज्ञा सूचक शब्द जुड़ा है। एक क्षेत्र विशेष में रहने के कारण एक विशेष तरह की संस्कृति विकसित हो जाती है। जब इस एक प्रकार की जीवन शैली के लोग इलाका विशेष में बहुसंख्यक हो जाते हैं तो यह एक उपराष्ट्रीयता का हिस्सा बन जाती है। मराठे, बंगाली, पंजाबी, मारवाड़ी, बोड़ो, नगा और कश्मीरी ऐसी ही उपराष्ट्रीयताओं के समूह हैं। एक समय ऐसा भी आता है, जब हम अपनी-अपनी उपराष्ट्रीयता पर गर्व, दुराग्रह की हद तक करने लग जाते हैं। जम्मू-कश्मीर और पंजाब के अलगाववादी आंदोलन, षुरूआत में उपराष्ट्रीयता को ही केंद्र में रखकर चले, किंतु बाद में सांप्रदायिकता के दुराग्रह में बदलकर आतंकवादी जमातों का हिस्सा बन गए। इन्हीं उपराष्ट्रीयताओं के हल हमारे पूर्वजों ने भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण करके किए थे। लेकिन महाराष्ट्र में मराठों को आधार बनाकर आरक्षण का जो प्रावधान किया गया था, उसने तमाम सुप्त पड़ी उपराष्ट्रीयताओं को जगाने का काम किया। गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट, और आंध्रप्रदेश में कापू समाज को आरक्षण की प्रेरणा इसी व्यवस्था से मिली।  महाराष्ट्र में मराठा, उत्तर भारत के क्शत्रियों की तरह उच्च सवर्ण और सक्षम भाषाई समूह है। आजादी से पहले शासक और फिर सेना में इस कौम का मजबूत दखल रहा है। आजादी की लड़ाई में मराठा, पेशवा, होल्कर और गायकवाड़ांे की अहम भूमिका रही है। स्वतंत्र भारत में यह जुझारू कौम आर्थिक व समाजिक क्षेत्र में इतनी क्यों पिछड़ गई कि इसे आरक्षण के बहाने सरंक्षण की जरूरत पड़ रही है, यह चिंता का विषय ? इस आरक्षण को रद्द करने की दृष्टि से हाईकोर्ट में जो जनहित याचिका दायर की गई है, उसमें तर्क दिया गया है कि मराठा न तो कोई जाति है, न ही आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा समाज, जिसे आरक्षण की आवष्यकता हो ? मराठा समाज महज एक भाषाई समूह है, जो काफी ताकतवर है। लिहाजा इसे आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। मुस्लिमों की आर्थिक बद्हाली का खाका राजेंद्र सच्चर समीति और रंगनाथ मिश्र आयोग खींच चुके हैं। मिश्र आयोग ने ही धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के बीच विभाजन रेखा खींचकर इनकी बदहाली की पड़ताल की थी। इस तबके में आर्थिक रूप से कमजोर व सामाजिक स्तर पर पिछड़े अल्पसंख्यकों की पहचान कर आरक्षण सहित अन्य कल्याणकारी उपाय सुझाए थे। इसी आधार पर धर्म की बजाए मुस्लिमों के पिछड़े वर्ग का मानकर राज्य सरकारें आरक्षण देने का उपाय कर रही हैं। क्योंकि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है। इसी तरह से संविधान में उपराष्ट्रीयताओं का भी हवाला नहीं है। इसी आधार पर आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण देने के फैसले को न्यायपालिका ने रद्द कर दिया था। उत्तरप्रदेश में भी ऐसे प्रावधानों का यही हश्र हुआ है। महाराष्ट्र में चल रहा वर्तमान मराठा आंदोलन आरक्षण के साथ कोपर्डी दुष्कर्म कांड के दोशियों को फांसी की मांग से से भी जुड़ा है। इन मांगों के साथ भाजपा, कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना इस आंदोलन के साथ खड़े हैं। दुष्कर्म का यह मामला अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव में मराठा नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और फिर हत्या से जुड़ा है। इस परिप्रेक्ष्य में आंदोलनकारी 1989 में संसद से पारित किए अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार विरोधी कानून को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में केंद्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद यह कतई मुमकिन नहीं है कि भाजपा इस कानून को संसद से समाप्त कराने में सफल हो जाए ? भाजपा इस कानून को खत्म करने का नैतिक साहस इसलिए भी नहीं जुटा सकती है, क्योंकि बाबासाहब अंबेडकर की 125वीं जयंती पर दलितों को न्याय दिलाने का संकल्प स्वयं नरेंद्र मोदी जता चुके हैं। यही एक ऐसा कानून है, जो अनुसूचित जाति व जनजातियों को राहत देता है। इसके बावजूद महाराष्ट्र के राजनीतिक दल मराठों की 33 प्रतिशत आबादी से इतने विचलीत हो गए हैं कि उन्हें दलितों की महज 11 फीसदी आबादी की परवाह नहीं रह गई है।

एक समय आरक्षण का सामाजिक न्याय से वास्ता जरूर था, लेकिन सभी जाति व वर्गों के लोगों द्वारा शिक्शा हासिल कर लेने के बाद जिस तरह से देश में शिक्शित बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई है, उसका कारगर उपाय आरक्षण जैसे चुक चुके औजार से संभव नहीं है ? लिहाजा सत्तारूढ़ दल अब सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों के समाधान आरक्षण के हथियार से खोजने की बजाय रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर निकालेंगे तो बेहतर होगा ? यदि वोट की राजनीति से परे अब तक दिए गए आरक्षण के लाभ का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो साबित हो जाएगा कि यह लाभ जिन जातियों को मिला है, उनका समग्र तो क्या आंशिक कायाकल्प भी नहीं हो पाया ? भूमण्डलीकरण के दौर में खाद्य सामग्री की उपलब्धता से लेकर शिक्शा, स्वास्थ्य और आवास संबंधी जितने भी ठोस मानवीय सरोकार हैं, उन्हें हासिल करना इसलिए और कठिन हो गया है, क्योंकि अब इन्हें केवल पूंजी और अंग्रेजी शिक्शा से ही हासिल किया जा सकता है ? ऐसे में आरक्षण लाभ के जो वास्तविक हकदार हैं, वे अर्थाभाव में जरूरी योग्यता और अंग्रेजी ज्ञान हासिल न कर पाने के कारण हाशिये पर उपेक्शित पड़े हैं। अलबत्ता आरक्षण का सारा लाभ वे लोग बटोरे लिए जा रहे हैं, जो पहले ही आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक व शैक्शिक हैसियत हासिल कर चुके हैं। लिहाजा आदिवासी, दलित व पिछड़ी जातियों में जो भी जरूरतमंद हैं, यदि उन्हें लाभ देना है तो क्रीमीलेयर को रेखांकित करके इन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित करना होगा ?
प्रमोद भार्गव

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