डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र
सामान्यतः संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में जब विश्व के नेता बोलते हैं तो दुनिया की निगाहें बड़ी शक्तियों पर टिक जाती हैं। मसलन अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस जैसी शक्तियों की बात अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की दिशा, युद्ध और शांति के समीकरण तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को प्रभावित करती है लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी छोटे देश की आवाज अचानक इतनी स्पष्ट और मानवीय हो जाती है कि बड़ी शक्तियों के शोर के बीच वही आवाज दूर तलक जाती है, जैसा इस बार संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन में नेपाली प्रधानमन्त्री बालेन्द्र शाह के सम्बोधन में देखने को मिला। बालेन्द्र शाह के भाषण में क्षोभ भी था, गुहार भी थी और आने वाली सन्तति के लिए संदेश भी।
यह आवाज ऐसे समय में उठी है जब दुनिया पहले से ही युद्धों की छाया में है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने मानवीय त्रासदी को गहरा किया है और रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप से आगे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, खाद्य और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस अधिवेशन की पृष्ठभूमि में युद्ध, जलवायु परिवर्तन, असमानता और बहुपक्षीय व्यवस्था पर बढ़ता अविश्वास प्रमुख वैश्विक चिन्ताएँ हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी अपने अंतिम महासभा सम्बोधन में युद्धों, जलवायु परिवर्तन, असमानता और कमजोर होती वैश्विक व्यवस्था के बीच अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
बालेन्द्र शाह ने जलवायु परिवर्तन को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर वैश्विक राजनीति का प्रश्न बना दिया। वे न्यूयॉर्क में केवल नेपाल ही नहीं वरन हिमालय से एक चेतावनी लेकर पहुँचे थे, एक ऐसी चेतावनी, जिसमें हाल की प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों का दर्द था, अपने घर और खेत खो चुके परिवारों की विवशता थी और उस भविष्य की चिन्ता थी जिसमें विकासशील देशों को बार-बार अपने वर्तमान को बचाने के लिए अपने भविष्य से समझौता करना पड़ सकता है। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत ही असाधारण रूप से मार्मिक ढंग से की। उन्होंने कहा कि वे नेपाल से एक ऐसी चेतावनी लेकर आए हैं जो पूरी मानवता के लिए है। उन्होंने उस विनाश का उल्लेख किया जिसमें परिवार अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा करते रह गए, समुदाय कीचड़, पत्थरों और पानी के बीच अपने लोगों को खोजते रहे तथा सड़कें, पुल, स्कूल, घर और आजीविका कुछ ही मिनटों में बह गए। पिछले महीने नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ को उन्होंने केवल नेपाल की स्थानीय त्रासदी न मानकर पूरी दुनिया के लिए चेतावनी बताया।
शाह ने इसी तथ्य को उजागर करते हुए मार्मिक तरीके से कहा जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं पहचानता। ग्लेशियर और बाढ़ पासपोर्ट पर वीजा लगाकर यात्रा नहीं करते। इस बात को समझना भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। हिमालय भारत की जल, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ है। नेपाल में आने वाली बड़ी आपदा का प्रभाव सीमा के इस पार भी महसूस किया जा सकता है। इसलिए नेपाल का जलवायु संकट केवल नेपाल का राष्ट्रीय प्रश्न नहीं है। वह दक्षिण एशिया की साझा सुरक्षा का प्रश्न है। उन्होंने दुनिया से पूछा कि जब अन्तरमहाद्वीपीय मिसाइलें समय पर पहुँच सकती हैं, राइफल और गोला-बारूद सीमाओं की तमाम बाधाओं को पार करके निर्धारित समय पर पहुँच सकते हैं तो नेपाल का किसान जरूरत के समय खाद और ईंधन क्यों नहीं प्राप्त कर सकता?
आगे उन्होंने यह भी कहा कि हमने युद्ध के लिए लगभग त्रुटिहीन आपूर्ति-व्यवस्था वाली दुनिया बना दी है लेकिन भोजन के लिए हमारी आपूर्ति-व्यवस्था टूटी हुई है। यह वाक्य केवल भावनात्मक नहीं है। इसके भीतर वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर गम्भीर प्रश्न छिपा है। दुनिया ने हथियारों, ऊर्जा, पूँजी और तकनीक को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के लिए अत्यन्त विकसित तंत्र बनाया है लेकिन जब बात किसान के खेत तक खाद पहुँचाने, गरीब परिवार तक ईंधन पहुँचाने या आपदा प्रभावित समुदाय तक समय पर सहायता पहुँचाने की आती है, तो वही व्यवस्था अनेक बाधाओं से घिर जाती है।
शाह के भाषण का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा से आगे बढ़कर मानव सुरक्षा पर जोर दिया। भोजन, पानी, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण और आजीविका भी सुरक्षा के महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। उनके विचारों में सुरक्षा केवल राज्य की सीमाओं और सैन्य शक्ति की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी है। ‘जलवायु न्याय’ भी महत्त्वपूर्ण पक्षहै। नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी वह ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन और अनिश्चित जल-प्रवाह जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। इससे विकास की गति भी प्रभावित होती है। शाह की चिंता“साझी लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ और अपनी-अपनी क्षमताएँ”[Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities(CBDR-RC))]के सिद्धान्त से जुड़ती है। जलवायु न्याय का प्रश्न केवल वित्तीय सहायता का नहीं, बल्कि संकट की लागत के न्यायपूर्ण बंटवारे और वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में प्रभावित देशों की प्रभावी भागीदारी का भी है।
इस सन्दर्भ में शाह ने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में“हिमालयी जलवायु प्रत्यास्थता तंत्र”(Himalayan Climate Resilience Mechanism) बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके अन्तर्गत उपग्रह सूचनाओं के आदान-प्रदान, खतरनाक हिमनद झीलों की निगरानी, संयुक्त प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली तथा आपदा के समय सीमा-पार सहायता के समन्वय की परिकल्पना की गई है। यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और चीन के बीच अनेक रणनीतिक मतभेद हैं और हिमालय दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र है। फिर भी जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय सीमाओं से बंधा नहीं है। ऐसे में पर्यावरणीय सहयोग प्रतिस्पर्धा के बीच व्यावहारिक सहयोग का एक सम्भावित क्षेत्र बन सकता है।
इस पहल का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हिमालय लगभग दो अरब लोगों के लिए जल, कृषि, पारिस्थितिकी और आजीविका का महत्त्वपूर्ण आधार है। यदि हिमालय को केवल सीमा और सामरिक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के बजाय साझा जीवन-क्षेत्र के रूप में देखा जाए, तो क्षेत्रीय सहयोग की नई सम्भावनाएँ विकसित हो सकती हैं।हालांकि शाह ने भारत और चीन द्वारा नेपाल को आपदा के बाद दी गई सहायता के लिए सार्वजनिक रूप से अपने भाषण में धन्यवाद भी दिया। इससे उनके दृष्टिकोण में टकराव के बजाय साझा जिम्मेदारी, सहयोग और क्षेत्रीय एकजुटता पर जोर दिखाई देता है।
फिर भी इस भाषण के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या प्रभावशाली शब्दों को ठोस व्यवस्था में बदला जा सकेगा। हिमालयी जलवायु तन्त्र के लिए भारत, नेपाल और चीन के बीच डेटा साझा करने, वैज्ञानिक सहयोग, आपदा-पूर्व चेतावनी, वित्तीय संसाधन और राजनीतिक विश्वास आवश्यक होंगे। जलवायु वित्त की उपलब्धता और उसकी समयबद्धता भी मत्त्वपूर्ण है। बालेन शाह का यह तर्क विशेष ध्यान आकर्षित करता है कि जिस दुनिया में हथियार 72 घंटे में कहीं भी पहुँच सकते हैं, वहाँ किसान को उसकी आजीविका के साधनों से वंचित नहीं रहना चाहिए। यह प्रश्न केवल नेपाल का नहीं, बल्कि भारत, बांग्लादेश, अफ्रीका और उन सभी समाजों का है जो युद्ध, जलवायु और खाद्य संकट का भार उठाते हैं। इसलिए उनके भाषण का महत्त्व केवल नेपाल की आवाज के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठाने में है। यह हमें सोचने को बाध्य करता है कि विकास और शक्ति का वास्तविक पैमाना क्या होना चाहिए ? क्या इसे हथियारों की संख्या तक सीमित होना चाहिए या फिर उससे कहीं आगे बढ़कर नागरिकों की सुरक्षातथा संकट के समय मनुष्य तक भोजन, दवा और सहायता कितनी शीघ्रता से पहुँचे, पर केंद्रित होना चाहिए, इस पर विश्व बिरादरी को सोचना होगा।
डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र