राजनीति

विकसित भारत का सपना और जाति का यथार्थ: कब थमेगा प्रतिभा का पलायन?

2047 के लक्ष्य की सिद्धि के लिए वोट बैंक की राजनीति छोड़ मेधा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना अनिवार्य

अशोक कुमार झा

आज़ादी के आठ दशक पूरे होने की ओर अग्रसर भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। आगामी दो दशकों में, वर्ष 2047 तक, देश अपनी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष मनाएगा। इस मील के पत्थर को ध्यान में रखते हुए 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का महासंकल्प लिया गया है। प्रधानमंत्री से लेकर आम नागरिक तक इस भव्य लक्ष्य को साकार करने के प्रयासों में जुटे हैं। परंतु इस राष्ट्रीय स्वप्न के समांतर एक यक्ष प्रश्न लगातार हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर रहा है—यदि हम वास्तव में विश्व के शीर्ष विकसित देशों की कतार में खड़े होना चाहते हैं, तो वे कौन सी बुनियादी खामियाँ हैं जो आज भी हमें गरीबी, अवसरों की कमी और सामाजिक विषमता के भंवर से बाहर नहीं निकलने दे रही हैं? क्या केवल आर्थिक आँकड़ों की वृद्धि से कोई देश विकसित बन सकता है, या इसके लिए सामाजिक और नीतिगत नींव का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है?

दुनिया के तमाम विकसित देशों के इतिहास और वर्तमान ढाँचे का अध्ययन करें, तो एक मौलिक सत्य उभरकर सामने आता है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, या जापान जैसे समृद्ध राष्ट्रों में प्रशासनिक, शैक्षणिक अथवा व्यावसायिक क्षेत्रों में चयन का प्राथमिक मानदंड केवल और केवल प्रतिभा’ (Merit) होता है। वहाँ जाति, नस्ल या जन्म के आधार पर संवैधानिक रूप से किसी के साथ न तो भेदभाव किया जाता है और न ही योग्यता को दरकिनार कर विशेषाधिकार बांटे जाते हैं। इसके विपरीत, भारत में अस्सी वर्षों की यात्रा के बाद भी हमारी संपूर्ण व्यवस्था—चाहे प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश हो, उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला हो, सरकारी नौकरियाँ हों या फिर नौकरियों में पदोन्नति (Promotion)—हर स्तर पर केवल जातिगत पहचान को ही प्राथमिक मानदंड बना दिया गया है। जब मेधा और योग्यता को दरकिनार कर अवसर बांटे जाते हैं, तो उसका सीधा और घातक परिणाम प्रतिभा पलायन’ (Brain Drain) के रूप में सामने आता है।

आज यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि दुनिया की सबसे दिग्गज टेक कंपनियों—गूगल, मेटा (फेसबुक), माइक्रोसॉफ्ट—और कई वैश्विक अनुसंधानों को ऊँचाई पर ले जाने वाले मस्तिष्क भारतीय मूल के ही हैं। हमारे देश के वे मेधावी युवा, जिन्हें स्वदेश में अपनी योग्यता और कठोर परिश्रम के अनुरूप सम्मान और अवसर नहीं मिल पाते, वे विदेश की ओर रुख करते हैं। दुनिया के विकसित राष्ट्र प्रतिभा का स्वागत करते हैं, उसकी कद्र करते हैं और उसे पल्लवित होने का माहौल देते हैं। परिणामस्वरूप, भारत की प्रतिभाएँ दूसरे देशों को महाशक्ति और विकसित राष्ट्र बनाने में अपना अमूल्य योगदान देती हैं, जबकि हमारा अपना देश अपनी ही सबसे बड़ी पूँजी—अपने मानव संसाधन—से वंचित रह जाता है। यह एक अत्यंत दुखद विरोधाभास है कि हम विकसित भारत का सपना तो देख रहे हैं परंतु उस सपने को सच करने वाले प्रतिभाशाली मस्तिष्कों को जातिगत सीमाओं में बाँधकर बाहर जाने पर मजबूर कर रहे हैं।

राजनीतिक वर्ग और सरकारों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करना ही होगा कि हमारी नीतियाँ देश को जोड़ने और मेधा को प्रोत्साहन देने के बजाय वोट बैंक के आधार पर समाज को विभाजित करने की ओर अधिक केंद्रित हो गई हैं। संविधान निर्माताओं ने जब जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, तो उनका मूल ध्येय समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्गों को एक निश्चित समय-सीमा (आरंभ में दस वर्ष) के भीतर सक्षम बनाकर मुख्यधारा में लाना था। उनकी सोच यह थी कि समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा होगी, ताकि यह देखा जा सके कि लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचा या नहीं, और फिर बारी-बारी से विकास की रोशनी से महरूम लोगों को इसका लाभ मिले। परंतु दुर्भाग्यवश, भारतीय राजनीति ने इस पवित्र उद्देश्य को स्थायी वोट बैंक का साधन बना लिया। समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया को पूरी तरह भुला दिया गया और जाति को ही योग्यता का एकमात्र विकल्प बना दिया गया।

इस नीतिगत भटकाव का सबसे बुरा प्रभाव हमारी युवा पीढ़ी पर पड़ा है। आज देश का युवा नीति, सिद्धांत और उद्देश्य से भटकता हुआ प्रतीत हो रहा है। शिक्षण संस्थानों में आए दिन होने वाले विवाद और आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी प्राथमिकताएँ कितनी विकृत हो चुकी हैं। जब परीक्षाओं में धांधली और नकल रोकने के प्रशासनिक कदमों पर राजनीति होने लगे, या अनुशासन लागू करने वाले अध्यापकों को ही कठघरे में खड़ा किया जाने लगे, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हमारी बौद्धिक और सामाजिक दिशा भ्रमित हो चुकी है। योग्यता की उपेक्षा ने युवाओं में गहरी निराशा और दिशाहीनता पैदा की है जिससे उनकी ऊर्जा सकारात्मक राष्ट्र-निर्माण में लगने के बजाय अनावश्यक सामाजिक संघर्षों में व्यर्थ हो रही है।

यदि यही परिपाटी जारी रही, जहाँ हर वर्ग केवल जातिगत आधार पर अपने पृथक अधिकार, पृथक संस्थान और पृथक कानून की मांग करता रहेगा, तो यह देश की आंतरिक संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा। एक ही देश में अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग न्याय और अवसरों के मानदंड कभी भी एक समरस और मजबूत समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यदि हम जातिगत चश्मे से बाहर नहीं निकले, तो समाज का विघटन और गहरा होगा, जिससे पृथकतावादी सोच को बल मिलेगा।

विकसित भारत का लक्ष्य केवल एक आकर्षक नारा या रात में देखा गया सुंदर सपना बनकर न रह जाए, इसके लिए आज ही कठोर और साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है। नेताओं, सरकार और संपूर्ण समाज को इस आत्मघाती व्यवस्था पर गंभीर चिंतन करना होगा। यदि हमें वास्तव में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करना है, तो हमें प्रतिभा के सम्मान की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ योग्यता को उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी क्षमता और समर्पण के आधार पर पहचाना जाए।

अब समय आ गया है कि हम जाति आधारित संकीर्ण राजनीति के चश्मे को उतारकर शुद्ध राष्ट्रीयताऔर मेधा’ (Meritocracy) की दृष्टि अपनाएँ। जब देश की नीति और नीयत में प्रतिभा को सर्वोच्च सम्मान मिलेगा, तभी ब्रेन ड्रेनरुकेगा और हमारे देश के युवा अपनी मातृभूमि को विश्व की सर्वोच्च आर्थिक व बौद्धिक शक्ति बनाएँगे। अन्यथा, बुनियादी कमियों को नज़रअंदाज़ कर केवल नारों के बल पर विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करना असंभव बना रहेगा।

अशोक कुमार झा