आजादी का मतलब

                    प्रभुनाथ शुक्ल

शहर का वह ओवरब्रिज अनगिनत बेसहारा और गरीब लोगों का आशियाना है। उसकी छत के नीचे बड़े अधिकार से भिखारी, कूड़ा चुनने वाले और फेरी-रेहड़ी का धंधे से जुड़े लोग उसी ब्रिज के नीचे अपना आशियाना बना लिया है। कहने का मतलब अजनबी शहर में जिसका कोई नहीं होता उसका ओवरब्रिज होता है। जिंदगी के लिए गुजर बसर करने वाले लोग रात में इसी ब्रिज के नीचे चैन की सांस लेते हैं और शकून से रात गुजाराते हैं। लेकिन उन्हें नगर निगम का हमेशा डर लगा रहता है कि कब बुलडोजर चल जाए। क्योंकि शहर में इस ब्रिज के अलावा उनका कोई अपना नहीं है। बस, कोई है तो यह ब्रिज।

शहर कि मुख्य सड़क पर गुजरने वाले इस ब्रिज के नीचे रामू भी भी रहता है। वह दिमागी रुप से विक्षिप्त है। उसके तन पर फटे, मैले कपड़े हैं। बाल और नाखून बिखरे और लम्बे हैं। उसके जिस्म से एक अजीब सी स्मेल आती है। जूठन चुन कर या किसी से मिले बासी भोजन से वह अपनी भूख मिटाता है। शहर के चौराहे पर कभी-कभी वह हंगामा खड़ा कर देता है जिसकी वजह से पुलिस बहुत परेशान होती है।

लेकिन आज रामू बदसला-बसदला नजर आ रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिख रही थी। हाथ में वह तिरंगा लिए था। बीच चौराहे पर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मौजूद सुरक्षा बलों को बार सलामी दे रहा था। ट्रैफिक वाहनों के खड़े होते ही वह लोगों के बीच पहुंच कर बेफ़्रिक होकर यह चर्चित गीत गाने लगता।… कर चले जां फ़िदा हम तन साथियों, तेरे हवाले वतन साथियों… सैल्यूट… जयहिंद, वन्देमातरम… भारत माता की जय…के खूब नारे लगा था। पूरा शहर तिरंगे झंडे से अटा पड़ा था। हर तरफ देश भक्ति के गीत गूंज रहे थे। शहर के मुख्य चौराहे पर लहरा रहा राष्ट्रीय ध्वज लोगों का बार-बार ध्यान खींच रहा था।

रामू की आज विक्षिप्तता गायब थी और आजादी के जश्न का वह पूरा आनंद ले रहा था। चौराहे पर अक्सर उसके हंगामे से दो-चार होने वाले आज उसकी हरकत से हतप्रभ थे। लेकिन लोग खुश थे और उसके साथ जयहिंद का उदद्घोष कर रहे थे। उसकी भाव-भंगिमा से ऐसा लग रहा था जैसे उसकी मानसिक विक्षिप्तता खत्म हो गईं है और वह आजादी का मतलब समझने लगा है।

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