अब बात कायापलट की

लो अब दिल्ली भी मोदीमय हो गयी। उड़ीसा, बंगाल, कर्नाटक और हिमाचल के बारे में भी राजनीतिक बिशलेषको के यही अनुमान हें कि यहाँ भी भगवा लहर आनी ही है। तमिलनाडु, केरल और बिहार के लिए भी भगवा खेमा इन्हीं कोशिशो में है। मोदी की नीतियों और व्यक्तित्व के प्रति जनता की दीवानगी अब जूनून में बदलती जा रही है। विमुद्रिकरण और जी एस टी लागू करवाना मोदी सरकार के बड़े आर्थिक फैसले थे जिन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिला। किंतू मोदी जनता में इसलिए अधिक लोकप्रिय हुए क्योंकि उन्होंने देसी संस्कृति को प्रतिष्टित किया और दूर देशों में भी उसके मान की स्थापित किया। एक और बड़ी बात उन्होंने देश में टोपी पहनाने यानि छल कपट और बिचौलिया संस्कृति पर लगाम कसी। उन्होंने हर वो रास्ता बंद कर दिया जिससे गरीब और मध्यम वर्ग लुटा जाता रहा। हालांकि देश की आयात संस्कृति पर वो लगाम नहीँ लगा पाए किंतू घोटाला और लूट संस्कृति को काबू कर लिया है। अब जबकि शॉर्टकट से माल कमाने में लगे एक बड़े वर्ग को उन्होंने बेरोजगार कर दिया है तो अब मजबूर होकर वह  रचनात्मक तरीके से और मेहनत कर काम करने पर मजबूर होता जा रहा है। अब यही वर्ग देश में नई औधोगिक क्रांति के ड्राइविंग फ़ोर्स बनेंगे और आयातित माल पर क्रमशः अंकुश लगता जाएगा।
लोगों की अपेक्षाओं पर मोदी बार बार खरे उतरे हैं और हाल ही के उत्तर प्रदेश के चुनावो की जीत और मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ पर लगाया गया उनका दांव भी ऐसा सटीक बैठा कि विपक्षियों के होश उड़ गए। उत्तर प्रदेश की जनता को मोदी के सुशासन के स्वाद का योगी आदित्यनाथ की जनहित में ताबड़तोड़ फैसले लेने की रणनीति ने बड़े ही आक्रामक अंदाज में दिलाया। उत्तर प्रदेश में कुछ ही दिनों में आए क्रांतिकारी कदम और सुशासन की बहार से आमजन आनन्दित हैं। भ्रष्ट, कपटी और धूर्त लोगों पर जितनी तेजी से गाज गिर रही है उससे पूरे देश में लंबे समय बाद अत्यंत सकारात्मक माहौल बना है। अब हिंदुत्व की बात सम्मान से की जाने लगी है और स्वयं को हिंदू या भारतीय कहना विवादित नही वरन गौरव की बात बन चुकी है। जाति, पंथ ,भाषा के टूटते बंधनों के बीच नये भारत का उदय हो चूका है। वैदिक संस्कृति और गाय का महत्व अब चर्चा और बहस का बिषय है। गाय जो वेदिक संस्कृति का आधार थी, की महत्ता पुनर्स्थापित होने की चर्चाओं के बीच भारत के प्राचीन गौरव, ज्ञान और वैश्विक मान को पुनर्स्थापित करने की मांग मुख्यधारा में आ चुकी है। गौ, ग्राम, गंगा, हमारे मान बिंदु, सांस्कृतिक प्रतीकों और भाषा के सम्मान के लिए नए उपक्रमो के बीच ब्रिटिश संस्कृति, अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजो द्वारा थोपा गया संविधान, न्याय प्रणाली, नोकरशाही, शिक्षा और स्वास्थ्य तंत्र और बाज़ार का लूटतंत्र सबके प्रति जनता में आक्रोश और नकारात्मकता के भाव भरते जा रहे हैं। भारत का जनमानस अब सुलग रहा है और अपने मौलिक स्वरुप में राजव्यवस्था की वापसी चाहता है। वह फिर से ज्ञान परंपरा वाली पीढ़ी और आध्यात्म, योग आधारित जीवन शैली की और बढ़ना चाह रहा है। मोदी सरकार इन जन अपेक्षाओ को समझ रही है और निरंतर बदलाब और सुशासन के एजेंडे को बढ़ा रही है। किंतु जनता की अपेक्षाएं और आवश्यकताएं कही ज्यादा हैं। लोग देश का कायापलट चाहते हैं और पुनः वैभवशाली भारत की कल्पना करने लगे हैं किंतु इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार और समाज को जो उपाय करने हैं वे खासे कम हैं। सच तो यह है कि सरकार और समाज दोनों कई मुद्दों पर दिग्भ्रमित हैं। पश्चिमी जीवन शैली को छोड़ पुनः भारतीय जीवन शैली अपनाने के बीच समाज गहरे अंतर्द्वंद से गुजर रहा है और सरकार भी। डॉलर-पौंड अर्थव्यवस्था को पीछे कर पुनः गाय आधारित अर्थव्यवस्था या उस जैसे मापदंड वाला जीवनतंत्र विकसित करना सरकार के लिए बड़ी चुनोती है वो भी तब जबकि अधिकाँश संवैधानिक संस्थाएं और हमारी न्यायपालिका,नोकरशाही के साथ ही कारपोरेट जगत व मीडिया भी विदेशी नीतियों और पद्धतियों से निर्देशित होते है, जिनका आम भारतीय से कोई सरोकार नहीँ होता। अगर मोदी बड़े बदलाब करते हैं तो बड़े द्वन्द और संघर्षो से गुजरना होगा। अपनी रॉबिनहुड वाली छवि से मोदी ने जनता पर तो पकड़ मजबूत कर ली है किंतु लाख कड़ाई और निर्देशों के बाद भी तंत्र पूरी तरह काबू में नहीँ आ पाया है। भ्रष्ट सरकारी अमले के खिलाफ कड़ी कार्यवाही से वे बचते रहे हैं जिस कारण उनकी नीतियों को जमीन तक पहुंचने में काफी परेशानी हो रही है। साफ़ छवि की बदौलत कुछ समय तक तो वोटर जुड़ा रह सकता है किंतू जमीनी परिणामो के अभाव में कुछ समय बाद हाथ से निकल भी सकता है। इसलिए बड़ी मछलियों पर वास्तविक कार्यवाही से जब तक डर का माहौल नही बनेगा तंत्र काबू में नही आ पायेगा। इसलिए इस दिशा में गहराई से सोचें मोदी जी और उनके मंत्री व मुख्यमंत्री।

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