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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोय’ गीत गाकर स्वयं को अमर बनाने वाली कृष्णभक्ति में लीन रहने वाली मीरा का जन्म मेड़ता के राजा राव रत्न सिंह के घर 23 मार्च, 1498 को हुआ था। मीरा का बचपन दुःखों में बीता था क्योंकि मात्र 3 वर्ष की होने पर मीरा की माता का स्वर्गवास हो गया। बचपन में एक विवाहोत्सव के दौरान मीरा ने अपनी मां से पूछा कि मेरा पति कौन है? इस पर मां ने हंसी में कृष्ण की प्रतिमा की ओर इशारा क रते हुए कह दिया कि ‘यही तुम्हारे पति हैं’। तब से मीरा ने श्रीकृष्ण को अपने मन मंदिर में बसा लिया।

माता-पिता की मृत्यु के बाद मीरा अपने दादा राव दूदा जी के पास रहने लगी, लेकिन कुछ समय बाद दादा जी भी स्वर्गवासी हो गए। बाद में राव वीरम देव ने मीरा का विवाह चित्तौड़ के राजा राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से कर दिया। मीरा श्रीकृष्ण की प्रतिमा सदा अपने साथ रखती थीं अतः वे श्रीकृष्ण की प्रतिमा अपने ससुराल ले आयी। मीरा का वैवाहिक जीवन आनंदमय नहीं था। पति की मृत्यु होने के बाद मीरा के हृदय में विराग की भावना गहरी होती गयी। उन्होंने समस्त पारिवारिक एवं संसारिक बंधनों से मुक्ति ले ली और साधु-संतों के साथ सत्संग व भगवत चर्चा करने लगी।

मीरा की श्रीकृष्ण के प्रति दीवानगी बढ़ती ही गयी। इससे क्रोधित होकर मीरा के देवर ने उनकी हत्या का षड़यंत्र भी रचा और उनकी हत्या करने के उद्देश्य से पिटारे में एक सर्प व एक बार विष का प्याला भी भेजा जिसे उन्होंने पी लिया लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। यह देखकर लोग आश्चर्यचकित हुए। इन षड़यंत्रों से दुःखी होकर मीरा तीर्थयात्रा का बहाना बनाकर वृंदावन गई और वहां से द्वारिका चली गयी।

मीरा श्रीकृष्ण की अन्यय भक्त थी। उनका समस्त काव्य कृष्णमय है। मीरा ने किसी ग्रंथ की रचना नहीं की अपितु उनकी रचनाओं का संग्रह गीत है। मीरा के पदों में कृ ष्ण की भक्ति प्रेम विरह तथा संयोग के चित्रों की झांकी दर्शनीय है। मीरा के काव्य में शृंगार के दोनो पक्षों का मार्मिक चित्रण मिलता है। मीरा को अपने प्रियतम के वियोग में न तो खाना-पीना अच्छा लगता है और न ही रात में नींद आती है। मीरा के काव्य की भाषा राजस्थानी ब्रज तथा गुजराती का सम्मिश्रण है। मीरा के काव्य में ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है जो उनके भावों के प्रकाशन में उपयोगी हो सके। मीरा के काव्य की शैली गीतात्मक है। उनकी शैली स्वाभाविक, सीधीसादी, सरल है। मीरा के पदों का मुख्य रस शृंगार एवं शांत है। मीरा क ी रचनाओं में अलंकरणों का कोई भी प्रयास नहीं किया गया है। प्रेम की मार्मिक व्यंजना, भावुकता तथा अलौकिक तन्मयता के कारण भक्ति के कवियों में मीरा का अद्वितीय स्थान है।

राणा विक्रमजीत की मृत्यु के बाद मेवाड़ के लोग उन्हें वापस बुलाने के लिए द्वारका गए। मीरा जन समुदाय का आग्रह न टाल सकीं। वे विदा लेने के लिए रणछोर मंदिर गयीं, पर पूजा पाठ में वे इतनी तल्लीन हो गयीं कि वहीं उनका शरीर छूट गया। इस प्रकार 1573 में द्वारका में मीरा की देहलीला समाप्त हुई।

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